शमशेर : कौतुक से अधिक – शंभुनाथ

Shambhu-Nath

एक समय आधुनिक बुद्धिजीवी होने का अर्थ था मार्मिक हीरो होना, जो बुद्धि का रथ पूरी ताकत से गंतव्य की ओर ले जाने की कोशिश करते हुए भी अंतत: विफल होता है। शमशेर आधुनिकता की ट्रेजेडी के शिकार एक ऐसे ही हीरो थे, ‘मैं स्पष्ट देख सकने की स्थिति में हूँ कि वह हीरो मैं स्वयं था…’ (आत्मकथन)। उस समय आधुनिकता कुछ नया कर गुजरनेवाला नायकत्व पैदा कर रही थी और विफलता का अवसाद भी दे रही थी। यह मामला सिर्फ शमशेर का नहीं था, एक खास दौर की आधुनिकतावादी पीढ़ियों का था। उन्हें वास्तविक संसार की चीजें जीवनहीन लगती थीं। यदि यह भी लगने लगे कि इतिहास दिशाहीन होकर अंधव्यवस्था में बदल रहा है, फिर इतिहास की जगह शब्द ही सोचने और जीने की वस्तु हो जाते हैं। आधुनिकतावादी साहित्य में शब्द इसीलिए महत्वपूर्ण हो उठे।

शमशेर पश्चिम के आधुनिकतावादी आंदोलनों के सबसे अधिक स्वागत में थे। इसी का नतीजा है, उनकी कविताएँ व्यक्ति की निजताओं के ही नहीं, शब्द की स्वतंत्रता के भी दस्तावेज हैं, हालाँकि उन्होंने अपने को मार्क्सवादी माना है। उनकी कई कविताएँ सामाजिक चिंता में डूबी हुई हैं। क्या भारत में आधुनिकतावाद एक धूपछाँही खेल है? हमेशा एक धूप आती है और कोई छाँह उसका पीछा करने लगती है। आधुनिकतावादी लेखकों की एक खूबी दुविधाग्रस्तता है, एक मन में कई मन होना। इसे व्यक्तित्व का अंतर्विभाजन कहना उचित नहीं है, क्योंकि टूटे और बिखरेपन में भी एक रिश्ते की रौ होती है, एक गूँज होती है। शमशेर की अपनी जिंदगी टूटी हुई बिखरी हुई रही है। आरंभिक दौर की कविताओं के संग्रह ‘उदिता’ में वह कहते हैं, ”गद्य के आवरण में टूटा हुआ था काव्य/ स्वयं टूटा हुआ-सा था/ स्वयं जीवन के समान/मौन था अति मुखर केवल/मौन ही था काव्य…” मौन ही वह सृजनात्मक जगह है, जहाँ एक मध्यवर्गीय कवि सृष्टि से अपने रिश्तों की गूँज महसूस करता है, कुछ नई शुरुआतें भी करता है।

शमशेर बचपन में अपने घर में रामचरितमानस सुनते थे, उन्हें तुलसी प्रिय थे। उन्हें हाली, गालिब, इकबाल, शेक्सपियर, सुर्रियलस्ट हर्बट रीड, पाब्लो नेरूदा, निराला, पंत और अज्ञेय अच्छे लगते थे। ये सभी किसी न किसी मात्रा में उनके आदर्श थे। हम देख सकते हैं कि उनके रुझान कितनी विपरीत दिशाओं वाले थे। वह एक तरफ सादगी पसंद करते थे और दूसरी तरफ कलात्मक निपुणता। उनकी कविताओं में दोनों के अनोखे मेल की कोशिश झलकती है। वह अपने लक्ष्य में कामयाब हों या न हों, पर चाहते थे कि कविता को बोधगम्य बनाते हुए अपनी अनुभूति की विशिष्टता को भी सुरक्षित रखें। आधुनिकता की ओर बढ़ते हुए भी यथार्थ का दामन न छोड़ें। कविता में संगीत के साथ चित्र भी आए। शमशेर ऐसे कवि थे, जो आधुनिकता से आत्मीयता का अनुभव करते थे और एक तनाव भी रखते थे। उनका आधुनिकता से आत्मीय तनाव का रिश्ता था।

एक समय आधुनिकता से रिश्ता रखते हुए भी कवियों का उसमें बह जाने से बचना एक ऐसी घटना है, जिसका उल्लेख किया जाना चाहिए। शमशेर ने ‘दोआब’ (1948) के अपने लेख ‘मुक्त छंदü’ में फ्रांस के बिंबवादी रिंबो और प्रतीकवादी मलार्मे को अस्वस्थ मनोदशा का कवि कहा था। उन्होंने इनकी मुक्त छंद की आधुनिक कविताओं को विश्रृंखल, असंबद्ध, अगम्य, रहस्यमय, अनेकार्थतायुक्त और अराजक तक कहा। उन्हें मायकोवस्की की कविता में भी ‘डिकेडेंस’ का तत्व मिला, ‘उसकी रचनाएँ ओजपूर्ण यद्यपि अर्थ में अस्पष्ट प्रतीकों की एक असंबद्ध श्रृंखला होती थीं…’ शमशेर यूरोपीय साहित्य पढ़ते थे। वे उसका विरोध करते-करते उसके निकट भी चले गए थे। उस तरह की कविता वे खुद लिख रहे थे, भले वे पेंटिंग के रास्ते से पश्चिमी आधुनिकता के करीब गए हों।

शमशेर की कविताएँ जिस ढंग का विन्यास, उपमाएँ और शैली लेकर आती हैं, उस पर पश्चिमी काव्य आंदोलनों का असर स्पष्ट है। टूटी-बिखरी लाइनें, कहीं दीर्घ अंतराल, कहीं डैश, कभी ब्रैकेट में अचानक कौंधी हुई कोई बात, कभी लयभंग करती कोई ध्वनि और अंतत: शब्दों का निजी काव्यात्मक संगठन। एक समय इसे काफी लोग कविता मानने से हिचकते थे। शमशेर ने खुद स्वीकार किया है, ”मैंनेê जो ये पेंटिंग के स्टाइल थे, सुर्रियलिज्म के एब्स्ट्रैक्ट के, वे मैंने शब्दों में उनका प्रयोग शुरू कर दिया था।… यूरोप के आधुनिक नए कवियों की चीजें पढ़ने की इच्छा हुई थी और उनसे सीखने का कदम पर कदम रखकर चलने या उनसे होड़ लेने की इच्छा…” (बातचीत, पूर्वग्रह, जनवरी-अप्रैल 1976)। शमशेर ‘कुछ और कविताएँÓ’ में सुर्रियलिज्म से सैद्धांतिक विरोध की घोषणा करते हुए भी उससे प्रभावित होकर शब्द-चित्र निर्माण छोड़ नहीं सके। हालाँकि यह बात ध्यान में रखनी होगी कि उनकी कविताएँ पश्चिमी आंदोलनों से बँधी हुई नहीं हैं।

शमशेर के साथ बौद्धिक जटिलता यह थी कि उन्हें कला-साहित्य के पश्चिमी आंदोलन आकर्षित करते थे। लंदन का ‘टाइम्स लिटररी सप्लिमेंटü’ भारत आता था और एक खास मिजाज के हिंदी लेखकों के बीच नियमित पढ़ा जाता था। ये लेखक अमेरिकी और यूरोपीय साहित्य की तरफ आकर्षित थे। संभव है, दूसरे विश्‍व युद्ध के समय फासीवा-विरोधी व्यापक गठबंधन के कारण भी अमेरिका-यूरोप का आधुनिक साहित्य इन लेखकों पर असर डाल रहा हो।

