प्रयोगवादी रचनाकार : कुछ विमर्श – डॉo मोo मजीद मिया

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1. परिचय :

प्रयोग एवं वाद के योग से प्रयोगवाद शब्द का निर्माण हुआ है। प्रयोग शब्द का पहला अर्थ होता है, किसी भी वस्तु या विषय को व्यवहार में लाने का कार्य या उपयोग एवं दूसरा अर्थ नीति, नियम, सिद्धान्त आदि की स्थापना करके उसे कार्य रूप में लाने की प्रक्रिया। जिन रीतिबद्ध(क्लासिकल) समालोचकों ने प्रयोगवादी रचनाओं के बारे में अपने राय व्यक्त किए हैं, वैसे प्रयोगवदी परस्त समालोचकों को अपने आलोचना में ज्यादा-ज्यादा ध्यान देने की जरूरत हैं। प्रयोग शब्द किसी भी चले आ रहे पुराने परंपरा, सिद्धान्त या मान्यताओं में नए प्रयोग करने अथवा स्थापित सिद्धान्त या वस्तुओं को व्यवहार में लाने का भी अर्थ समझाता है। “प्रयोगवाद शब्द- ‘पहले से चले आ रहे कलात्मक या साहित्यिक परम्पराओं को प्रयोगात्मक रूप से परीक्षण करके उसमें स्थित अनावश्यक तथा निरर्थक मान्यताओं का विरोध करते हुए या वैसे मान्यताओं को त्यागते हुए नए अर्थ युक्त मान्यताओं को लागू करता है’। इस प्रकार प्रयोग शब्द का अर्थ वस्तु या विषय को व्यवहार में लाकर परीक्षण करना है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो श्री गणपतिचन्द्र गुप्त के पाँव आरम्भ में लड़खड़ा गए थे पर बाद में ठीक प्रकार से चलने लगे थे।1 प्रयोगवादी कथाकारों के बारे में गॉर्डन चार्ल्स लिखते हैं- ‘जैनेन्द्र पहले कथाकार हैं, जिनहोने लोगों का ध्यान प्रेमचन्द्र से हटाकर अपनी ओर आकृष्ट किया। जैनेन्द्र, प्रेमचन्द्र के बाद ही प्रमुख हिन्दी कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए है और साथ ही युवा कहानीकार भी आरंभ से कथावस्तु, भावना और भाषा के विषय में उनकी अगुआई स्वीकार करते रहे है। प्रयोगवादी शब्द हमेशा प्रयोगवाद संबंधी, प्रयोगवाद के अनुयायी, प्रयोगवादी शैली शब्दगत विश्लेषण- सिद्धान्त, व्यवहार परीक्षण एवं विचार धारा के प्रतिपादन करने के अर्थ का बोध करता है। इस प्रकार साहित्य के संदर्भ में परंपरागत मान्यताओं को त्याग कर साहित्य में नए-नवेले रूप, संरचना एवं भाषिक विन्यास ही साहित्यिक प्रयोग है।2

2. प्रयोगवाद पर सैद्धान्तिक चर्चा :

विज्ञान के द्वारा मनुष्य को दिया गया नया परिवर्तनशील दृष्टिकोण ही प्रयोग है। अगर देखा जाए तो विज्ञान के युग में बौद्धिक विश्लेषण के बिना किसी भी प्रकार के सत्य को हम स्थापित नहीं कर सकते हैं। जिस प्रकार विज्ञान में प्रयोग एवं तर्क द्वारा पदार्थ का विश्लेषण किया जाता है उसी प्रकार प्रयोगवदी रचनाकार मानव के मानसिक विचार एवं उसके स्थितियों का विश्लेषण करता रहता है। साधारणतः रचनाकार एक वैज्ञानिक के हैसियत से जीवन के स्थिति एवं प्रतिक्रियाओं की मीमांसा करते हुए कलात्मक दृष्टि से उनको अभिव्यक्त करते हैं तदनुरूप नवीन शब्द योजना, शैली या शिल्प का आविष्कार होता है और इसी में प्रयोगवाद की सार्थकता होती है। अज्ञेय और जैनेन्द्र को एक ही श्रेणी में रखते हुए आलोचक वाश्र्णेय का कथन है-  “दोनों भूल गए हैं कि उनके ‘जीवन में भी सत्य और संदेश’ की जरूरत है, दोनों ही अपने कहानी में संशय, निराशा और यौन कुंठा को लेकर चलते हुए नयी कविता को भी वे इसी श्रेणी में रखते हैं।3

कतिपय विद्वानों ने भी चर्चा किया है कि प्रयोगवाद असल में कोई वाद नहीं, क्योंकि नए-नए शिल्प का प्रयोग करने वाले विषयों में सभी वाद का पूर्णतः या आंशिक रूप में झुकाव होता ही है।

