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तुम्हें न देख पाने के वचन से बँधी हुई हूँ मैं ।
संवेदना का कत्ल कर कब से सोई नहीं हूँ मैं ।
जन्म देकर तुम्हें सौंप दूँगी उन्हें,
क्योंकि किराए पर तुम्हें जन्म दे रही हूँ मैं ।

चिकित्सा के बाज़ार में मजबूर खड़ी हूँ मैं ।
विज्ञान को विजय दिला, पराजित हुई हूँ मैं ।
विपन्नतावश  कोख का सौदा करने के लिए,
मुँह ढाँककर ममता बेचे जा रही हूँ मैं ।

दे औलाद उन्हें अपने बच्चे खो रही हूँ मैं ?
कितनी ही कुण्ठा से ये सब कर रही हूँ मैं ।
देखा नहीं बड़े दिनों से अपने भूखे बच्चों को,
हाय ! यहाँ आकण्ठ खाए जा रही हूँ मैं ।

विज्ञान के औजार से तराशी जा रही हूँ मैं ।
रोज परखनली बनाकर हिलाई जा रही हूँ मैं।
आनुवांशिक-औलाद से तृप्ति की खातिर,
माँ होकर भी “सरोगेट” कही जा रही हूँ मैं ।

बिखर रही ममता को नहीं समेट पा रही हूँ मैं ।
आत्मग्लानि की लपटों में जल रही हूँ मैं ।
मेरी बंद मुठ्ठी से मेरा बच्चा रेत-रेत छिन रहा है,
अमीरी के समंदर में बहाई जा रही हूँ मैं ।

नाम : डॉ. शुभ्रता मिश्रा
ईमेल : shubhrata@rediffmail.com
आवासीय पता : (डॉ. शुभ्रता मिश्रा)
स्वतंत्र लेखिका
204, सनसेट लगून, विज़ी बी स्कूल के पास
बायना, वास्को-द-गामा
गोवा-403802
माता का नाम : श्रीमती मालती पुरोहित
पिता का नाम : स्व. श्री श्यामाचरण पुरोहित

(वैज्ञानिक लेखिका एवं अनुवादक)

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