कितना ख़ास है सशक्त लोकतंत्र के मुखिया का सबसे बड़े लोकतंत्र में आगमन?-ठाकुर दीपक सिंह कवि (प्रधान संपादक)

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भारत और अमेरिका के सुर अतीत में भले ही एक दूसरे से मेल न खाते रहे हो परंतु आज स्थिति में वांछित बदलाव है। दोनों ही देश के प्रमुख विकास के मुद्दे पर आम सहमति रखने वाले है। वैश्विक मंचो पर दोनों ही देश गर्मजोशी से मिले है और विचारधारा में भी आपसी समन्वय है। रिश्तों और आकांक्षाओं की बात करने से पहले पूर्व में आये अमेरिकी राष्ट्रपतियों और उनसे हुए फायदे नुकसान पर भी नज़र दौड़ाना लाज़मी है।

करीब 55 साल पहले दिसंबर 1959 में डी आइजनहावर सर्वप्रथम भारत की यात्रा पर आये थे। यह वह दौर था जब भारत और चीन की तकरार चरम पर थी और अमेरिका का वास्तविक तौर पर भारत की तरफ झुकाव था, ये इसलिए नहीं कि भारत के प्रति उनके दिल में कुछ नमी थी बल्कि इसलिए कि चीन एक सशक्त वैश्विक शक्ति बनकर उभर रहा था और अमेरिका इसके प्रति चिंता भी दबी जुबां में जाहिर कर चूका था। इसी कड़ी में आइजनहावर ने चीन की पकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति की बात तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखित रूप में कही थी। यह भले ही छद्म शुरुआत हो परंतु भारत को वैश्विक तौर पर एक अहम समर्थन था। हालांकि उनकी यात्रा को हम सफल नही करार दे सकते क्योंकि उन्होंने जाते-जाते ये बात कहकर कि भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते सबसे ऊपर है लेकिन पाकिस्तान अमेरिका के दिल में है, यात्रा की अहमियत को धूमिल कर दिया। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार सबसे खास बात तो यह थी कि आजतक यह पता नही चल पाया कि आइजनहावर से नेहरू ने वास्तव में आग्रह किया था या वे स्वयं भारत यात्रा पर आये थे।

1959 के बाद सन् 1969 में लगभग एक दशक बाद जुलाई के महीने में रिचर्ड निक्सन भारत आये। यह वो दौर था जब कांग्रेस की राजनीति एक-दूसरे की खींचतान में उलझी हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पार्टी में वर्चस्व को लेकर कांग्रेस सिंडिकेट नेताओं से मोर्चा ले रही थी। भारत के घरेलू राजनीति में उठापटक के बीच यह यात्रा मात्र एक औपचारिकता तक ही सीमित रह गयी और इस यात्रा से भारत-अमेरिका के खराब होते रिश्तों में कोई बदलाव नही आया और न तो इंदिरा और न ही निक्सन एक दूसरे से गर्मजोशी से मिले। चीन, पाकिस्तान और अमेरिका की भारत के विरूद्ध तिकड़ी चिंता का विषय तो था ही तत्पश्चात इंदिरा और निक्सन की शिथिल वर्ता संकट की तरफ इंगित करने वाला कदम था।

1978 की जनवरी में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर भारत यात्रा पर आये। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया और बदले में कार्टर भारत के लिए एक औपचारिक सद्भावना का सन्देश लेकर आये। दोनों ही नेताओ ने एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किया और साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने हरियाणा के दौलतपुर गाँव का दौरा किया जिसका नाम बाद में बदलकर कार्टरपुर रख दिया गया। यह यात्रा भी सफल नही हुई क्योंकि उनके इस दौरे पर विवाद खड़ा हो गया। दरअसल वो अपने एक सहयोगी से कह रहे थे कि परमाणु महत्वाकांक्षा पर भारतीयों को बहुत ही कड़ा सन्देश दिया जाना चाहिए और यह बात माइक्रोफोन पर रिकॉर्ड हो गयी।

