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मैने लिखना छोड़ दिया,तुम्हारी झील सी आँखो को
और कहना भी छोड़ दिया,दिल के जज्बातो को
छोड़े नये पुराने सब उपमान, चन्द्रबदन वो गजगमन
सच कहूँ अब ये जेहन मे आते नही

हो नफरत प्यार पर भारीतो ये भाते नही.
न मुझे, न कविता को!पर तुम समझ पाते नही
क्या कहा! तुम अभी भी काव्य मे तुलनाएँ करोगे
जबरन ही सही पर व्यर्थ की उपमाएँ गढ़ोगे
तो बताओ!
‘बम’ के लिए क्या दोगे, क्या कहोगे बन्दूक को…बारूद को
ढूँढो तो उपमान फियादीनो के,क्या कहोगे कब्र को ताबूत को
कभी फुरसत लगे तो चौराहे पे बैठ कर कविता करना
लाल स्याही मुफ्त मे मिल जाएगी
छोड़ दोगे श्रृंगार को जीवन समझना, जब मौत ओ दहशत सामने मँडराएगी


नाम : विनय मूर्ति शर्मा
ईमेल : vinaymyr27@gmail.com
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