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यह लेख आपके समक्ष प्रस्तुत करने से पहले मैं आप सभी को अवगत कराना चाहता हूँ कि इस लेख के कुछ अंश मैंने पढ़ कर या फिर विभिन्न रचनाकारों की राय के आधार पर लिखे है, अगर यहाँ पर प्रस्तुत विचार आप की रचना के किसी अंश से थोड़ा बहुत भी मेल खाता प्रतीत हो समझ लीजियेगा कि हाल फिलहाल में मैं आपके लेख, विचार या राय से रूबरू हो चूका हूँ। विचारों की कड़ी में सबसे पहले मैं ‘नौकरशाही डॉट इन’ से लिए गए अंश को आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहूँगा-

“यह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश है क्या?, क्या यह सचमुच अलोकतांत्रिक और ब्रिटिश राज के मनमानी कानून की तरह है जैसा कि अन्ना बता रहे हैं. आइए इन के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को जानें.

मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण यानी किसानों या आम जनता की जमीन को पैसे के बल पर ले लेने का अध्यादेश जारी किया है. इसके तहत-
सरकार जब चाहे और जिस क्षेत्र में चाहे आम
जनता की जमीन ले सकती है और इसके लिए उसे जमीन मालिक से सहमति की भी जरूरत नहीं है. मतलब आप की मिलकियत, सरकार जब चाहे खत्म कर सकती है. सरकार ने यह प्रावधान रक्षाउत्पादन, ग्रामीण इन्फ्रा, औद्योगिक कॉरीडोर के लिए किया है. पहले यानी यूपीए सरकार में यह गुंजाइश थी कि सरकार खेती योग्य जमीन नहीं ले सकती लेकिन एनडीए सरकार के इस नये प्रस्ताव में वह खेती की जमीन भी ले सकती है और उसका मालिक सरकार के खिलाफ आवाज उठाने का भी हक नहीं रख सकेगा.अगर। सरकार आपकी जमीन ले लेती है तो आप
इसके खिलाफ किसी भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का हक भी नहीं रखते. मतलब कि आप की अदालत में भी कोई सुनवाई नहीं होगी. अगर एक बार सरकार ने आपकी जमीन लेने की घोषणा कर दी और उसने उस पर कोई काम शुरू किया या नहीं किया वह उसकी हो जायेगी. जबकि मनमोहन सरकार के कानून के अनुसार अगर उस भूमि पर पांच साल तक कोई काम शुरू नहीं किया गया तो जमीन का मालिक उस जमीन को वापस लेने का हक था. अन्ना हजारे ने जंतर-मंत्र पर इस अध्यादेश को काला कानून बताते हुए कहा कि ऐसे कानून तो अंग्रेजों के जमाने की याद ताजा करते हैं. उनका कहना है कि लोकतांत्रिक देश में ऐसे कानून स्वीकार नहीं किया जा सकते. अन्ना ने कहा कि यह अलोकतांत्रिक कानून है.”

अब विस्तार से चर्चा करते हुए मैंने कुछ प्रश्न और चर्चा हेतु अपने विचार तथ्यों के आधार पर आपके सामने रखे है-

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प्रथम प्रश्न- यह सिर्फ मेरा ही नहीं बल्कि समस्त भारत वासियों का है(क्योंकि हमारे देश की लगभग तीन गुना आबादी कृषि पर आधारित है) कि किसानों की उपजाऊ ज़मीन छीन कर विकास की बात आखिर कहाँ तक सार्थक है?