एक लंबे अरसे के बाद सन् 2000 में बिल क्लिंटन भारत आये। यह यात्रा वास्तव में ख़ास थी क्योंकि दोनों देश तथाकथित शीतयुद्ध की छाया से बाहर निकलते हुए खुले तौर पर एक दूसरे के साथ नज़र आये। यह पहली बार था कि अमेरिका निर्देश देने की बजाय आग्रह के अंदाज़ में नज़र आया। वो दिल्ली के साथ-साथ मुम्बई, हैदराबाद, जयपुर और आगरा भी गए। उन्होंने भारत पाक से परमाणु कार्यक्रम रोकने का आग्रह किया। सबसे अधिक फायदा भारत में रेंगते हुए दौड़ने की कोशिश करते हुए आईटी सेक्टर को हुआ जो अमेरिका के बाज़ारों में दौड़ने लगा। यह यात्रा भारत-अमेरिका रिश्ते की एक नयी और मजबूत शुरुआत थी।

सन् 2006 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश भारत की ओर कदम बढ़ाने को राज़ी हुए। बदलती परिस्थिति में भारत एक महाशक्ति बनकर उभर रहा था। आईटी सेक्टर दौड़ पड़ा था और भारत एक परमाणु संपन्न देश था। बुश की यह यात्रा कई मायनों में ख़ास रही। इराक़ युद्ध को लेकर भारतीय मुस्लिम उनका विरोध कर रहे थे। इस यात्रा के पश्चात भारत वैश्विक स्तर पर परमाणु बिरादरी में अछूत नही रहा। भारत अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु करार पर आगे बढ़ा। हालांकि यात्रा के दौरान यूपीए सहयोगी वामदलों के विरोध के चलते उन्हें भारतीय संसद में संबोधन से वंचित रहना पड़ा। उन्होंने विश्वभर में भारत से लोकतंत्र फ़ैलाने के लिए मदद मांगी परंतु एक भारतीय प्रवक्ता ने उन्हें खरी-खरी सुना दी कि भारत लोकतंत्र का कारोबार नही करता।

अब 26 जनवरी 2015 को गणतंत्र दिवस के मौके पर ओबामा की भारत यात्रा वास्तव में अहम है। चीन सीमा विवाद और पाकिस्तान की लगातार बढ़ती नापाक हरकत का समाधान संभव है। भारत की कोशिश यही होगी की इन अहम मुद्दों पर अमेरिका से सहयोग प्राप्त कर लिया जाय। आतंकवादियों के सुरक्षित पनाह बन चुके पडोसी मुल्क पाकिस्तान पर नकेल कसने के लिए भारत अमेरिका का सहयोग प्राप्त कर सकता है और साथ ही साथ तंग सीमाओं पर शान्ति बहाल करने में सफल हो सकता है। साथ ही परमाणु उत्तरदायित्व पर लचीलापन संभव है जिससे अमेरिकी कम्पनियाँ माल सप्लाई करने के लिए राज़ी हो जाये। खाद्य सुरक्षा और सब्सिडी पर भी दोनों नेता एक दूसरे से बात कर सकते है। आईटी सेक्टर की महत्वाकांक्षाओं को भी तवज्जो दिया जा सकता है साथ ही साथ आयात-निर्यात के दायरों को बढ़ाने हेतु बातचीत संभव है।
दोनों देश आतंकवाद के मुद्दे पर एकजुट दिखाई पड़ते है और मौजूदा चुनौतियों से निपटने हेतु आम सहमति प्रकट कर सकते है।
यह यात्रा भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती लाने के लिए एक ख़ास कदम है। साथ ही सैन्य हथियारों की खरीद-फरोख्त पर भी अमेरिका के साथ ख़ास वार्तालाप हो सकती है एवं अमेरिका द्वारा वांछित मदद भी मिल सकती है। यह यात्रा भारत और अमेरिका के रिश्ते की तरफ नए युग की शुरुआत साबित हो सकती है परन्तु अपने पुराने एवं विश्वसनीय मित्र रूस से नाराज़गी एवं असहयोग का खतरा भी संजोये हुए है। अब देखना ये है कि मोदी की वैश्विक नीति कितना रंग लाती है और कैसे वो अमेरिका और रूस, दो परस्पर विचार विरोधी देशों के संग रिश्ते को आगे बढ़ाने एवं मजबूत करने में सफल होते है।

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लेखक लिटरेचर इन इंडिया जालपत्रिका के प्रधान संपादक हैं।

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