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मै बुजुर्ग हूँ रिटायर्ड हूँ पेंशन पर जीता हूँ
पेंशन क्या इससे ज्यादा तो टेंशन पर जीता हूँ
कोल्हू के बैल-सा घर के सारे काम कर जाता हूँ
बदले में सिर्फ अपमान के शब्द ही पाता हूँ

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हूँ जिँदा मगर मर मर के ही जीता हूँ
रोज अपमान के आँसू -गम पीता हूँ
राम -सीता से बेटे बहू को मैने है पाया
अपने को मिटा खुद को रिश्तों में है दफनाया

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हूँ लाचार और टुकडों पर ही जीता हूँ
हूँ जिंदा  मगर मर मर के ही जीता हूँ
काश मैंने खुद को कमजोर न बनाया होता
खुद को परतंत्र और लाचार न बनाया होता

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बीस हजार रुपये पेंशन पाता हूँ खाली हाथ हूँ
घर से संपन्न हूँ दस रुपयों को मोहताज हूँ
पर मै भी अब कुछ नया प्रण कर जाऊगाँ
जिन्दगी को अपनी शर्तों पे जियूँगा जी जाऊगाँ
करूगाँ समाज सेवा अपने धर्म को निभाऊगाँ
जिंदगी अच्छे से जियूँगा इसे सफल बनाऊगाँ।

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द्रोणाचार्य दुबे
कोदरिया महू

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