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समुंदर की रेत पर
बैठ कर जब हम
सूरज की किरणों को
निहार रहे थे,
उंगलियाँ भी रेत पर
कुछ बुनबुना रही थी,
दबे पाँव जब
सूरज ढ़ल रहा था
आसमान से,
चुपके से किरणें
कानों में कुछ नग़में
गुनगुना रही थी।
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उंगलियाँ नाच रही थीं
रेत पर जैसे किसी
अंजान नगरी में
भटकती हुई
रूह की तरह,
और हवा के झोंके से
तान देते हुए,
मन भी कहीं
शरमा रहा था,
तेरी यादों को
लिपटाये हुए।
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कभी बाग में
झूला झूलते हुए,
तो कभी पेड़ के नीचे
आम खाते हुए,
वह बचपन की शरारत,
वह मेरा तितलियों
के पीछे भागना
और मेरे पीछे तुम ।

याद है आज भी..
वह बचपन का झूला
वह आम का पेड़,
वह लहराते हुए बाग,
और उड़ती हुई तितलियाँ।
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©लता तेजेश्वर

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