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कुछ दिन पहले की बात है
कुछ को पैसे कमाने की धुन थी
पास में था सबकुछ फिर भी संतोष मुश्किल था
कुछ पाने की होड़ में शहर की तरफ चला
छोड़ दिया उसमे अपना हँसता खेलता जीवन
कुछ उड़ान लेनी थी उसको करना था कुछ सृजन

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कुछ दिन ही अभी बीते थे
लिखा उसने मुझे एक ख़त
नौकरी मिल गयी मुझे पर सुकून
अभी भी नहीँ मिलता है
दोपहर कारोबार में कटता है
सर दर्द में शाम गुजरता है

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लोग यहाँ अपने जैसे ही है
पर अपने नहीं है
देश भी अपना ही है
पर खो सा गया है किसी  गर्त में
नींद ढंग से आती नहीँ किसी को
जीवन उजरा पड़ा है
पैसे जुटाने के शर्त में

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लोक लाज सब टांग दिए
फैशन में सब मदहोश हैं
बच्चे पार्टी मना रहे हैं
घर में बूढ़े बेहोश हैं

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अन्दर का काम अब होने लगा बाहर
बाहर का होने लगा अन्दर
चाल और चरित्र का क्या पूछना
हालत देख शर्मा जाये बन्दर
रिश्तों की परिभाषा भी बदली सी है

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जरुरत के हिसाब से चाचा चाची अंकल और अंटी
जिससे हो काम निकलवाना
बांध दिया भैया और दोस्ती की घंटी
अगर पैसे पास मे हो तो रिश्ते नहीं कीमती है
सारी माया यहाँ पैसो के आगे सिमटी है

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रिश्ते बढा सकते हो निभा सकते हो
विश्वास न करना बस इतनी सी विनती है
कृष्ण – सुदामा , राम – सुग्रिव ,
कर्ण –दुर्योधन को सब भूल गये
भाई- भाई के रिश्ते यहाँ
बंटवारे में झूल गए

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सावित्रि –सत्यवान  राम सिता
अब इनको नहीं भाते है
करो गर तुम प्रयास इन्हे समझाने का
ये आधुनिकता का गीत गाते है
जन्मोत्सव के चक्कर मे यहाँ
माँ की दवाइयों का ख्याल नही रहता
पैसे कैसे भी कर लो जमा
यहाँ किसी के आंसू का मलाल नहीं रहता

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यहाँ ऊँची ऊँची इमारतें  है
पर मुझको वो नही लगता घर
नही फर्क पड़ता किसी को
चाहे तड़प के पड़ोसी जाये मर

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अजादी के बाद तरक्की कुछ अजब हो गयी
हम निचे से महंगे और ऊपर से खाली हो गये
लानत है एसे धन के संचय पर
गांव वाले को छोड़ दो
यहाँ तो सम्बन्धी भी मवाली हो गये

अब मुझे यहाँ कुछ भी पसंद नही आता है
दिल नही लगता मेरा यहाँ पर
न कुछ भी मुझको भाता है
मेरे रोकने से भी न रुके मेरा मन
अब ये गीत गांव का ही गाता है

मुझे अब ऐसा लगता
मेरा भारत आज भी गाँवो में बसता है
कैसे हो सकता है मेरा देश ऐसा
हर रिश्ता जहां एकदम सस्ता है
हम ॠषि  – मुनियों की संतान
अपनी हर सभ्यता संस्कृति बहुत धनी है
चाहे बात हो लोक – लाज की
या हो मानवता और मनुजता की
मेरा गांव इन सबमे आज भी अग्रणी है
जहाँ किसी के आने पर
अनुभव होता है उल्लास  का

मेहमान पूजे जाते जहाँ
रिश्तों का एहसास  कराता
व्रत और उपवास
कौवों के आवाज़ में अभास होता
किसी के आने के सन्देश का

हर मौसम हर बेला मे
एक नूतन समावेश का
अपनी गलती के लिये
जहाँ भगवान को नहीं कोई कोसता है
मुझे अब ऐसा लगता
मेरा भारत आज भी गाँवो में बसता है
वहाँ घर का मालिक पैसे कमाने से तय नहीं होता

बड़ों की आँखों में छोटो का भय नहीँ होता
प्रतिष्ठा के लिये चढ़ जाते हँसते-हँसते सूली पर
चन्द रुपयों के खातिर जहाँ ईमान का क्षय नहीँ होता
जहाँ समृद्ध बनने के लिये मेहनत ही एक मात्र रास्ता है
मुझे अब ऐसा लगता मेरा भारत आज भी गाँवो में बसता है

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जहाँ भोर का एहसास
चिड़ियों की चहचहाहट कराती है
मुर्गे की तान जहाँ  नित्य हमें जगाती है
सूरज चाँद तारे जहाँ सब अपने से लगते है
फुलवारी में आज भी जहाँ पर किसी की चाह मे बंशी बजते है
जहाँ देख हर्षित दूसरे को मन अपना भी  मुस्कुराता है
मुझे अब ऐसा लगता मेरा भारत आज भी गाँवो में बस्ता है

जलज कुमार अनुपम

पिता का नाम : पं शर्मा नन्द मिश्र
माता का नाम :  स्वर्गीय गायत्री मिश्र
आवास : बेतिया पश्चिमी, चंपारण बिहार -८४५४३८,भारत
शिक्षा : बी .टेक (इलेक्ट्रॉनिक्स), एम .यू.ए.स.ई .ई(ऑस्ट्रेलिया)

पेशा : प्रबंधक (टेक्नीकल),राइज  एलेवेटर्स, नईदिल्ली, भारत
पुरस्कार : चन्द्रेशेखर आज़ाद अवार्ड -२०१५ (समाजिककार्यो हेतु)
प्रकाशित रचनायें: बाल कथा (२००९),कवितायें

©लिटरेचर इन इंडिया समूह

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