एक तरफ, पश्चिम का बढ़ता प्रभाव बढ़ता जा रहा था। दूसरी तरफ, भारतीय परंपराओं और यथार्थों का दबाव भी था। शमशेर ने बताया है कि उन्हें उर्दू कवि हाली सादगी में कितने पावरफुल लगते हैं, ‘यानी हृदय भर आता है..,ü’ जो कवि मलार्मे, एजरा पाउंड और लुई अरागां की ओर आकर्षित होगा, उसे भावुक नहीं होना चाहिए। शमशेर भावुक हो जाते थे। वह उर्दू की नफासत, निराला काव्य की तत्समबहुलता और सुर्रियलिस्टों की कलात्मक विशिष्टता तीनों को एकसाथ साधना चाहते थे। उनमें पंत की सुकुमारता थी। शमशेर जिस जमाने में बहुत-से देशों, बहुत-से समयों के कवियों की तकनीक और अनुभूतियों से प्रेरणा पा रहे थे और बहुत-से प्रभावों के बीच से अपनी शमशेरियत गढ़ रहे थे, उस समय प्रगतिशील आंदोलन का मामला भी कम महत्वपूर्ण न था। इसलिए शमशेर यह भी कहते थे, ‘कला का संघर्ष समाज के संघर्ष से एकदम कोई अलग चीज नहीं हो सकती…’ (वक्तव्य, दूसरा सप्तक)। उस जटिल समय में शमशेर के आधुनिकताबोध की खूबी यह है कि उसमें न कहीं कृत्रिम फैशन है और न कट्टरता है। उसमें वस्तुत: एक सादगी, समावेशिकता और एक गहरी मानवीय पीड़ा दिखाई देती है। उनकी कविताएँ दुरूह लगती हैं, जबकि उनके भीतर एक सादगी है – सादगी में परिष्कृति।

शमशेर ने सरलता के ही कारण कुछ भी छिपाया नहीं है, ”उन दिनों (1938-39) मैं सुर्रियलिज्म से बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ, बहुत ज्यादा। मुझे लगा मैं इसी में डूब जाऊँगा…” (साक्षात्कार, कवियों का कवि शमशेर, रंजना अरगड़े)। इस साक्षात्कार (1981) में उन्होंने मन खोलकर अपनी बातें कही हैं, ‘मैंï बहुत इमेजिनेटिव हूँ। मैं बहुत जल्दी अपने फेयरी लैंड में चला जाता हेूँ।. . . मुझे एक्सपेरिमेंट करने का बहुत शौक है।…मेरे बिंब बड़े प्राकृतिक हैं।. . . मैं एजरा पाउंड, शेक्सपियर की कविताएँ पसंद करता हूँ।. . . मैंने हमेशा एकांत चाहा, केवल आइडियोलॉजी से सोशल था।… मेरे काव्य मन पर मैरिएन मूर का भी प्रभाव रहा – बाद में। टी.एस. इलियट की समकालीन हैं। वे अदभुत कलाकार हैं। क्लासिकल टोन में भावनाओं का इतना संयम कि असंभव लगे। वह ठंडी कलाकार हैं, एकदम संगमरमर की तरह। उनमें कलात्मक पूर्णता है। मैं उसे उपलब्ध करना चाहता हूँ। . . . जब कविता की बात आती है, आइ एम हेल्पलेस, फिर भी सामाजिक चेतना में मेरा विश्‍वास है।. . . मेरा ननिहाल कल्चर्ड था। उसका पूरा शहरी मिजाज था। उर्दू वे लोग पढ़ते थे। . . . बट आइ लाइक्ड इंग्लिश। (शमशेर उर्दू से इंग्लिश में, फिर दोनों से हिंदी में आए।). . . मेरी माँ बहुत कल्चर्ड थीं। वह सुंदरता की प्रतिमूर्ति थीं। उनमें तमाम हार्मोनी थी। . . . मैंने पार्टी वर्क किया, वैसे मैं ड्रीमर ही था। . . . मेरे जीवन में कुछ भी उल्लास नहीं रह गया था। . . . हिंदी में लिखना मेरे लिए नया था। मैं उर्दू में ही लिखता रहा था। मैं कविता पर बहुत सचेत होकर काम करता हूँ। . . . मैं अपने शिल्प के लिए निराला, पंत और अंग्रेजी के कवियों के प्रति बहुत आभारी हूँ। . .. मेरी दृष्टि शिल्प पर पहले से ही जियादा रही। . . . हमारे मन में एक बात बैठ गई थी, गवर्मेंट जाब नहीं करेंगे। . . . कला में हम एक तरह से कलाकार के व्यक्तित्व की आंतरिक आत्मा को देख सकते हैं। शाब्द-ध्वनि, रंग और रेखा द्वारा हम एक तरह से जीवन को ही देखते हैं। .. . महाकाव्य का लेखन महान कवि ही कर सकता है, जो मैं नहीं हीँ…” साक्षात्कार हमेशा एक खुला और रोचक व्यापार है।

उपर्युक्त टुकड़ों में शमशेर के काव्यात्मक मिजाज की बुनावट स्पष्ट हो जाती है कि वह कैसे प्रगतिशील, कैसे प्रयोगशील, कैसे सुर्रियलिस्ट या कैसे कवि हैं। खासकर यह भी पता चलता है कि वह कितनी ईमानदारी से प्रभावों की बात स्वीकार कर सकते हैं। वह हाली, गालिब, इकबाल, निराला, पंत के प्रभाव की बात करते हैं। उन्होंने बहुत-से भारतीय व्यक्तियों पर कविताएँ लिखी हैं। इसका अर्थ है, उन पर भारतीय प्रभाव भी कम नहीं हैं। हम यह भी देखते हैं कि जिसे जटिल कवि कहा जाता है, वह कितना कम जटिल है। शमशेर एक जटिल समय के सरल कवि हैं, बस उन्हें कुछ ज्यादा निकटता से पढ़ना होगा।

आधुनिक युग एकसाथ बहुत-सी प्रवृत्तियाँ लेकर आया था और आज की तरह ‘होमोजीनियसÖ’ नहीं था। आधुनिक होने का एक अर्थ अर्ध-बर्बर होना होता जा रहा था। यह संस्कृति उद्योगों के विकास और मास कल्चर की शुरुआत का समय था। ऐसी स्थितियों में कुछ भी रचनात्मक लिखने का अर्थ था अपने लेखन को इतिहास, बाजार, परंपरावाद और मास कल्चर का औजार बनने से बचाना। इसके लिए रूढ़ियों से विद्रोह जरूरी था। आधुनिकता के जिस तरह सैकड़ों ट्रेजिक हीरो थे, उसी तरह इसके अनगिनत खलनायक भी थे। इसलिए क्या सुंदर और मूल्यवान है, यह सतर्क अन्वेषण का विषय हो गया। यह विराट आधुनिक चीजों की तुच्छता को चुनौती देना था, जो आधुनिकता को शब्द की स्वतंत्रता का रूप देकर ही संभव था। इससे भाषा की रूढ़ियों को तोड़कर शाब्दिक बाँकपन लाने का रास्ता खुला। कविता शब्दों के बीच रचनात्मक मेधा का नृत्य हो उठी। यही सब शमशेर के यहाँ रूढ़िभंजक शब्द-चित्रों के रूप में है, जो सिर्फ कुछ दिखाकर नहीं रह जाते, बल्कि भीतर से कुछ कहते भी हैं। उनके कुछ शब्द-चित्र उदासी से भरे हों, पर ये दरअसल उनके समय के प्रचलित साँचे, तुच्छताओं और ‘डिकेडेंसÖ’ के प्रतिवाद में हैं।

शिला का खून पीती थी

वह जड़

जो कि पत्थर की स्वयं।

सीढ़ियाँ थीं बादलों की झूलती

टहनियों- सी।

और वह पक्का चबूतरा

ढाल में चिकना :

सुतल था

आत्मा के कल्पतरु का ?

एक हताशा से भरते जा रहे समय में शिला से निकली जड़ों द्वारा शिला का खून पीना एक दुर्दम्य जिजीविषा का प्रतीक है। बादल झूलती टहनियों से दिखाई देते हैं, मानो वे जीवन की सुंदर सीढ़ियाँ हों। ये जड़ें और टहनियाँ आत्मा के उस कल्पतरु की हैं, जो दुनिया को सुंदर बनाता है। ऐसे शब्द-चित्रों को सुर्रियलिस्ट असर कहा जाता है। शिला से निकली जड़ों का शिला से भी कड़ा होकर उससे जीवन-रस लेना एक अद्भुत जीवन संघर्ष है। यह खुद शमशेर का जीवन संघर्ष है और उनके युग के आम मानव का जीवन संघर्ष भी। यह संघर्ष के सौंदर्य का लाक्षणिक शब्द-चित्र है। ‘शिला का खून पीती थी’ एक स्मृति की ओर भी संकेत करती है, जो अंतत: मूल वस्तुगत संदर्भ से बँधी नहीं रह जाती। यह कोई प्रकृति वर्णन नहीं है, बल्कि कला के स्तर पर आधुनिक जीवन की दुखदायी स्थितियों से विद्रोह है।