उत्तरोत्तर युग में सृजित होने वाले साहित्य में नवीन बिम्ब-प्रतीक, शिल्प का प्रयोग एवं अभिव्यक्ति के नए माध्यमों का प्रयोग होते रहा है, फिर भी प्रयोगवाद द्वारा साहित्य के रचना में प्रयोगशीलता को अत्यधिक महत्व देने के कारण इसे प्रयोगवाद कहना उचित ठहरता है।4 खास करके पूर्व एवं पश्चिम दोनों तरफ के काव्य साधकों में प्रयोगात्मक प्रवृति के प्रति झुकाव पहले से देखा जा सकता है। प्रयोगशीलता के दृष्टि से पूर्व से पश्चिम ज्यादा धनवान है फिर भी साहित्यिक वाद के रूप में काव्य संबंधी एक अलग अभियान के रूप में प्रयोगवाद का जन्म भारत में हुआ है। एतिहासिक रूप में प्रयोगवाद का आविर्भाव 1943 को ‘तारसप्तक’ के प्रकाशन से माना जाता है, जिसके प्रवर्तक ‘अज्ञेय’ थे। पश्चिम के एज्रा पौण्ड एवं टी. एस. इलियट आदि के कविताओं से अधिकतर हमारे प्रयोगवदी कवि प्रभावित देखे जा सकते हैं। प्रयोगवादी कविता यथार्थवादी है, उनका मानवतावाद मिथ्या आदर्श के परिकल्पना पर आधारित नहीं है। वह यथार्थ की तीखी चेतना वाले मनुष्य को उसके समग्र परिवेश में समझने-समझाने का वैदिक प्रयत्न करती है। प्रयोगवाद में नया कुछ भी नहीं होता है और हो भी क्या सकता है, केवल संदर्भ नया होता है जिसमे नया अर्थ बोलने लगता है जिससे विवेक की कसौटी पर खरी उतरने वाली आस्थाएं ही ग्राह्य हो सकती हैं।5

3. उपन्यास एवं प्रयोगात्मकता :

शैली के मिश्रण के संदर्भ से देखने पर उपन्यास में सर्वाधिक मिश्रण सहज एवं सरल स्वभाव में जाता है। उपन्यास के लचकता के कारण जहां कहीं भी इसे घसीटकर या मिला कर किसी भी ढांचा में ढाला जा सकता है। इसी कारण से गाथा तथा आँखों देखी उत्तराधुनिकता तक के आख्यानों को देखने पर ऐसे प्रयोग की निरंतरता की याद दिलाने के साथ-साथ औपन्यासिक प्रविधि के विकासक्रम को भी दर्शाता है, जो नित्य परिवर्तन होते हुए, विविधता एवं भिन्नता में नाना विधि के आकार प्रकार, स्वरूप ग्रहण करते हुए अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित होता है। प्रगतिवाद के समानांतर प्रयोगवाद की धारा भी प्रवाहित होती है जिसका प्रवर्तक अज्ञेय को स्वीकार किया गया है। सन १९४३ में अज्ञेय ने तार सप्तक का प्रकाशन किया, जिसमे सात कवियों में प्रगतिवादी कवि अधिक थे। रामविलास शर्मा, प्रभाकर माचवे, नेमिचंद जैन, गजानन माधव मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर और भारतभूषण अग्रवाल ये सभी कवि प्रगतिवादी हैं। इन कवियों ने कथ्य और अभिव्यक्ति की दृष्टि से अनेक नए नए प्रयोग किये जिससे तारसप्तक को प्रयोगवाद का आधार ग्रंथ माना गया। अज्ञेय द्वारा संपादित प्रतीक में इन कवियों की अनेक रचनाएं प्रकाशित हुई है।6

