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मैगी की शुरुआत इतनी नयी नहीँ है जितना की आम आदमी भारत में सोचता है। मैगी का प्रचलन 2004 के बाद बहुत ज्यादा बढ़ गया पर क्या आपको पता है कि आपके पसंदीदा खाद्य पदार्थो में से एक रहे मैगी का इतिहास क्या है? आखिर कितना पुराना है आपका मैगी ब्राण्ड? आइए हम आपको बताते है।

मैगी का इतिहास

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मैगी ब्रांड के जनक जूलियस मैगी का जन्म 9 अक्टूबर 1846 में स्विट्ज़रलैंड में हुआ। उनके पिता माइकल मैगी स्विट्ज़रलैंड में ही एक मिल के मालिक थे। 1872 में माइकल मैगी के देहांत के बाद जूलियस ने मिल का कार्यभार अपने हाथों में ले लिया। जल्द ही खाद्य उत्पादों में जूलियस का नाम सबसे पहले गिना जाने लगा क्योंकि मैगी के उत्पादों का उद्देश्य श्रमिक वर्ग को पोषक तत्वयुक्त खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना था। मैगी पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने पोषक तत्वयुक्त खाद्य पदार्थो पर अधिक बल दिया और उन्हें बाजार में उपलब्ध करवाया।

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1886 में सबसे पहले इस श्रृंख्ला में मैगी ने बना-बनाया सूप बाजार में उतारा। 1897 में मैगी ने मैगी GmbH नाम से सींगें के जर्मन टाउन में एक कंपनी की स्थापना की जो आज भी उसी जगह पर स्थित है।

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सन् 1947 में नेस्ले ने मैगी का अधिग्रहण कर लिया और तब से लेकर आज तक नेस्ले ही मैगी को पाल-पोष रही है। आज मैगी चीन, पाकिस्तान, ताइवान, वियतनाम, थाईलैंड, मेक्सिको, सिंगापुर, मलेशिया, ब्रुनेई, जर्मन भाषी देशों, नीदरलैंड, स्लोवानिया, पोलैंड, फ्रांस सहित भारत में अपने पाँव जमा चुकी है।

विवाद

1 – अक्टूबर 2008 में बांग्लादेश में भ्रामक विज्ञापन हेतु ब्रिटिश एडवरटाइजिंग स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ने मैगी उत्पाद हेतु स्पष्टीकरण माँगा जिसमें यह दावा किया गया था कि मैगी खाने से ‘ मजबूत मांसपेशियों, हड्डियों और बालों के निर्माण में मदद मिलती है’|

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2 – मई 2015 में खाद्य सुरक्षा विभाग ने अपनी प्रारंभिक जांच में पाया कि मैगी में आदेशित मात्रा से 17 गुना ज्यादा शीशे के तत्व

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और साथ ही साथ एमएस जैसे खतरनाक कैंसर के कारक तत्व है।

3 – 3 जून 2015 को नई दिल्ली सरकार ने 15 दिन के लिए मैगी पर प्रतिबन्ध लगाया।

4 – 4 जून 2015 को 39 में से 27 सैंपल के नेगेटिव पाये जाने के बाद गुजरात खाद्य विभाग ने 30 दिन का प्रतिबन्ध लगाया।

5 – बिग बाजार, इजी डे आदि ने अपने शोरूम से मैगी को हटाया।

6 – 4 जून 2015 को तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रतिबन्ध।

7 – 5 जून 2015 को आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा प्रतिबन्ध।

8 – 6 जून 2015 को भारत सरकार द्वारा अनिश्चित काल तक मैगी पर प्रतिबन्ध एवं उसी दिन नेपाल सरकार द्वारा प्रतिबन्ध।

कितना सही है प्रतिबन्ध?

रिपोर्ट एवं सूत्रों के अनुसार नेस्ले ने मैगी के सैंपल की जांच करायी और सरकारी प्रयोगशालाओं में जांच करायी गयी। दोनों ने एक ही प्रान्त से नमूने लिए और दोनों की रिपोर्ट अलग-अलग है! हालाँकि दोनों ही प्रयोगशालाएं मान्यता प्राप्त है। इससे कई बाते उभर कर सामने आती है –
1 – दोनों में से कोई एक प्रयोगशाला असक्षम है।
2 – दोनों में से किसी एक प्रयोगशाला में जांच हेतु उपकरण की कमी है।
3 – दोनों में से किसी एक में काम कर रहे वैज्ञानिकों में तज़ुर्बे की कमी है और यह बात कम से कम मेरे गले से तो नही उतर रही।

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चलिए अगर यह भी मान लिया जाय की सरकारी प्रयोगशाला की रिपोर्ट ही सही है पर एक बात और कि खुलेआम बिक रहे गोलगप्पे, चाऊमीन, गुटखे, सिगरेट, दारू, पानमसाला आदि क्या सेहत के लिए लाभदायक है?

आपने देखा होगा कि सफ़ेद सा पदार्थ जो चाऊमीन, गोलगप्पे आदि में धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है वो आपकी ग्रंथियों को सुन्न सा कर देता है और आपको स्वाद का पता भी नही चलता। इसी के फलस्वरूप आप सड़ा-गला आदि कुछ भी बड़े चाव से खाते है।

अगर गुटखे, तम्बाखू आदि के मालिक सरकार को उम्मीद से ज्यादा पैसा कर के रूप में देते है तो इससे यह तो साबित नही होता कि इनके उत्पाद सेहत के लिए फायदेमंद है!

क्या मैगी की बिक्री बंद हो जायेगी?

मुझे तो नही लगता कि ऐसा कुछ होने वाला है। इस बात पर कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है –

“तेरी महफ़िल में सब कुछ मुनासिब है…
बस छुपाने के लिए परदे का इंतज़ाम कर ले…”

आप सभी को याद होगा कि 2003 में संसद में एक विधेयक पारित हुआ था सिगरेट और तंबाकू आदि पर प्रतिबन्ध लगाया गया था पर क्या आपको लगता है कि ऐसा कुछ हुआ? आज भी लोग दारू पीकर सड़को पर नाचते दिख जाते है, आज भी लोग सिगरेट का धुँआ उड़ाते आसानी से दिख जाएंगे। ठीक इसी तरह मैगी का इतना उत्पाद तो बाज़ार में आ ही चूका है कि छः से सात महीने तक आराम से लोग सेवन कर सके। अब छः या सात महीने बाद क्या होगा यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा। वैसे एक बात तो साफ़ है कि डर से मैं तो मैगी खाना बंद ही कर दूंगा।

(सन्दर्भ – विकिपीडिया, यंगिस्तान डॉट इन, मैगी, संसद विधेयक, तंबाकू अधिनियम और बीबीसी हिंदी)

Deepak Singh
ठाकुर दीपक सिंह कवि
प्रधान संपादक
लिटरेचर इन इंडिया जालपत्रिका

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