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1-)
कुछ भी कहना ये साबित नहीँ करता कि मैँ वो हूँ… मेरा होना स्वाभाविक है… अक्सर उदास हो जाता हूँ… ये मेरे लिए होना… आप समझ लो कि मैँ स्वंय से नाराज हूँ… मैँ अपने आप से झगड़ता हूँ… जब कभी मैँ बहस मेँ अपने मन से हार जाता हूँ… ये बड़ा जिद्दी है… इसकी बातेँ माननी पड़ती हैँ… ये कुछ भी करा लेता है मुझसे… मैँ इसका दास बने सब किये जाता हूँ… मैँ लिखना नहीँ चाहता पर ये न जाने कहाँ से विचार ढूँढ़ लाता है और अपनी मनमानी या योँ मान ले धौँस दिखाता है… मुझको बीमारी लगाने की जद्दोजहद मेँ हैँ… हाँ, लेखन की बीमारी और मैँ न जाने क्योँ इसकी बात मान बैठता हूँ… मैँ भी अब कहीँ लिप्त हूँ इसमेँ… मेरा लिप्त होना मेरा नहीँ है… ये तो मैँ मन का गुलाम हूँ… मैँ चाहकर भी ठोकर नहीँ मार सकता अपने मन को… या योँ कह ले मैँ अक्सर इसके जाल मेँ फँस जाता हूँ… मैँ लालची हूँ… और ये लालच देने वाला… लेकिन कुछ भी कह लो फायदा इसमेँ मेरा ही है… बस मुझे कुछ बक्त देना होता है अपने मन को… और ये दे जाता है मुझे अनगिनत लम्होँ को जोड़ने वाला फार्मूला… मैँ लिखता हूँ… ये लिखवाता है… अपना क्रेडित भी मुझे दे जाता… कुछ भी कहो ये मुझसे भिन्न है…

2-)
चलने के मूड से उठा… फिर अचानक बैठ गया… समझ नहीँ आ रहा था… वो कल रात मेँ आये स्वप्न का क्या मतलब था… बस कुछ धुआँ उड़ता हुआ दिखाई दिया और एक धुंधली-धुंधली-सी लम्बी चीज जिसमेँ छड़ीनुमा एक चमक भी थी… लेकिन ये एक स्वप्न था… फिर भी ये मुझे अजीब क्योँ लगा… कुछ तो कनेक्शन था इसका मुझसे… चलो यार भूलोँ भी… स्वप्न तो स्वप्न है… हाँ वो स्वप्न था लेकिन कुछ अजीब सा… मैँ आज तक डरा नहीँ था किसी स्वप्न से… फिर न जाने क्योँ ये भयभीत कर रहा था मुझेँ… मन का एकांत मानोँ कही चला गया हो… दिल मेँ धड़कने अब सामान्य नहीँ थी… डेढ़ गुना से भी ज्यादा थी… कभी इतना मन हलचला नहीँ हुआ… अब तो शरीर भी अपने सामान्य ताप पर पसीजे जा रहा था… कुछ भी हो मैँ एक शिकार मेँ फंस चुका था… वो था मन का भय… जिसे निकाल पाना किसी आम काम से बने खास काम से भी आसान था… फिर भी जमेँ हुए था… अपनी मूल स्थिति से बढ़ता हुआ… मेरे कामोँ मेँ विघ्न डाले दूर कोनेँ मेँ भय का टाण्डब अपने मेँ मग्न था… और मैँ उसमेँ वशीभूत…