शमशेर ने ‘कुछ और कविताएँÓ’ के वक्तव्य में कला के बारे में कहा था, ”वहü कलाकार की अपनी बहुत निजी चीज है। जितनी ही अधिक वह उसकी अपनी निजी है, उतनी ही कालांतर में वह औरों की भी हो सकती है…” उनका मानना था कि कोई सामाजिक अनुभूति काव्य पक्ष के अंतर्गत ही महत्वपूर्ण हो सकती है। शमशेर सामाजिक जीवन की कोई चीज उठाते हैं तो उनकी एक चिंता यह होती है कि वह कविता के स्तर पर भी खरी हो। शमशेर कहते हैं, ”अभिव्यक्तिÖ अपनी ओर से सच्ची हो, यही मात्र मेरी कोशिश रही। उसके रास्ते में किसी भी बाहरी आग्रह का आरोप मैंने सहन नहीं किया” (कुछ और कविताएँ)। कोई बाहरी आग्रह न सहने की वजह है बौद्धिक स्वायत्तता की चाह, जो पश्चिमी बिंबवादी, प्रतीकवादी और सुर्रियलिस्ट कवियों में थीं।

सुर्रियलिज्म का हिंदी में प्रचलित अर्थ है अतियथार्थवाद, जबकि इसे ‘स्वप्निल यथार्थवाद’ü समझना चाहिए। यह बौद्धिक स्वायत्तता का प्रवक्ता था। इस आंदोलन में खोखली परंपराओं से मुक्ति हासिल करती मानसिक संरचना, क्रांति और हताशा के द्वैत से भरे विद्रोह भाव और उथल-पुथल मचा देनेवाले सौंदर्य की प्रधानता थी। इस आंदोलन से प्रभावित कला अचेतन इच्छाओं औेर स्वप्नों को भी व्यक्त करती थी, हालाँकि यह आंदोलन अध्यात्मवाद की जगह सृष्टि की प्रत्यक्ष वस्तुओं को महत्ता देता था। ब्रेतां और अरागां ने इस आंदोलन को प्रतिष्ठित किया। चित्रकला के क्षेत्र में दाली, पिकासो आदि इससे प्रभावित थे। दाली का एक चित्र काफी लोकप्रिय है, जिसमें टेबुल पर रखी घड़ियाँ पिघली हुई हैं। पिकासो का विश्‍वयुद्ध की विकरालता को प्रदर्शित करता ‘गुएर्निका’ दुनिया का सबसे अधिक देखा गया चित्र है। स्वप्निल यथार्थवाद से जुड़े लुई अरागां जैसे लेखकों का संबंध कम्युनिस्ट आंदोलन से था। स्वप्निल यथार्थवाद को रोमांटिसिज्म का नया अवतार कहा जा सकता है, जो इंप्रेशनिज्म, बिंबवाद और प्रतीकवाद के साथ एक समय हिंदी की नई कविता में थोड़े स्थानीय रूपभेद के साथ आ धमका। हम जानते हैं कि शमशेर, मुक्तिबोध जैसे कवियों का अपना एक भारतीय ढंग का स्वप्निल यथार्थवाद था और उनका कम्युनिस्ट आंदोलन से संबंध था।

बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों के आधुनिक साहित्यिक आंदोलनों, विद्रोहों और प्रयोगों ने दुनिया भर की कलाओं, संस्कृतियों और विचारों को प्रभावित किया था। इन्होंने आधुनिकता की सतही चीजों के समानांतर मानवीय सौंदर्य-दृष्टि में परिष्कार और विस्तार लाने का काम किया और रूढ़ियों के प्रति व्रिदोह-भाव जगाया। इन आधुनिकतावादी आंदोलनों ने उन तुच्छताओं का जमकर विरोध किया, जो आज उत्तर-आधुनिक परिदृश्य में चारों तरफ पहले से ज्यादा छाई हैं। उनसे प्रभावित कलाओं ने मनुष्य के आत्मजगत को सौंदर्यात्मक मूल्यों का स्रोत बनाया, पर इन मूल्यों तक पहुँचनेवाली राहों को खुला रखा। हिंदी के आधुनिक कवियों को पश्चिमी साहित्यिक दुनिया की तरह बारी-बारी से ये आंदोलन नहीं मिले, बल्कि उनका किसी झंझावात की तरह एक साथ आगमन हुआ। निश्चय ही हिदी में इनका आगमन तब हुआ, जब पश्चिम में ये 1930 तक चुक गए थे। इन आंदोलनों का असर प्रगतिशील कवियों पर भी पड़ा था, हालाँकि इस असर को रूपवाद, कलावाद, प्रयोगवाद, अस्तित्ववाद, उग्र आधुनिकतावाद आदि कह कर धिक्कारा ज्यादा गया।

हिंदी में आधुनिकतावाद के असर को रुग्ण मानसिकता, अवसाद की आधुनिकता या कलावाद कह देने से हम एक खास साहित्यिक विकास को – इसकी प्रकृति, अंतर्वस्तु और दिशाओं को समझ नहीं सकते। ऐसे भी, शमशेर हों या आधुनिकतावादी असर वाले कुछ दूसरे कवि, वे रोमांटिकता और प्रगतिशीलता से एक न एक रूप में जुड़े रहे हैं। भारत में कोई कवि एकांगी रूप से आधुनिकतावादी नहीं हो सकता था। आधुनिकतावाद का प्रवेश यदि घरों, कल-कारखानों, दफ्तरों, शिक्षा और चिकित्सा में निरंतर हो रहा हो, कविता को उसके असर से मुक्त रखने की माँग गैर- वाजिब कही जाएगी। आधुनिकतावादी आंदोलनों ने कुछ और नहीं तो सबसे सार्थक भूमिका यह निभाई कि भाषा के प्रति कवियों को काफी सचेतन, सतर्क और प्रयोगशील बनाया – भाषा को साधारण नियमों और रूढ़ियों से मुक्त किया।

भाषाओं की नस-नस एक दूसरे से गुँथी हुई है

( मगर उलझी हुई नहीं)

हमारी साँस-साँस में उनका सौंदर्य है

( मॉडर्निस्टिक्) कहो मत

अभी हमें लड़ने दो

यह स्टेज महान

मूर्खों के लिए है

आह यह आधुनिक स्टेज

. . .

इस नाटक के लिए

आधुनिकतम निर्देशक अमरीका से बुलाओ

और फ्रांस से। और जापान से

तभी हम लिखेंगे और रक्त के समान उज्ज्वल

हमारी भाषाओं का तिलक होगा!!

हम एक हैं !!

( घोषणा)

मगर कहाँ! मगर कहाँ! मगर कहाँ!

यह आध्यात्मिक प्रश्न

हमें लहूलुहान कर रहा है

जर्मन और अमरीकी और फ्रांसीसी और फिरंगी और रूसी

और समस्त योरपीय प्राच्यविद्याविद

हमारा अगम ज्ञान सागर मंथन कर रहे हैं . . .

. . ..

सभी शब्द हमारे हमारे ही कोश में हैं

एक प्यार के वास्तविक शब्द को छोड़कर!

हमारा वर्ग एक-दूसरे को पीस रहा है

हम मात्र जबड़े हैं

अत्यंत शक्तिशाली जबड़े हम सभी।

शमशेर पश्चिम से कुछ ले रहे थे और उसके प्रति क्रिटिकल भी थे। भारत के लोगों के लिए उनकी अपनी भाषाएँ बहुत महत्वपूर्ण हैं। उनकी साँसों में बसी उनकी भाषाओं का अपना अद्भुत सौंदर्य है। शमशेर की कविता ‘भाषा’ (1965) में तीखे व्यंग्य हैं। इसमें उस नव-उपनिवेशवाद को लेकर गहरी चिंता है, जो पश्चिम की बौद्धिक आँधियों के साथ भारतीय जीवन में आ रहा था। गौर करने की बात है, इस कविता में हिंदी राष्ट्रवाद नहीं है, भारतीय भाषाओं के आत्मसम्मान का प्रश्न है, भारतीय पहचान का प्रश्न है। यह कविता जिस समय लिखी गई, वह भाषा आंदोलन का समय था। भारत के आधुनिक स्टेज पर राजनीतिक ड्रामा बड़ा आत्मघातक रूप ले रहा था। भारतीय एकता छिन्न-भिन्न हो रही थी। इस कविता में विदेशी पूँजी और ओरियंटलिस्ट मेधा का पर्दाफाश किया गया है, क्योंकि इन्हीं के बल पर बौद्धिक उपनिवेशवाद सघन हो रहा था। पश्चिम के प्राच्यविद्याविद बता रहे थे कि भारत का इतिहास कितना पिछड़ा है, सभ्यता कितनी पिछड़ी है और भारत कितना अंतर्विभाजित है। इस कविता में यह विडंबना भी पहचानी गई है कि पुराने ज्ञान की पूजा करने वाले पुनरुत्थानवादी किस तरह नव-उपनिवेशवाद के अभिनंदन में डूबे हुए हैं। इसके अलावा, एटमिक वंदनवार भी सजे हैं। सेना की संगीनें हैं। सत्ता के जबड़े हैं। कला, विज्ञान और टेक्नोलॉजी हैं। लोगों के जीवन में बस एक चीज नहीं है प्रेम, जो सिर्फ भारत की उन भाषाओं में संभव है, जिसकी नस-नस वस्तुत: एक-दूसरे से गुँथी हुई है।

