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जम जाता था पानी जिन माघ पूस की रातों को
उन रातों को जाग-जाग कर अपना चादर तुझे ओढ़ाया है
निस्वार्थ भाव से चाहा तुझको हरपल हरदम
रात- रात भर गीले से सुखा तुझे कराया है

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देख बुरा सपना तू उन रातों को जग जाता था
डरकर अँधेरे से जब माँ माँ तू चिल्लाता था
छोड़- छाड़ कर सारा काम गहरी निद्रा ऐशो आराम
‘चुप हो जा मेरा लल्ला’ ये कहकर गोद तुझे उठाती थी

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रह रहकर रोता था तू
सारी रात तुझे सुलाती थी
आ जाए निंदिया मेरे लल्ला को
मीठी लोरी तुझे सुनाती थी

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इतने पर भी नींद ना आती
बांहों का झूला तुझे झुलाती थी
देख कदम तेरा पहला
ख़ुशी के आंसू रोती वो निश्छल अंखियाँ
रखती वो माँ उपवास कई
मिल जाये बेटे को  सारी खुशियाँ

संतान सप्तमी , हरछठ के काश बेर के काँटों को
तिल चौथ के तिल भरे उन पत्थर के पाटो को
पूजा सब देव धरम को और माना सब बातों को
करती थी उपवास दिन दिन भर
भूखे प्यासे रह जाती थी
ना भूल उस दिन को दया हीन
जब पारन का पहला निवाला तुझे खिलाती थी

जब जाता तू पढने बाहर
लड़ लड़ कर ज्यादा पैसे तुझे दिलाती थी
जब न आता पढना लिखना
बुला बुला कर राजू पिंटू को फ़ोन तुझे लगवाती थी

सास बहु की कहा सुनी में तू बीवी संग हो जाता है
आकर फिर बहकावे में उस माँ को खरी खोटी कह जाता है
भूल भाल तू सारे उपकार तू अलग सेटेल हो जाता है
खेलूंगी पोते पोती संग सपना फिर सपना रह जाता है

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मै गजेन्द्र सुनता जब घर घर के ये किस्से
माँ हो जाती है तन्हा खुशियाँ आती है बीवी के हिस्से
उस युवा पीढी से सन्देश गजेन्द्र का
अच्छे बेटे बहु क्या कहलाओगे
एक दिन होना फिर ऐसा है
क्योंकि बीज बबूल के बोए
तो आम कहाँ से पाओगेे

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कवि गजेन्द्र परिहार ‘शहजादा’
पिता – श्री रमेश सिंह परिहार
माता- श्रीमती गीता सिंह परिहार

पता – शिक्षक जिला शहडोल संकर टाकीज के सामने वार्ड  7 मध्यप्रदेश
पोस्ट बिजुरी तहसील कोतमा
जिला अनुपपुर
वर्तमान पता
पत्रकार कालोनी शहडोल  जिला शहडोल 484440

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