3-)
कुछ भी निश्चित नहीँ है… खासकर हमारे मन का होना… ये अनिश्चित्ताओँ का एक पुलिँदा है… अथाह समुंद्र… उसी समुंद्र मेँ एक खारापन है… जो स्वप्न को दर्शाता है… ये एक पूरा निकाय है… हम इसकी पारदर्शिता (मूल रुप से प्रकृति को) को चाहकर भी भेद नहीँ सकते… न ही इस पर काबू पा सकते… ये हमारी गलत सोँच का परिणाम है कि हममेँ इसे भेदने की पूर्ण शक्ति है… कुछ भी आदर्श नहीँ है… परन्तु ये कहा जा सकता है कि हम अध्यात्म से कुछ हद  तक अपने मन पर काबू पा सकते है… पूर्णतयः अध्यात्मिक होना… पूर्ण रुप से दोषमुक्त होना… ये संभव नहीँ है… पहली बात तो ये कि पूर्णतयः अध्यात्मिक होना किसी ईश्वरीय का होना है… सो तो हम है नहीँ… अध्यात्म हमेँ एकाग्र की ओर ले जाता है… जिसकी यात्रा हमेँ ईश्वरीय दर्शन तक… लेकिन इतनी सामर्थ्य हम मेँ हैँ कहाँ… हमेँ स्वंय मेँ कुछ खोजना होगा… जो हमारे लिए है… जिसमेँ हम निपुण भी होँ… बस यही एक रास्ता है… मन को अपने मेँ नियन्त्रित कर आध्यात्मिक प्रवृति से प्रभु के दर्शन का…

4-)
वेबजह यूँ परेशां नही हुआ जाता… ये जिंदगानी है… आनी है… जानी है… क्या हुआ जो वो मेरे पास नहीँ है… मैँ अपने लहजे से जी सकता हूँ… पहुँच रहा हूँ गाँव के खेत खलिहानोँ मेँ… वो पगडण्डी जो सीधे दिल से जोड़ती थी… सरसोँ के पीले फूलोँ का उगना… भवरोँ का उनमेँ गुनगुनाना… किसी पवन का उनमेँ लहर दे जाना… उसकी लचक… मन की हलचल… सूर्य का अपने रंगो से उसमेँ मिल जाना… मेरा ठहर के सब निहारना… किसानोँ की रखवाली का… खेत की सरसोँ का निश्चित होना… फूलोँ का खिल-खिलाना… कहाँ रहा जा सकता है… कुछ यादेँ है… सरसोँ से खेलती तितली… तितली से खेलता किसान का बच्चा… वो जो अभी अपने पर निकाल सीधा हुआ… दौड़ता… भागता… सरसोँ मेँ रास्ता इज़ाद करता… किसान का अपने बच्चे को यूँ नजर अंदाज करना… मन ही मन बच्चे को निहारना… उनमेँ सपनोँ का बुनना… किसान का स्वप्न… बच्चे का भविष्य… उसका तितली का पकड़ लेना… कहा जा सकता है… लेकिन न मुमकिन है ये… किसान अंधकार मेँ… स्वप्न का धूमिल हो जाना… तितली का अचानक छूट जाना… बच्चे की खुशी का खतरे मेँ होना… किसे दोष देँ… कहना… न कहना… एक जैसा… जो दोषी हैँ… उन्हे समझना भी… अब क्या कहेँ…

-शक्ति सार्थ्य

संक्षिप्त परिचय

नाम-शक्ति सार्थ्य

मूल नाम- शक्ति सिहँ

पता-
ग्राम व पोस्ट-
गैनी, जिला- बरेली,
उत्तर प्रदेश,
पिन-243302
मो. 08881889084

जन्मतिथि- 20 अगस्त 1995.

पूर्व प्रकाशन-

साझा काव्य संग्रह
“सुनो समय
जो कहता है”(2013) मेँ
पाँच कवितायेँ
प्रकाशित,
राज्यभाषा संवाद व्लॉग
मेँ चार कवितायेँ
एंव ‘सार्थक नव्या’
व ‘देशज समकालीन’
पत्रिकाओँ तथा ई-पत्रिकाओँ ‘INVC’ व ‘परिँदे उड़ान अहसासोँ की’ मेँ भी कविताओँ
का प्रकाशन !

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