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झक सफेद
खद्दर की लिबासों में लिपटे
अंतर्मन से काले लोग.
देश के नक्शे में
कुर्सी के लिये
एक दौड़.
वोट की जोड़ तोड़.

कुछ वैसी ही होड़
जैसी कुर्सी दौड़
बचपन में
हमने भी दौड़ी है
गोल चक्कर में.

अंतर केवल इतना है
कि तब
एक ही कुर्सी कम होती थी
दौड़ने वालों की सँख्या से.
जिस बच्चे को कुर्सी नही मिलती थी
घंटी बंद होते ही
वह रुआंसा होकर खेल से बाहर हो जाता था

पर यहाँ
एक ही कुर्सी होती है
और
दौड़ने वालो की संख्या
कितनी भी हो सकती है.
जिसे एक बार कुर्सी मिल गई तो
कितने भी घंटे बजाओ वह
उठता ही नहीं है , चिपका ही रहता है
कुर्सी से
जब तक वह बैठा रह सकता है .
और बैठे बैठे ही फिर दौड़ने लगता है
और बेहतर कुर्सी के लिये .

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी 11 विद्युत् मण्डल कालोनी रामपुर जबलपुर

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