यदि कोई कवि होगा, उसके भीतर प्रेम होगा। प्रेम ही आदमी को कवि बनाता है। कवि की जरूरत इसलिए होती है कि जब हवाओं में घृणा भरी हो, वह प्रेम का संगीत बाँटता है। वह सुंदरता से प्रेम करना सिखाता है और बताता है, क्या सुंदर है क्या नहीं। आधुनिकतावादी समय में प्रेम की भाषा ठीक वैसी नहीं हो सकती थी, जैसी क्लासिकल या रोमांटिक युग में थी। बदली जीवन स्थितियों में प्रेम का अनुभव अलग तरह का होगा, पर उसमें क्लासिक और रोमांटिक संस्कारों की गूँज न हो, यह संभव नहीं है। यदि प्रेम में अनुभव की सच्चाई के साथ एक कलात्मक गहराई मौजूद हो, इन संस्कारों की गूँज होगी जरूर। अज्ञेय, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और शमशेर की कविताओं में प्रेम धड़ल्ले से उपस्थित होनेवाली विषयवस्तु है। यह मुक्तिबोध की भी कई कविताओं में है। शमशेर की कविताओं में प्रेम ही प्रधान विषयवस्तु है। इसी को घेर कर उनकी सारी प्रकृति चेतना, स्मृतियाँ, मांसलता, उदासियाँ और अनुभव की यात्राएँ बनी हैं।

प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे

भोर का नभ

राख से लीपा हुआ चौका

(अभी गीला पड़ा है)

बहुत काली सिल जरा-से लाल केसर से

कि जैसे धुल गई हो

स्लेट पर या लाल खड़िया चाक

मल दी हो किसी ने

यह कविता शमशेर की इंप्रेशनिस्ट पहचान से गहरे रूप में जुड़ी है, जबकि इसमें स्मृतियाँ भरी हैं। इंप्रेशनिस्ट कविता या चित्र में स्मृतियों को वर्तमान का ध्वंस करनेवाला माना जाता है। ‘उषाÖ’ कविता किसी आस्थावान के शंख, घर के चौके, रसोई की सिल और बच्चे की काली स्लेट जैसी घरेलू स्मृतियों के भीतर से अपना जादू फैलाती है। यह जितना प्रकृति वर्णन है, उतना ही जीवन का आख्यान भी। इसमें आसमान के रंग बदलने की कथा है, जो अपने क्लाइमेक्स पर तब पहुँचती है जब जल में किसी की गौर झिलमिल देह हिलती दिखाई देती है – ‘नील जल में या किसी की/गौर झिलमिल देह/जैसे हिल रही हो…’ आसमान का सौंदर्य धरती पर उतर आता है, मानो यह सौंदर्य मानव देह के बिना अधूरा रह जाता। उषा का चित्र कवि के मानस पर पड़ी एक अंतर्संदर्भात्मक छाप भर नहीं है। यह एक घर की कथा भी है। इसे ‘अवचेतन की मनःप्रतिमाएँÓ’ या महज एक बिंब समझना गलत है। इसमें चूल्हा-चौका है, बच्चा है, स्त्री है और हैं नीले, स्याह, केसरिया जैसे जीवन के बहुत-से रंग और बहुत-से दुख-सुख। इस कविता में सूर्योदय के उदय से एक जादू टूटता है, पर दूसरा जादू शुरू हो जाता है, यह जीवन क्या किसी जादू से कम है ?

रवि

कमल के नाल पर बैठा हुआ मानो

एक एड़ी पर टिकाए

मौन।

यह प्रभात का सूर्य है, जो शमशेर के नाजुक मिजाज की वजह से तेज दमकता नहीं है, बल्कि उनकी पुतलियों में शीतल स्नान करता है और कमल के नाल की तरह एक एड़ी पर टिका मौन बन जाता है। शमशेर ‘यथार्थÔ’ की सीमाओं को आधुनिक प्रेरणा से बार-बार तोड़ते हैं। वह बाह्य दृश्य को अनोखे बिंब में ढाल देते हैं। वह अपने काव्य विन्यास में कहीं स्पेस, कहीं पूर्ण विराम और कहीं चुप्पी का इच्छानुसार प्रयोग करते हैं। उनका काव्य विन्यास कहीं विश्रृंखलित होता है, कहीं लयात्मक। आधुनिकता के गहरे असर में उनका सौंदर्यान्वेषण बड़ा सतर्क और असाधारण है, पर यथार्थवाद के असर की वजह से उनका सौंदर्यबोध एक जागरण भी है, ”ले कर सीधा नारा/कौन पुकारा/अंतिम आशाओं की संध्याओं सेê?” कभी मौन है, कभी नारा है। आधुनिकता और यथार्थ का अद्वैत शमशेर की कविता की बुनियादी खूबी है।

मुक्तिबोध ने शमशेर के दृश्य चित्र की ‘प्रभावपूर्ण सकेत-शक्ति’ की ओर इशारा करते हुए एक अच्छी बात कही है, ”यदि यह (दृश्य चित्र का) संवेदनाघात दर्शक के हृदय में पहुँच गया तो दर्शक अचित्रित शेष अंशों को अपनी सृजनशील कल्पना से भर लेगा…” (शमशेर मेरी दृष्टि में)। उस जमाने के कवियों ने पाठक को निष्क्रिय आस्वादनकर्ता न मानकर कल्पनाशील माना है। यह पाठक की मानसिकता का आधुनिकीकरण है। शमशेर कविता के शिल्प के स्तर पर पश्चिम का आधुनिकतावादी प्रभाव लेते हों और उनके काव्यात्मक रूप में विशिष्टता हो, पर अंत:स्थल में चमत्कृत करनेवाली सादगी है। वह काव्य के विशिष्ट रूप में जीवन की सरलता औेर गरमाहट के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाते। आदमी की जीवन शैली में आधुनिकता आ रही थी। एक बहुत बारीक और जटिल प्रक्रिया में सभी चीजें बदल रही थीं। फिर काव्य-रूप में आधुनिकता क्यों नहीं आती? यह एक तरह से पाठक के मन की जड़ता और रूढ़ियों को तोड़ना है, ताकि वह निष्क्रिय आस्वादनकर्त्ता भर न रह जाए, जैसा कि आधुनिक जमाने में लोग होते जा रहे थे। वह कल्पनाशील होकर अपने सृजनात्मक दायित्वों को भी समझ ले।

आधुनिक कवियों ने भाषा को अनुभव की गतिविधि के रूप में देखा है, गतिविधि के अनुभव के रूप में नहीं। शमशेर का काव्यानुभव स्मृतियों और कल्पनाओं में फैलता है, अपना लोकेशन बनाता है और परंपराओं को भी उपलब्ध करता है। उनके अनुभव की गतिविधि भौतिकता से जर्बदस्त रूप में बंधी है, पर एकदम वर्तमानकेंद्रित नहीं है।

लौट धार

टूट मत साँझ के पत्थर

हृदय पर

( मैं समय की एक लंबी आह मौन लंबी आह)