उपन्यास के अपने स्वरूप, संरचना, कथानक, चरित्र एवं पर्यावरण में कुछ नवीनता मिलाकर उत्तरोत्तर नए-नए प्रवृतियों को आगे बढ़ाने को प्रयोग का सामान्य नियम माना जाता है। यही नए रूप, अभिव्यक्ति एवं शिल्प के खोज के कारण आज उपन्यास के क्षेत्र में विस्तार हुआ है एवं क्षेत्र विस्तार ही आगे प्रयोगवाद में आरोपण के कारण होते जा रहे हैं। प्रयोगवदी कवियों को केवल ‘प्रयोग’ प्रयोग के लिए मात्र न कर कलात्मक उत्कर्ष के लिए करना होगा ऐसा विद्वानों की धारणा है। आज जिन प्रविधि से मनुष्यों(पाठक) को अधिक सम्मोहित किया जा सकता है, वह मान्य सिद्धान्त न होने पर भी पाठक के मन पर शैल्पिक एवं सैद्धान्तिक दोनों दृष्टिकोण से प्रभाव डालता है। आज साहित्‍य के इतिहासकार की पहली समस्‍या ‘समसामयिकता के बोध’ की है और मुझे आशा है कि सिद्धांत रूप से इस बात को सभी जानते और स्‍वयंसिद्धि के समान मानते भी हैं। कठिनाई सिर्फ इतनी है कि यह केवल जान लेने और मान लेने की बात नहीं है। कौन नहीं कहता कि हर युग की आवश्‍यकता के अनुसार इतिहास की बार-बार पुनर्व्‍यवस्‍था होनी चाहिए, परिवर्तन का सत्‍य इतना प्रत्‍यक्ष है कि बड़े से बड़ा शाश्‍वतवादी भी ‘संसार परिवर्तनशील है’ कहता पाया जाता है।7 प्रयोगोन्मुख रचना धर्म भी है अन्यत्र रचना प्रविधि का विकास अथवा नए-नए स्वरूप व नई कविता की व्यक्तिपरक काव्यधारा में भरत जी की अग्रचेत भूमिका रही है। भरत जी का काव्य ऊर्जायुक्त, आत्मविश्वास और काव्य शिल्प की निराली भंगिमा के कारण अपना वैशिष्ट्य रखता है।8 प्रगतिवादी रचनाकार प्रचलित परिमितता में बंधना न चाहते हुए या उस परिमितता ने नया सोंच व्यक्त न कर पाने पर भी दूसरा रास्ता ढूँढने में वह सफल हो जाता है। पुराने मान्यता या नियमों को स्वीकार कर रचना करना होगा ऐसा जरूरी नहीं है क्योंकि दूसरे पद्धति का अबलम्बन नहीं करना, यह सोंच भी प्रचलित मान्यता के प्रति असमर्थ एवं अस्वीकृति की दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। वर्तमान में इसी सोंच के परिणति के स्वरूप विपन्नता, अकथनात्मक, अपरिवेशात्मकता, अवैचारिकता, असंस्कृतिकता, अचिंतनता एवं मिथकीयता जैसी मूल्यों के समायोजन से युक्त रचनाएँ रचित होने लगी है।

इसी पक्ष में अभिमुख होकर रचित साहित्य आज की मौलिक पहचान बनी हुई है। ऐसा चिंतन ‘अकथात्मक’ कथा लेखन एवं ‘अउपन्यासत्मक’ उपन्यास लेखन के द्वारा आख्यान क्षेत्र में प्रवेश किए हुआ है। ऐसे चिंतन का प्रभाव आख्यानेतर विधा कविता एवं नाटक में भी देखी जा सकती है। प्रयोग का नया-नया संकरण बढ़ते जाने पर पाठकों को पारंपरित रूढ रचना के जैसा वैचित्य प्राप्त नहीं हो सकता एवं वैसी रचना सहज स्वीकार्य भी नहीं हो सकता, फिर भी प्रयोग एवं नवीनता के नाम पर सर्वथा अलग पाठ प्रसस्त कर उपन्यास या अन्य विधा अपने स्वभाव से भी हटता हुआ दृष्टिगोचर होता है। प्रयोगात्मक साहित्य की रचना करते समय यह बौद्धिक एवं सामान्य पाठक के लिए उपर्युक्त है की नहीं, यह ध्यान मे रखना आवश्यक होता है। इसी दृष्टि से प्रयोगात्मक उपन्यास आरंभ में अस्वाभाविक लगने पर भी धीरे-धीरे पाठकों को आदत हो गई है, यह बात भी सत्य है प्रयोगात्मक उपन्यास आगे चलकर प्रयोगधर्मी रचना होने के कारण प्रयोग केबल मात्र सैद्धान्तिक आग्रह मात्र बनकर रह जाता है, ऐसी स्थिति में लेखक नया प्रयोग कर नाम एवं दाम कमाने के लालच में पर कर रचना करना प्रारम्भ कर देता है। अगर देखा जाए तो प्रयोग साहित्य की बाध्यता भी है, क्योंकि दूसरे साहित्यकारों से पृथक दिखने की लालसा से साहित्यकार नया रास्ता अपनाने के ताक में हमेशा रहता है। प्रयोगवाद के रूप में रूपांतरित होने पर वही बातें सिद्धान्त एवं दर्शन बन जाता है एवं उसमे पयोग का अंश बाँकी नहीं रह जाता है। अतः प्रयोगवाद होकर भी इसकी प्रवृतियाँ प्रयोगशील रहता है।

