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काट रहे सब, डाल वही
हैं बैठे जिसको थाम।
बूढ़ा बरगद सोच रहा
दिन कैसे आये राम।

बाग, फूल, तितली  बसंत से रंग
हुआ गायब
झूठे बादल लेकर आता है
अषाढ़ भी अब
बाढ़, अकाल, भुखमरी का
ॠतुयें लातीं पैगाम।

भूमि, भाव की सूखी
उड़ती है स्वारथ की रेत
प्रगतिवाद के सांड़
खा गये नैतिकता के खेत
उगे अर्थ के ‘हट’
परार्थ के पीपल हुये धड़ाम।

पर्वत नंगा हुआ
सूख कर नदी हुई निर्जल
सुविधा के घर लील गये
हरियाली के जंगल
एक-एक कर विदा हो रहे
महुआ, जामुन, आम।


नाम : कृष्ण नन्दन मौर्य
ईमेल : krishna.n.maurya@gmail.com
आवासीय पता : 154, मौर्य नगर, पल्टन बाजार, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश – 230001
माता का नाम : श्रीमती राम कन्या मौर्य

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