लौट , फूल की पंखड़ी

फिर

फूल में लग जा

शमशेर कहते हैं, ‘मेरेêü इमेजेज बहुत ही रीयल और फेल्ट हैं, पर उतने या कहें बिल्कुल ठोस नहीं हैं” (साक्षात्कार, 1981)। वह अपने बचपन से मृत्यु देखते आए। उसमें पत्नी की मृत्यु भी है और इसके साथ घर की मृत्यु भी। यदि शमशेर के पास घर-परिवार होता, कोई अच्छी नौकरी होती, अपनी कविताएँ लेकर विदेश यात्राएँ करते होते, क्या वे ‘लौट ü आ ओ धारü’ लिख पाते? उनका जीवन समय की एक मौन लंबी आह है। उनका प्रेम हर बार ओê फूल की पंखड़ी फिर फूल में लग जा’ की आकांक्षा है। साँझ जैसी अच्छी बेला भी पत्थर हो जाती है और स्मृति की धार उससे टकराकर बार-बार टूट जाती है। ‘लौट आ ओ धारü’ शमशेर की निजी कथा होने के साथ उनके समय के एक बड़े सांस्कृतिक विच्छेद की कथा भी है। आधुनिकता घर, परिवार, गाँव, समाज और संस्कृति से व्यक्ति का महाविच्छेद घटित कर रही थी। अब बहुत ज्यादा लोग अकेले और कभी यहाँ-कभी वहाँ रहने वाले हो गए थे। शमशेर को जीवन की किसी खोई धुन की खोज थी, मन में नवीनता की व्यग्रता लिए हुए। एक अन्य कविता में वह कहते हैं, ‘सूरज उगाया जाता फूलों में : यदि हम एकसाथ हँस पड़ते… क्या साधारण आदमी में सौंदर्य के ऐश्‍वर्य की आकांक्षा नहीं हो सकती? आकांक्षा यथार्थ से टकराकर बार-बार टूट जाती थी। वही बात, ये सभी व्यक्ति मार्मिक हीरो थे। वे अपना विलाप प्रदर्शित नहीं करते थे, पर भाषा के पीछे रोते रहते थे। इसीलिए शमशेर के काव्य में यथार्थ ठोस नहीं हैं, वाष्प की तरह हल्के हैं। उन्हें देखा जा सकता है, महसूस भी किया जा सकता है, पर छुआ नहीं जा सकता।

हाँ तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं

. . . जिनमें वह फँसने नहीं आतीं

जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं

. . .

एक फूल ऊषा की खिलखिलाहट पहन कर

रात का गड़ता हुआ काला कंबल उतारता हुआ

मुझसे लिपट गया

. . .

मेरी याददाश्त को तुमने गुनाहगार बनाया और उसका

सूद बहुत बढ़ा कर मुझसे वसूल किया।

. . .

आह , तुम्हारे दाँतों से जो दूब के तिनके की नोक

उस पिकनिक में चिपकी रह गई थी ,

आज तक मेरी नींद में गड़ती है।

स्मृतियों से कल्पना की पोशाक पहनकर निकले ये सुंदर बिंब प्रेम के हैं। यह प्रेम की नई जमीन है, जहाँ स्वतंत्रता है, निष्कलंकता है, वासना की तीव्रता है, फिर एक उदासी है। शमशेर की कविता ‘टूटी हुई बिखरी हुईÔ’ अंतत: एक उदास स्मृति है। यह ऐसी स्त्री की स्मृति है, जिसके ‘पाँवों की दिशा मेरी आँखों को लेकर चली गई थी…’ शमशेर हर प्रेम में उसी स्त्री को देखते हैं और अपनी कविता ‘आओê’ में उसी स्त्री से कहते हैं, ‘तुम आओ, तो खुद घर मेरा आ जाएगा…’ मुख्य बात यह नहीं है कि उनकी कविताओं में स्मृति की उपस्थिति बहुत ज्यादा है। उल्लेखनीय यह है कि प्रेम के रूपकों में उन्होंने जीवन की गरमाई व्यक्त की है और मनुष्य की अमरता की उद्घोषणा की है, “मैं तो जैसे इसी शरीर से अमर हूँ- तुम्हारी बरकत…’ यह प्रेम ऐसे आदमी का है, जिसका जीवन इतिहास के पैरों के नीचे रौंदी पत्तियों की तरह है। फिर भी जीवन जिजीविषा से भरा है, ”बाल, झड़े हुए, मैले-से रूखे, गिरे हुए, गर्दन से फिर भी चिपके/कुछ ऐसी मेरी खाल/मुझसे अलग-सी, मिट्टी में मिली सी…” यह मध्यवर्ग की बदहाली है। इस आधुनिक विलगाव के बरक्स प्रेम का अनुभव एक गहरा अर्थ रखता है। इसकी उदास करने वाली स्मृतियाँ भी जीवंत हैं। यह भी स्पष्ट होता है कि प्रेम का अर्थ वही जानता है जो टूटा है – बिखरा है और प्रेम करने को उदास होने का फकत एक ढंग मानता है।

कहना न होगा कि शमशेर की कविता में रोमांटिसिज्म छायावादी रोमानीपन से भिन्न है। उसमें यथार्थवाद और आधुनिकतावाद भी घुले हुए हैं। इस बिंदु पर एक सवाल उठ सकता है कि शमशेर स्त्री को किस नजरिये से देखते हैं। छायावाद का स्त्री के संबंध में उदात्त नजरिया था। शमशेर विचार से मानते हैं कि स्त्री से प्रेम का अर्थ है सर्वप्रथम उसे आदर देना। वह अपनी कविता में उन उर्दू कवियों से ज्यादा प्रभावित हैं, जो स्त्री को एक भौतिक जगह समझते हैं। शमशेर की यादें भौतिक तृप्ति, मांसलता और कामुकता से अधिक जुड़ी हैं। यही वजह है, शमशेर को स्त्री देह कुछ ऐसी दिखती है, ‘एक ठोस बदन अष्टधातुका-सा/सचमुच?/जंघाएँ दो ठोस दरिया ठैरे हुए-से…’ यह आधुनिकता का असर है, जिसने धार्मिक नैतिकता पर कला की श्रेष्ठता स्थापित की और कामुकता को दिमागी स्वतंत्रता के लिए जरूरी बना दिया। कामुकता एक समय मौन रूढ़ियों, वर्जनाओं और छायावादी पवित्रता से विद्रोह बन कर आई। वह तब भीनी हवा में खुल कर साँस लेने की जगह थी, बाजार की वस्तु नहीं थी।

यह पूरा

कोमल काँसे में ढला

गोलाइयों का आईना

मेरे सीने से कसकर भी

आजाद है

जैसे किसी खुले बाग में

सुबह की सादा

भीनी-भीनी हवा

दरअसल, संस्कृति मशीन युग के साथ बदल रही थी। अत: कामुकता और परिवार के बारे में भी धारणा बदली। आधुनिकता ने एक खुलापन ला दिया था, घर का जीवन मशीनी लगने लगा था। कामुकता अब स्वातंत्र्यबोध थी, व्यक्ति द्वारा निजी मूल्यों की कुंठारहित खोज। यह उत्तर-औद्योगिक सभ्यता की यांत्रिकता को भी एक चुनौती थी। कामुकता एक तरह से सामंती और भ्रष्ट औद्योगिक व्यवस्था के विरुद्ध एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। शमशेर अमेरिकी कवि एलेन गिन्सबर्ग से मिले थे। उन पर एक कविता भी लिखी थी। उस दौर में विद्रोही आधुनिकता कामुकता के प्रतीकों के जरिये यही कह रही थी कि नए युग की सभ्यता रुग्ण हो गई है।

लग सकता है, शमशेर अपनी कविता में उर्दू कवियों के कुछ अधिक असर के कारण स्त्री की श्रृंगारकालीन इकसार छवि नहीं तोड़ सके। छायावाद का फेमिनिज्म से रिश्ता था। महादेवी की ‘श्रृंखला की कड़ियाँÓ’ और निराला की कुछ कविताएँ स्त्री का दर्द और एक भिन्न चेहरा लेकर आई थीं। शमशेर की आधुनिकता का स्त्री चेतना से कोई संपर्क नहीं है, बल्कि उनका रोमांटिसिज्म कहीं-कहीं ठोस भौतिकवाद के साथ उपस्थित हुआ है। उनकी कविता में पंत की स्त्री भी नहीं है, ”तुम मुग्धा थी अति भावप्रवण/उकसे थे अंबियों से उरोज/चंचल, प्रगल्फ हँसमुख उदार/मैं सजल तुम्हें था रहा खोज…’ इसकी जगह शमशेर में है, ”सुंदरü! उठाओ निज वक्ष/और और कस, उभरü!” इस कविता में निराला की प्रगीतात्मक शैली में प्रेम का आह्वान है, ”अकिंत कर अंतर आरक्त स्नेह से नव, कर पुष्ट, बढ़ूँ /सत्वर, चिर यौवन वर, सुंदर! / उठाओ निज वक्ष और और कस, उभरü…” शमशेर की कविता में कामुक सौंदर्य के साथ प्रेम भी जरूर मौजूद है। निराला की ‘तोड़ती पत्थरü’ में स्त्री खुद भी कवि को देखती है या ‘स्फटिक शिला’ में काली दलित युवती की अपनी आवाज है। शमशेर की कविताओं में स्त्री सिर्फ एक दृश्य है या एक भौतिक तृप्ति है। प्रेयसी, तुम बदन के माध्यम से ही बात करती हो…’ शमशेर की कविताओं में गालिब का गम है, पंत की सुकुमारता है, पर निराला का प्रभाव उनके काव्य-स्थापत्य तक सीमित है।