प्रयोगवाद साहित्यिक रूढ़ि को तोड़कर नए परंपरा का स्थापना करता है। यह वाद प्रगति में आस्था रखने के कारण इसकी गतिशीलता एवं नवीनता इसकी धड़कन होती है। अतः परंपरा से हटकर नवीनता लिए सभी उपन्यास प्रायोगिक उपन्यास होते है। प्रयोग हमेशा सापेक्षता पर आधारित नहीं होता है बल्कि प्रयोग का तात्पर्य ‘उपन्यास की परंपरागत मूल्यों को धराशाई करके नए क्षेत्र का अन्वेषन को समझना होता है। विशेषकर उपन्यास लेखन के क्रम में आजकल ‘नए उपन्यास’, ‘अउपन्यास’, ‘अधिउपन्यास’ आदि प्रयोगवादी उपन्यास की रचना करते देखा जाता है।

प्रयोगवाद के इतने लंबे बहस के बाद इसके प्रवृति एवं विशेषताओं को क्रमबद्ध रूप में इस प्रकार देखा जा सकता है।

Ø नए कथ्य, नए पद्धति एवं नए संभावनाओं का खोज करना

Ø रूढ बन चुके नियमों पर प्रश्न खड़ाकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना

Ø जिज्ञासा को शांत करने के लिए नया प्रयोग कर उसके कलात्मक गुणों का परीक्षण करना

Ø चमत्कार को महत्व न देकर विवेक के प्रयोग के लिए रचनाकारों को प्रेरित करना

Ø नवीनता के प्रति आस्थावान रहकर प्रकृति के विकाश में योगदान देना

Ø प्रयोग अपने में ही पूर्ण न होने के कारण लुप्त एवं नवीन सत्य के साक्षात्कार का प्रयास करना, कथ्य, शैली एवं भाषा का नए प्रयोग एवं प्रणाली से नवीन सौन्दर्य का खोज करना

Ø अतियथार्थवाद एवं अस्तित्ववाद से प्रभावित होकर असपष्ट एवं विकृत रूप में यथार्थ का उदघाटन करना

Ø कल्पना का प्राय अभाव होना

Ø आत्म ग्लानि या लघुताबोध का उदघाटन करते हुए अपने दुर्बलता एवं खिन्नता को बौद्धिक आवरण से ढंकने की कोशिश करना

Ø कलापक्ष या शिल्प से मुक्त छंद एवं उन्मुक्त नवीन प्रयोग के लिए प्रयास करना

Ø व्यंग्य एवं वैचित्य का प्रदर्शन करना एवं यौन प्रतीक का आधिक्य होना

वास्तव में सामाजिक जीवन प्रणाली एवं परंपरागत मान्यता के प्रति शंका एवं असंतोष व्यक्त कर प्रयोगवाद निजी मान्यता एवं प्रयत्नों को विकसित एवं परिमार्जित करने की कोई खास योजना नहीं है। ‘प्रयोग’ का केबल प्रयोग के लिए उपयोग मात्र करने पर रचना की कलात्मक वैचित्य लुप्त हो जाता है और कठोर प्रयोग का शैल्पिक आग्रह नए उदभावना के मोह के कारण उपन्यास शिथिल हो जाता है एवं अपने स्वभाव को खोने की कगार पर पहुँच जाता है। जिसके कारण स्थापित मूल्य को जड़ से उखाड़ कर नए किसी भी मूल्य एवं मान्यताओं की स्थापना नहीं हो सकती है? प्रयोगवादी साहित्यकार जीवन एवं जगत के प्रति उदासीन होकर काव्य के बहिरंग के पक्ष में यानि शिल्प संधान में अपना ध्यान केन्द्रित करता है। इस वाद में काव्य की उपयोगिता से ज्यादा कथन के चमत्कार को महत्व देता है। अतः प्रयोगवाद जीवन एवं जगत के अनुभूतियों को उतना महत्व न देकर व्यक्ति वैचित्य को ही सर्वस्व मानता है। आज इस परिपाटी के कारण ही साहित्यकार धीरे-धीरे कहीं अंधेरे में विलुप्त होता चला जाता है।

संदर्भ ग्रंथ :

1. हिन्दी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचंद्र शुक्ल

2. हिन्दी साहित्य में प्रयोगवाद – जी. भास्करमैया

3. गॉर्डन चलसे रोदरमल हिन्दी कहानी पृ. सं. 28

4. प्रयोगवाद – संपादक- मिथिलेश वामनकर

5. प्रयोगवाद और अज्ञेय – डा. रजनी सिंह

6. आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास – पूर्णिमा वर्मन

7. हिंदी-साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार – नामवर सिंह

नाम : डॉo मोo मजीद मिया
ईमेल : khan.mazid13@yahoo.com
आवासीय पता :
एस एम एस एन हिंदी हाई स्कूल
पोस्ट-बागडोगरा

जनपद-दार्जीलिंग

पिन-७३४०१४

माता का नाम : नुरबेन बेगम
पिता का नाम : मो० कासिम मिया

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