यादों की किताब-प्रीति सुराना

image

सुनो!!!!
आज पलटे
मैंने यादों की किताब के सारे पन्ने
पलटते हुए कई जगह रूकी,..
कई पन्नों को झट से पलट दिया,..
कहीं पर
कुछ पल रूककर हंसी,.
कई पन्नों पर आज फिर छोड़ आई
आंसुओं के निशान,…
तुम्हारे
कदमों की आहट से चौंककर
लौट आई
खयालों से बाहर,..
वरना
आखिर के
कुछ खाली पन्नों को देखकर
यही सोच रही थी,..
काश लिख पाती इन बचे हुए पन्नों पर
कुछ ऐसा जो मैं लिखना चाहती थी,..
या बदल सकती उन पन्नों को
जिनपे मैं अपने आंसू छोड़ आई,..
खैर जाने दो,..
मैं जानती भी हूं और समझती भी हूं
जिंदगी की किताब
नही लिखी जा सकती कभी एक रंग
की स्याही से
और
ना ही मैं लिख सकती
इसमें अपनी रचनाओं की तरह
अपनी मर्जी से कुछ भी,..
क्यूंकि
ये सच है
जिंदगी प्रकृति की तरह ही है
जिसमें अनेक रंग होते हैं,..
हां
मुझे ये भी पता है
प्राकृतिक चीजों में बदलाव
बनावटीपन कहलाता है,..
चलो,..जाने दो इन सारी बातों को,..
मैं ऐसी ही हूं और ऐसी ही रहूंगी,..
हमेशा
अपनी “यादों की किताब”
की तरह,…,..

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s