‘कुछ और कविताएँÓ'(1961) के बाद शमशेर का कविता संग्रह ‘चुप भी हूँ नहीं मैं’ 1979 में आता है, हालाँकि इसमें कविताएँ चौथे दशक की भी हैं। इसमें शमशेर कहते हैं, ”अपनी काव्य कृतियां मुझे दरअसल सामाजिक दृष्टि से बहुत मूल्यवान नहीं लगतीं।” इसे उनके शालीनतापूर्ण कथन से ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए। कुछ प्रगतिशील लेखकों की सामाजिक उपयोगिता संबंधी धारणाएँ काफी अनुदार थीं, अन्यथा यह समझने में मुश्किल नहीं आनी चाहिए थी कि कविता बहुत भीतरी ढंग से सामाजिक हस्तक्षेप करती है या रूढ़ियों को तोड़ती है।

चुका भी हूँ मैं नहीं

कहाँ किया मैंने प्रेम अभी।

जब करूँगा प्रेम

पिघल उठेंगे

युगों के भूधर

उफन उठेंगे सात सागर।

किंतु मैं हूँ मौन आज

कहाँ सजे मैंने साज

प्रेम चाहे जिससे हो, जिस तरह का हो मानवीय संवेदना का विस्तार करता है। जहाँ प्रेम नहीं होता, वहाँ खुदगर्जी होती है। शमशेर की स्त्री पर लिखी गई कुछ कविताओं में मध्यकालीन श्रृंगार और परंपरागत उर्दू मिजाज की प्रतिध्वनियाँ हैं, लेकिन समग्रता में प्रेम प्रधान है। प्रेम का यह रूप, जो पहाड़ों को पिघला और समुद्रों को उफना सकता है, अधिक तीव्र है। प्रेम एक परिवर्तन का चिह्न है। हर परिवर्तन के मूल में कोई प्रेम है। देश से हो, जनता से हो, संस्कृति से हो या व्यक्ति का निजी प्रेम हो। शमशेर के बाद हिंदी के कई कवि अपनी-अपनी प्रेम कविताओं की किताब छपाने लगे, जबकि हम जानते हैं कि न इनमें शमशेर की कविता-सी कटु-तिक्त अनुभूतियाँ हैं, न देह की वह अनोखी भाषा, न वह दर्द और न वह खिड़की है जो एक बड़ी मानवीय संवेदना और परंपरा की ओर खुलती है।

भारतीय मध्यवर्ग इतिहास के एक मोड़ पर आकार दयनीय हो चुका है, पर वह एक खास समय तक अंतर्द्वंद्व से भरा था। उसमें दुविधा, अवसाद, निस्सहायता आदि के बावजूद आग अभी बुझी नहीं थी। शमशेर का ‘महीन युग-भाव’ इसी वर्ग से जुड़ा है। इसके पास ‘इन्सानियत की तलछट का छोड़ा हुआ स्वादü’ है, जिसे शमशेर ने किसी महत्वाकांक्षा या उँची आशा के तारों में पिरोने की कोशिश नहीं की, बस उसे अपनी शर्त्तों पर ग्रहण किया। उनकी मुख्य चिंता है, ‘मेरा अपना स्वर सच्चा रहेêü…’ उनका जीवन ज्यादातर अकेलेपन और उदासी में बीता था, ‘चिड़िया-सा छिपा लुका मेरा डरा मन हैîü…’ उनके मन में द्वंद्व है। एक तरफ वह कहते हैं, ‘इंक्लाब! जीवन का बीज हैîü’, दूसरी तरफ उनका मन ‘बार-बारü चाहता है एकांत’ । इस द्वैध के बीच ही उन्हें ‘शब्दü का परिष्कारü’ करना था और ‘सत्य का चेहरा’ बताना था। शमशेर का जीवन ऐसी चकाचौंध -भरी और दमनमूलक स्थितियों से घिरा था, जो सर्वग्रासी थीं। उनके भीतर एक अन्यतम व्यक्ति बचा था। वह मध्यवर्ग का एक क्रांतिकारी रोमान से भरा व्यक्ति है, जो नीले दरिये की तरह निर्मल है। वह शक्ति और प्रेम और सादगी और ताजा मोती के आब की तरह नए मानों और एक शांत सरल आनंद जोश और आत्मा के धर्म गर्व से भरा है। नए युग के साथ नया मध्यवर्ग आ रहा था, ‘आ युग आ/मुझे उठा/जरा सा और लिये चल जरा सा’ । वह नए-नए अन्वेषणों में शरीक होना चाहता था। वह न चुका था और न थका। 60 का दशक ऐसा ही था। शमशेर चौथे-पाँचवें दशक के अपने काव्य शिल्प से भले बँधे रह गए हों, पर काव्यात्मक मनोभूमि पर अवसाद के बावजूद उपर्युक्त उज्ज्वल तत्वों से भरे थे।

शमशेर ‘नीला दरिया बरस रहा’ में ऊबड़-खाबड़ मध्यवर्गीय जीवन की बेचैनी, उसकी उजड़ी आशाओं के पहाड़ और सुलगता दर्द दिखाते हैं। उन्हें प्रसाद की तरह नीला रंग पसंद है और फिर कत्थई। नीला रंग दर्द के लिए है, इसलिए नीला दरिया दर्द का दरिया है। मध्यवर्ग के जीवन में अशांति है, व्यर्थताबोध है और उसमें एक ‘मैंï’, एक ‘स्व’ का गहरा बोध भी है। उसमें आत्मसंघर्ष है। ”सीढ़ियों के-से उलझे -पुलझे पथों से/चढ़ रहा हूँ उतर रहा हूँ चढ़ रहा…। ” इस कविता में उन्होंने आशा व्यक्त की है। कोई कवि यदि नहीं जानता कि वह क्या व्यक्त करना चाहता है, वह अच्छी कविता नहीं लिख सकता।

समय के

चौराहों के चकित केंद्रों से

उद्भूत होता है कोई : उसे-व्यक्ति-कहो ‘ :

कि यही काव्य है

व्यक्ति का महान उद्भव और थोड़े समय बाद उसका विलोप दोनों ही आधुनिक युग की घटनाएँ हैं। उसका विलोप समुदायवाद और बाजारवाद में हुआ। इसलिए आधुनिक होते हुए भी आधुनिकीकरण से जन्मी विकृतियों के प्रति संघर्ष का गहरा भाव शमशेर में है। आधुनिकता आकर्षित करती है, पर उसके अत्याचार भी हैं। उसने मनुष्य से उसके सारे मानवीय गुण छीनने शुरू कर दिए – उसकी आत्मशांति, प्रेमानुभूति, सहिष्णुता, बौद्धिक स्वतंत्रता, तर्कशीलता, त्याग और दूसरे सभी सार्वभौम गुण। मनुष्य धीरे-धीरे नगण्य होता गया। वह सत्ता की राजनीति और तकनीक पर अधिकाधिक निर्भर होता गया। पब्लिक दुर्दशा के अंतिम कगार पर पहुँच गई। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि समाज में ऐसे व्यक्ति कम होते गए, जिन्हें अपना कहा जा सके, इससे व्यक्ति का अकेलापन बढ़ा।

खुश हूँ कि अकेला हूँ

कोई पास नहीं है

बजुज एक सुराही के

बजुज एक चटाई के

बजुज एक जरा से आकाश के

जो मेरा पड़ोसी है मेरी छत पर

आधुनिकता का संबंध एक ही तरह के ग्लोबल विस्तार से है। बड़े भवन, बड़े उद्योग, मारक युद्धास्त्र, बड़े-बड़े जनाकीर्ण महानगर, बड़े ब्रांड और बड़े संस्कृति उद्योग । रामविलास शर्मा ने एक सभा में एक बार शमशेर को दिखा कर ठठ्ठा किया था, शमशेर बजुज एक सुराही, जरा से आसमान के भी रह सकते हैं। आज आदमी किस्म किस्म के झुंड, सामूहिक व्यवस्था या मॉल-मल्टीप्लेक्स का ऐसा अंग हो गया है कि उस समय के आधुनिक अकेलेपन की कल्पना नहीं कर सकता। उसमें जो मानवीय पीड़ा है और ‘जरा से आकाश’ की जो आशा है, वह व्यक्तिगत नहीं है, सार्वभौम है। ऐसे अकेलेपन में भी आदमी हीरो था, भले ट्रेजिक हीरो था। इस अकेलेपन को खोकर आधुनिक मनुष्य भावनात्मक और तकनीकी रूप से परवश होता गया। अब व्यक्ति काव्य नहीं रह गया है। वह सभ्यता के जंगल में खो गया है। इसलिए नई आधुनिक कविता में सर्वग्रासी खोखली आधुनिकता का विरोध एक बड़ी घटना है।

