छोटी भाभी – डिम्पल गौड़ अनन्या

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गुलाल में लिपटी छोटी भाभी पूरी गुलाबी नज़र आ रही थी ! मैंने  निशा की तरफ देखा वह एक कोने में बेरंग ही बैठी हुई थी |
“क्या है निशा ! आज के दिन भी तुम सब से अलग थलग ही रहोगी ! त्योहार का तो मान रख लिया करो कम से कम !”

“मेरी तबियत सही नहीं है ! तुम खेलो होली तुम्हें मैंने मना किया है क्या ? वो है न तुम्हारी छोटी भाभी !! देखो कैसे रंगों में तरबतर हो रही है ! जाओ तुम भी लगा दो थोड़ा और रंग! अजीब हो तुम भी ! न खुद खुश रहती हो न दूसरों को रहने देती हो…और हाँ छोटी भाभी के  पैरों की धूल भी नहीं हो तुम… समझी न ! रात के नौ बजते ही तुम्हें तो तुम्हें सोना होता है ! मेरी फ़िक्र है कहाँ तुम्हें ! एक छोटी भाभी ही है जो रात के ग्यारह बजे भी मुझे गरम रोटियाँ सेक कर देती है ! एक वही है जिसकी वजह से यह घर दौड़ रहा है ! एक तो बड़े भैया अपने परिवार को साथ ले कर अमेरिका बस गए…और ऊपर से तुम !

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उह्ह ! तुम और तुम्हारी छोटी भाभी ! ऐसा कहती हुई पैर पटक कर अपने कमरे में चली गयी निशा | तभी होली मिलन के लिए बहुत से रिश्तेदार आ पहुँचे | छोटी भाभी ने सबके जलपान की व्यवस्था करवाई…मेहमानों की आवभगत करने में छोटी भाभी का कोई जवाब ही नहीं था |

अरे विवेक ! तुम्हारी बहु कहाँ है ? सबसे छुपा कर रखते हो भई !”

“ आज उसे बुखार है न इसीलिए अन्दर कमरे में है…मैंने ही जबर्दस्ती भेजा उसे…वरना वो कहाँ काम छोड़ने वाली थी ! छोटी भाभी मेरी पत्नी निशा की तारीफें किये जा रही थी और अन्दर कमरे में वह जलभुन कर राख हुए जा रही थी |
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डिम्पल गौड़ अनन्या

अहमदाबाद (गुजरात)

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