ग़ज़ल – गोपाल दास ‘नीरज’

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तमाम उम्र मैं इक
अजनबी के घर में रहा।
सफ़र न करते हुए भी
किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था
जो भटका किया ज़माने में,
हृदय तो मेरा हमेशा
तेरी डगर में रहा ।

तू ढूँढ़ता था जिसे जा
के बृज के गोकुल में,
वो श्याम तो किसी
मीरा की चश्मे-तर में रहा ।
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वो और ही थे जिन्हें
थी ख़बर सितारों की,
मेरा ये देश तो रोटी
की ही ख़बर में रहा ।

हज़ारों रत्न थे उस
जौहरी की झोली में,
उसे कुछ भी न मिला
जो अगर-मगर में रहा ।

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गोपालदास नीरज

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