कुछ सौ साल पहले मनुष्य ने जिस आधुनिकता की शक्ति से अपने को पुनर्पारिभाषित करना शुरू किया था और वह नए लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा था, उस आधुनिकता का अपहरण हो गया। अब जिंदगी समझौतों और चतुराइयों से चल रही थी। ऐसी ही जिंदगी पर व्यंग्य करते हुए शमशेर ने मोहन राकेश के मरने पर लिखी कविता में कहा, ”माडर्न आर्टिस्ट/काश तुम इतने माडर्न न होते/ताकि जिंदा रहते/जिंदा रहते/अभी कुछ और दिन जिंदा रहते…” एक समय युद्ध, उद्योग या जीवन शैली में माडर्न होने का जो भी अर्थ हो, कला-साहित्य में माडर्न होने का अर्थ था अपने भीतर के व्यक्ति, बौद्धिक स्वतंत्रता और प्रेम को बचाना।

आधुनिकता आधुनिकता

डूब रही है महासागर में

किसी कोंपल के ओठ पे

उभरी ओस के महासागर में

डूब रही है

इतिहास में असहनीय रूप से दयनीय हो गया था मध्यवर्ग का आदमी, लुट कर। शमशेर ने माना है कि उनके मन में इसी वर्ग का अँधेरा छाया हुआ है। वह इस छाया से निकलने की कोशिश करते हैं। वह ओस के महासागर में डूबते हैं, अधरों के अंगारों में झुलसते हैं, किसी के आँसू की झलक में एक किरण बन जाना चाहते हैं, सत्य की जबान होना चाहते हैं, पीली रुग्ण शाम की जगह बार-बार प्रभात और सूर्योदय देखते हैं। वह पूछते हैं, ‘वीर वलिदानी की सदी है यह – हमीं उठेंगे क्या ? ‘ एक ही सदी में इतना उत्थान और इतना पतन! इस पतन में भी वह एक ऊबड़-खाबड़ रोमानी गूँज छोड़ जाते हैं।

रामविलास शर्मा नई आधुनिक कविता की अंतरात्मा के साथ न्याय नहीं कर सके। फिर भी उनकी सहानुभूति शमशेर को मिली है। उनका कहना है, ”वे भी जनता की तरफ से बोलते हैं। लेकिन अधिक व्यक्तिकेंद्रित होने की वजह से ऐसा मालूम होता है मानो शमशेर अपने लिए कह रहे हैं कि मैं काल से होड़ लेता हूँ। उनका जो ‘मैं’ है, वह सारी हिंदी कविता की तरफ से है, हिंदी जनता की तरफ से है।” (साक्षात्कार) वैयक्तिक होना व्यक्तिकेंद्रित या व्यक्तिवादी होना नहीं है। ऐसा कवि, जिसमें एक न एक स्तर पर विद्रोही आधुनिकता हो, कभी व्यक्तिवादी नहीं हो सकता। शमशेर दरअसल व्यक्ति की कलात्मक स्तर पर रक्षा करके उस समाज को ही बचा रहे थे, जो आधुनिकता के निर्मम चक्र द्वारा झुंड में रूपांतरित किया जा रहा था। झुंड में कोई आदमी व्यक्ति नहीं होता। आज हमारे चारों तरफ झुंड ही हैं।

काल तुझसे होड़ है मेरी : अपराजित तू

तुझमें अपराजित मैं वास करूँ।

इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूँ

सीधा तीर-सा

. . .

जो मैं हूँ

मैं कि जिसमें सब कुछ है . . .

क्रांतियाँ , कम्यून ,

कम्युनिस्ट समाज के

नाना कला विज्ञान और दर्शन के

जीवंत वैभव से समन्वित

व्यक्ति मैं

हिंदी पट्टी में क्रांतियाँ, कम्यून, कम्युनिस्ट समाज अपनी पहली सीढ़ी भी नहीं चढ़ सका। शमशेर इसी पट्टी के कवि थे। वह व्यक्ति स्तर से, एक कवि रूप में सारी लड़ाइयाँ अपने आत्मसंसार में ही लड़ सकते थे- कला के औजारों से। काल कभी नहीं हारता। ऐसे ही काल में वास कर वह चाहते हैं कि उनकी कला भी अपराजेय रहे। यदि कला पराजित नहीं हुई, व्यक्ति भी – हर मनुष्य में जो व्यक्ति है, वह भी गुम नहीं होगा। समझने की जरूरत है कि एक खास आधुनिक समय में व्यक्ति को कला के औजारों से बचाने का संघर्ष कितना महत्वपूर्ण था। यह ‘शब्द की ढाल पर कला की अमरता’ को बचाने का मामला था। कला की अमरता कला के लिए नहीं, व्यक्ति के अस्तित्व के लिए जरूरी थी। यह कला के बाजार की एक क्षयशील ‘वस्तु’ बन जाने से भिन्न मामला था। बहुत-से कवि और कलाकार इस संघर्ष में लगे हुए थे। यह संघर्ष जितना कला के लिए था, व्यक्ति के आंतरिक अस्तित्व के लिए भी था।

आधुनिकता नए दौर में बहुत सारी चीजों का सामना कर रही थी, मसलन शहरी समाज, उद्योगीकरण, व्यापक तकनीकी परिवर्तन, युद्ध और नव-उपनिवेशवाद । इनके साथ नए-नए दार्शनिक विचारों का सामना भी हो रहा था। निश्चय ही कम्युनिस्ट कहे जानेवाले नेताओं और बुद्धिजीवियों में जो एक नए ढंग का सामंतवाद सेंध लगा रहा था, जिसके कारण यह आंदोलन विस्तार न पा सका,वह भी सामने था। व्यक्ति चारों तरफ से घिरा था। इसका एक संपूर्ण बिंब ‘लहरें घेर लेती हैं’ कविता में है, जो छोटी होकर भी शमशेर को हर दिशा से खोलती है।

ये लहरें घेर लेती हैं

ये लहरें . . .

उभर कर अर्द्ध द्वितीया

टूट जाता है. . .

अंतरिक्ष में

ठहरा एक

दीर्घ रहेगा समतल- मौन

शमशेर की भाषिक सादगी और सतर्कता या बारीकी का मेल इस कविता में है। इसमें एक चित्र है और बहुआयामी संकेत भी। एक शब्द ‘लहरें’ में ही अनगिनत संकेत हैं। ये औद्योगिक सभ्यता की लहरें हो सकती हैं और किसी की बेरोजगारी या प्रेम की लहरें भी। ये युद्ध की दुश्चिंताएँ हो सकती हैं। ये देश की राजनीतिक पार्टियों के तरह-तरह के नारे और आश्‍वासन हो सकते हैं। शमशेर ने अपने एक साक्षात्कार में बताया है, ‘मुक्तिबोध जितने कांक्रीट हैं, मैं उतना ही एब्स्ट्रैक्ट हूँ…’ (कवियों का कवि शमशेर)। दूसरी पंक्ति में ‘ये लहरें…’ लहरों के निरंतर घेरने की सूचना है। आधुनिक जीवन में एक साथ अनगिनत चोटें हैं। ‘उभरकर अर्द्ध द्वितीया’ का तात्पर्य चांद से है, कोई निजी या राष्ट्रीय मनोरथ उभरता है और टूट जाता है, आधुनिकता की परियोजनाएँ अधूरी रह जाती हैं। ‘द्वितीया’ के कई काव्यात्मक आसंग हैं। वह हमारी कोई कामना है, जिससे हमारे जीवन की खुशी, राष्ट्रीय जीवन या विश्‍व की कोई भावी उपलब्धि जुड़ी हुई है। हमारे जीवन की अर्द्ध द्वितीया का टूटना जैसे किसी उम्मीद का टूटना हो। यह उम्मीद दूर तक बनी हुई थी, पर अब निराशा है, एक दीर्घ मौन है जीवन के समतल से शुरू होकर अंतरिक्ष तक फैला। उपर्युक्त कविता की अंतिम पंक्तियां हैं, ‘अगिन व्यथा पर सहसा/कौन भाव/बिखर गया इन सब पर?’ मौन की व्यथा अग्निमय है, जिससे बिखरे हुए जीवन में आशा की एक झलक पुन: मिल जाती है। मौन अज्ञेय की तरह ही शमशेर की कविता में भी एक खास अर्थ रखता है , यह पुनर्जीवन की जगह है।