अगर किसान से उसकी उपजाऊ ज़मीन छीन ली जाए वो भी उसकी बिना सहमति लिए तो फिर यह सरकार का जनविरोधी फैसला है क्योंकि लोकतंत्र बहुमत का खेल है, संख्या का पक्ष है और संख्या में किसान बहुसंख्यक है और औद्योगिक घराने अतिअल्पसंख्यक। अगर सरकार किसानों से उपजाऊ ज़मीन ही छीन लेगी तो दो वक़्त की रोटी को दर-दर भटकने पर मज़बूर किसान आखिर किस विकास की तरफ उन्मुख होगा? यह एक बड़ा और गंभीर प्रश्न है। विकास की बात करके सत्ता में आयी सरकार ज़रा ‘विकास’ शब्द से परहेज़ न करें और भौंदी ‘राजनीतिक परिभाषा’ से विमुख होकर विचार करे तो यह साफ़ तौर पर ज़ाहिर होगा कि यह प्रावधान कत्तई विकास को प्रोत्साहित नही करता। यह विकास सिर्फ चंद औद्योगिक घरानों के लिए सार्थक है एवं किसानों हेतु निरर्थक। अब फैसला और पहला प्रश्न सरकार के ज़िम्मे छोड़ मैं दूसरे प्रश्न पर अग्रसर होता हूँ।

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प्रश्न द्वितीय-क्या किसानों से न्यायालय के दरवाज़े बंद करके लोकतंत्र का गला घोटना सरकार के लिए शोभनीय है?

जैसा कि पहले मैं कह चूका हूँ कि अगर बात किसानों कि है तो यह भारतीय लोकतंत्र और संविधान की बात है क्योंकि किसान यहाँ बहुमत है। अगर सरकार बहुमत को ही अपने हक़ से वंचित रखती है तो यह ज़्यादती नहीं तो और क्या है? भारतीय क़ानून और न्याय प्रत्येक भारतीय नागरिक का हक़ है और सरकार की जानकारी हेतु मुझे अवगत कराना होगा कि किसान भी भारतीय नागरिक है और यह उनका हक़ है। आखिर संविधान में निष्ठा की शपथ लेकर किसानों को हक़ से वंचित रखना कहाँ तक तर्कसंगत है?

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प्रश्न तृतीय- सरकार औद्योगिक लाभ हेतु है या फिर सर्वांगिक लाभ हेतु?

इस योजना से जितना औद्योगिक घरानों को लाभ होगा उससे कई गुना अधिक किसान को नुकसान। जिस प्रकार बिन इंजन के गाड़ी बेकार है, बिना बारिश के छाता ठीक उसी प्रकार बिना उपजाऊ जमीन के किसान| किसान बेकार और बेगारी का जीवन यापन करने पर मज़बूर हो तो इसमें कहाँ विकास है और कैसा हित?

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प्रश्न चतुर्थ-अगर सरकार दावे के साथ खुद को किसान हितैषी कह रही है तो फिर बिन मौसम बर्बाद हुई फसलों से पीड़ित किसानों की मदद के लिए आगे क्यों नही आ रही?

खुद को किसान के भले-बुरे में सहयोगी होने का निराधार दावा करने वाली सरकार की पोल इसी बात से खुल जाती है कि बर्बाद फसलों के मुआवजे हेतु गुहार लगाने वाली किसान की आवाज़ पर सरकार अपने कान बंद कर लेती है और जब यह आवाज़ चीख या गुस्से में बाहर आती है तो लाठियों और गोलियों के दम पर इन्हें दबाने की भरपूर कोशिश की जाती है।

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ज़्यादा लिखूंगा तो बात घुमावदार बनती जायेगी और मैं ऐसा कदापि नहीं चाहता क्योंकि साफ़ और सीधी बात ही साहित्य का विसंगतियों पर चोट है। आशा करता हूँ सरकार समय से पहले खुद को संभाल ले और लोकतंत्र की सुध ले वर्ना लोकतंत्र तो है ही संख्या का खेल! और साथ-साथ किसान भाइयों से भी आह्वान करना चाहूँगा कि आप अपनी आवाज़ बुलंद करें क्योंकि यह आपके हक़ की लड़ाई है। भारत में उद्योग लगाने हेतु अपार बंजर ज़मीन है तो उपजाऊ ही क्यों?

Deepak Singh

लेखक लिटरेचर इन इंडिया के प्रधान संपादक है

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