नौ दिन चले अढायी-कोष – राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)

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जब से  हम  आजाद  हुये  हैं, सीमाओं  को झेल रहे हेैं

अगल-बगल  के नंगे-भूखे  शरणागत खुश खेल रहे हेैं

कितने पी.एम.सात दशक से पूरी  दुनिया छान चुके हेै

धन – वैभव  में  जीने  वाले  सभी हमे  पहचान चुके हेैं

आध्यात्म  के  गुरू  हमारे  भीख   वहीं  से माँग रहे हैं

ऋषि – मुनि की  गुप्त   धरोहर, अय्यासी मे टाँग रहे हैं

परदेशों  की  सारी परियाँ  मठ  की महिमा बढा रही हेै

धर्म – कर्म  की  पूँजी, बाबाओं   की  पीढी  सढा रही है

सीमाओं  के  झगडो  में   बस  बाते   ही  बाते  होती हेै

नयी – नयी  सरकारें आकर नये  बीज  फिर से बोती है

शदी बीत  गयी राजनीति  का सारा धन्धा  ही थोथा है

चलने  का  प्रमाण लक्ष्य  पर  सदा  पहुंचना ही होता हेै

नेहरू,इन्दिरा,अटल भी घूमे, मनमोहन  मस्ती में झूमे

अब मोदी को समय मिला हैे,वो भी  राष्ट्र भक्ति को चूमे

बीच-बीच  में  अल्पमतो की सरकारों  ने  मौज उडायी

सारे   झगडे   वहीं  खडे    है,  ये  कैसी  रणनीति भाई

जनता  के  पेैसे  से  अब  तक  सबने  हानीमून मनाया

एक उदाहरण  मुझे  बतादो  नेता  ने  झगडा निपटाया

पीछे – पीछे   लावा-लस्कर, टी. वी .चैनल  दौेड  रहे हेैं

भारत-भाग्य-विधाता  ही तो, भारत  को निचोड रहे हैं

सभी विदेशी भारत  आकर  अपने   मशले हल करते है

भारत के जन गण मन  नायक,घास विदेशों मे चरते है

विदेश नीति से तिब्बत,बंग्ला  और   नैपाली पाल रहे है

कवि आग भी झुलस  रहा है,नेता ही  क्यों  काल रहे है।।

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             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)

लिटरेचर इन इंडिया समूह

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श्रेणी कविता

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