शमशेर शब्द के पीछे से बोलते हैं, उनका कथन व्यंजनात्मक है। उनकी भाषा बोलचाल वाली है, पर इशारे कवि के हैं। एक-एक शब्द कई-कई अर्थ-ध्वनियों के साथ है। शमशेर ने कहा है, ”मैं कोशिश यही करता हूँ कि उस सरलता पर आ जाऊँ कि वह अधिक लोगों को बोधगम्य भी हो और उसके साथ-साथ मेरी अनुभूतियों की जो विशिष्टता है, वह भी कायम रहे…” (बातचीत, पूर्वग्रह-12-13)। नई आधुनिक कविता में अनुभूति की विशिष्टता का गहरा तकाजा रहा है। इसका एक मतलब यह है कि कविता किसी लोकप्रियतावादी पाठ से अलग मामला है। यह फिल्म, टेलिविजन और ठोस सांस्कृतिक मूल्य वहन करनेवाली चीजों से अलग है। कविता कभी भी ऐसी कोई उत्पादित सांस्कृतिक वस्तु नहीं है, जिसकी पहुँच सरलता के कारण ज्यादा लोगों तक होती है और जिसकी बाजार में एक कीमत होती है। फिर भी कविता इस कदर महत्वपूर्ण है, जो नहीं पढ़ेगा उसे कहीं पिछड़ जाना होगा।

नई कविता का दौर, यदि हम शमशेर को देखें, 40 के दशक से शुरू हो जाता है। उनकी नए ढंग की कविताएँ 1937-38 से आने लगती हैं, जिनमें कुछ ‘उदिता’ और ‘कुछ और कविताएँ’ में संकलित हैं। इनके बाद ही ‘तारसप्तक’ (1943) का इतिहास आता है। शमशेर उम्र में ही अपने समकालीनों से बड़े नहीं हैं, नई कविता के मामले में भी पथ प्रदर्शक हैं। इस दौर में कथन-भंगिमा में भिन्नता के बावजूद कवियों ने सम्मिलित रूप से बार-बार कहा कि कविता में काव्यात्मकता पहली चीज है, भले अंतिम चीज नहीं। शमशेर को कुछ चीजों को देखकर कविता के संबंध में लगता था, ”अभिव्यक्ति गद्य में भी हो सकती है। लेकिन इस अभिव्यक्ति के साथ जो काव्यात्मक पक्ष है, यानी उसमें काव्य की गहराई का जोर, कविता का जो जोर है उसकी तरफ ध्यान शायद इतना नहीं है…'(वही)… साहित्यकार का एक दायित्व नागरिक की हैसियत से है कि वह सामाजिक समस्याओं को उठाए, पर शमशेर मानते थे, ”डाइडैक्टिक किस्म का साहित्य, कविता, कहानी वगैरह लिखना एक बड़ी गलत-सी बात है…” (वही)। एक सांस्कृतिक अवधारणा के दायरे से आते हुए भी साहित्यिकता क्या है, काव्यात्मकता क्या है, यह हर लेखक की अपनी तलाश की चीज रही है। फिर भी हर युग में इतना जरूर तय रहा है कि कविता एक कल्पनाशील लेखन है और इसे दूसरे सांस्कृतिक रूपों से कुछ ‘भिन्न’ होना चाहिए।

यह लक्षित किया जा सकता है कि शमशेर में परंपराओं की कोई घुलीमिली उपस्थिति नहीं है। कोई एकदम प्रगतिशील मिजाज की कविता है, कोई भिन्न एकदम प्रयोगात्मक है। कहीं पश्चिमी कला आंदोलन झाँकते हैं। कहीं निराला और कहीं गालिब झाँकते हैं। कहीं पंत दिखाई पड़ते हैं। कहीं बिल्कुल उर्दू अल्फाज हैं, कहीं तत्समबहुलता है। शमशेर में सबसे अधिक विविधता है, सबसे कम कविताओं के बावजूद। उन्होंने जहाँ यह लिखा ‘सरकारें पलटती हैं जहाँ हम दर्द से करवट बदलते हैं’, वहीं यह भी लिखा, ‘वो दुश्मन मेरा इतना अच्छा है क्यों/जो अपना नहीं है वो अपना है क्यों…’ गालिब भी दुविधा में थे, ‘काबा मेरे आगे है, कलीसा मेरे पीछे…’ एक तरफ मजहब -ईमान था, दूसरी तरफ चमकदार अंग्रेजी राज था। यह दुविधा आधुनिक समय की वास्तविकता है, पर शमशेर को इसे लेकर कोई दुविधा नहीं है कि कविता में पहली चीज है काव्यात्मकता। उन्होंने अपनी कविता में उग्र राजनीतिक ढंग से कोई बात नहीं कही। जो कुछ कहा, बहुत धीमे और गहराई से कहा।

लेकर सीधा नारा

कौन पुकारा

अंतिम आशाओं की संध्या से ?

पलकें डूबी ही सी थीं

पर अभी नहीं

कोई सुनता सा था मुझे

कहीं ,

फिर किसने यह , सातों सागर के पार

एकाकीपन से ही , मानो हार ,

एकाकी उठ मुझे पुकारा

कई बार ?

कवि के पास एक साइलेंसर होता है, इससे नारा भी कविता बन जाती है। ऐसी कविता जीवन में दूर तक अपना काम करती है। वह निशाने को, मर्म को अधिक गहराई से बेधती है। कवि झुंड के साथ चिल्लाकर नहीं, अकेले ही उठकर जब सच्चाई से पुकारता है, उसकी आवाज सात सागरों के पार तक जा सकती है। भारत में वामपंथी आंदोलन की दशा कुछ ऐसी रही है कि बहुत-से कवि, बहुत लेखक सिर्फ मन ही मन इससे जुड़े रह सके। वे कई बार आंदोलनों में शरीक होकर भी एकाकी थे। ऐसी बहुत-सी तकलीफदेह चीजें थीं, जिनके कारण हिंदी क्षेत्र में कवि-बुद्धिजीवी महसूस करते थे कि मानवता की मुक्ति के लिए कुछ अंतिम आशाएँ ही हैं, पर कैसी ट्रेजेडी कि इनकी भी संध्या आ रही है। शमशेर के काव्य में उषा जागरण की लालिमा से भरी दिखती है, पर शाम तो बस – ‘एक पीली शाम/पतझर का जरा अटका हुआ पत्ता’ है। इस कविता में ‘अंतिम आशाओं की संध्याओं से’ एकाकी ही जो पुकार उठती है, उसमें जितनी गहरी उदासी है, उस पुकार में कुछ उतना ही एक गहरा सहारा भी है।

कोई कविता व्यक्तिगत नहीं हो सकती। ऐसा कोई घर नहीं है, जिसका दरवाजा हमेशा बंद हो। निश्चय ही कविता निजी संवेदना के परिसर में घटित होती है, पर उसकी ध्वनि-प्रतिध्वनि समाज की घटनाओं से असंपर्कित नहीं रह पाती। शमशेर की अनुभूतियों की जो विशिष्टता और अन्वेषणशीलता है, वह सब उनके जीवन, परिवार, समाज और देश से विमुख नहीं है। उस पर दुनिया भर की साहित्यिक और राजनीतिक हलचलों का दबाव है। शमशेर के पास दर्द से भरा एक पागल मन है। उनकी कविता में शब्दालाप करता एक पागल है। उन्होंने शिल्प के स्तर पर भले बहुत सोच-समझ कर अपना शब्दगणित बैठा कर ही सबकुछ लिखा हो, उनकी अनुभूति में खुलापन और विस्तार है। बल्कि उनका शिल्प-गठन ऐसा है कि उसके चित्र और संगीत में पाठक दूर-दूर की यात्रा कर सकें। वे ओझल सच्चाइयों को जान सकें, मौन पदचापों को सुन सकें और सौंदर्य का सौंदर्य देख सकें।

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