सुधा-शुचि मेरी माँ – डॉ. शुभ्रता मिश्रा

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मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।
मैंने मेरी माँ के अंदर मुझको पलते देखा है ।

अपनी बेटी के सुंदर मुख को जब,
मैंने पहली बार निहारा था ।
मेरी आँखों में मैंने,
अपनी माँ के भावों को पाया था ।
बेटी की खुशबू में माँ के फूलों को झरते देखा है ।
मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।।1।।

तुमको बस आगे बढ़ना है,
संघर्षों की मंजिल चढ़ना है ।
तुम सफलताओं की मूरत बन,
मेरे सपने साकार करो ।
माँ की इस अभिलाषा को प्रतिपल सँवरते देखा है ।
मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।।2।।
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अपने बच्चों के भावी जीवन से,
कोई समझौता नहीं होगा ।
मैं खड़ी हुई हूँ जिस पथ पर,
कोई व्यवधान नहीं होगा ।
इस शपथ पूर्ति हेतु माँ को मौन-झगड़ते देखा है ।
मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।।3।।

नियमों धर्मों के पालन में,
सख्त अनुशासित मेरी माँ ।
जिज्ञासु और कितनी भोली,
जीवंत ग्रंथ-सी, विदुषी मेरी माँ ।
मैंने उनको ग्रंथों से दिनभर बतियाते देखा है ।
मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।।4।।

रूढ़ियों के शरों शूलों पर,
निडर चलीं हैं मेरी माँ ।
आत्मविश्वास से सराबोर,
शैलसुता-सी संस्कारी मेरी माँ ।
ससुराल की सीमा छूते ही झट सिर को ढकते देखा है ।
मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।।5।।
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प्रारब्धों के टकरावों से,
अंदर-अंदर कितनी टूटीं माँ ।
अपनों के बिखरावों को,
पल-पल समेटती मेरी माँ ।
चलचलकर अब थके हुए माँ के पैरों को थमते देखा है ।
मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।।6।।

जीवन के हर राग से तृप्ति,
पीड़ा का भी क्षोभ नहीं ।
केवल अब विराग विरक्ति,
किसी बात का लोभ नहीं ।
मैंने मेरी माँ को अब ऐसे तपस्वी बनते देखा है ।
मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।।7।।

वैसे तो भारत का हर घर पूर्ण महाभारत,
आंशिक रामायण होता है ।
बस हर घर की माँ एक उपन्यास,
स्थायी भाव की सीता है ।
वरना तो हर घर में किरदार बदलते देखा है ।
मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।।8।।

जीवन के संचालन में,
हर रोज़ वही सब होता है ।
जो माँ के साथ हुआ करता था,
किंचित कुछ वैसा ही मेरे साथ भी होता है ।
मेरे हाथों में भी शायद माँ के हाथों की रेखा है ।
मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।।9।।

माँ बनने पर जाना मैंने माँ मुझमें,
कितने अंदर तक बैठी है ।
हर युग में हर स्त्री बस,
अपनी माँ की ही बेटी है ।
मैंने मेरी माँ के अंदर मुझको पलते देखा है ।
मैंने मेरे अंदर मेरी माँ को बनते देखा है ।।10।।

नाम : डॉ. शुभ्रता मिश्रा
माता का नाम : श्रीमती मालती पुरोहित
पिता का नाम : स्व. श्री श्यामाचरण पुरोहित
आवासीय पता : स्वतंत्र लेखिका
204, सनसेट लगून, विज़ी बी स्कूल के पास
बायना, वास्को-द-गामा
गोवा-403802

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