आलोचक अज्ञेय की उपस्थिति – कृष्णदत्त पालीवाल

कृष्णदत्त पालीवाल  KRISHANDATT PALIVAL

अज्ञेय के आलोचना कर्म की गहराई और व्यापकता पर एकाग्रता से मन को केंद्रित करने की आवश्यकता है, जबकि उनके इस पक्ष की हिंदी आलोचना में घोर उपेक्षा की गई है। प्रायः उनके चिंतन को पश्चिम की घटिया नकल कहकर खारिज कर दिया जाता रहा है। मार्क्सवादी आलोचना – अंधा अधिनायकवादी चक्र अज्ञेय को अमेरिकी पूँजीवादवादी दलाल, कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम का एजेंट, रूपवादी, कलावादी, भाववादी, व्यक्तिवादी तथा लघुमानववादी सिद्धांतों का प्रतिष्ठापक कहकर कोसता रहा है। वे यह निरंतर भूलते रहे हैं कि अज्ञेय ने आलोचना चिंतन में रूपवाद-व्यक्तिवाद का समर्थन कभी नहीं किया, हर कीमत पर ‘सौंदर्यबोध और शिवत्व बोध’ का समर्थन किया है तथा स्वच्छंदतावादी -रसवादी चिंतन के विरोध की निरंतर अगुआई की है।

इस अगुआई का ही नतीजा है कि उन्होंने भारतीय भूमि पर खड़े होकर अपने को पश्चिम के आतंक से मुक्त रखा है और चिंतन में पश्चिमी औपनिवेशिक आधुनिकता की कठोर आलोचना की हैं। मानव को निरंतर माँजनेवाली, संस्कार देनेवाली मानवीयता और मुक्ति प्रदान करनेवाली देसी आधुनिकता का या भारतीयता का पक्ष ग्रहण किया है। आलोचना चिंतन के भीतर से गुजरने पर पाते हैं कि आलोचना कई प्रकार की होती हैं – क्योंकि वह कई उद्देश्यों से की जा सकती है। सब आलोचना मूल्यवान नहीं होती, उसका उद्देश्य प्रभाव उत्पन्न करना या व्याख्या करना भी हो सकता है। लेकिन अंततोगत्वा आलोचक को कहीं न कहीं मूल्यों का विचार करना ही पड़ता है – कृति का मूल्यांकन वह न भी करे तो भी स्वयं उसकी रसास्वादन की प्रक्रिया में उसके स्वीकृत मूल्यों या प्रतिमानों का महत्व होता है। समालोचक क्या पाता है इस बात पर निर्भर करता है कि वह क्या लेकर चलता है। यह सब कहने के बाद अज्ञेय ने ध्यान देकर कहा और मूल्यांकन प्रत्यक्ष या परोक्ष बिना मूल्यों या प्रतिमानों के नहीं हो सकता, मानदंड के बिना माप कैसे हो सकती है? यहाँ पर हम आलोचना की मूल समस्या के सामने आ खड़े होते हैं। प्रश्न उठता है कि मूल्य किसे कहते हैं? यह प्रश्न निःसंदेह बहुत व्यापक है और यह भी कहा जा सकता है कि युग-युगांतर के दार्शनिकों और साधकों की मूल जिज्ञासा यही रही है। वह अंतिम कसौटी क्या है जिस पर कसकर हम किसी भी कृति के धातु की पहचान कर सकते हैं। किंतु अपनी जिज्ञासा को सीमित रखना असंभव नहीं है और न ऐसी सीमित पड़ताल अनुपयोगी ही होगी।

अज्ञेय में आत्मबोध, ज्ञान बोध और विचार बोध की जागृत क्लासिकल संवेदना है और इसी क्लासिकल संवेदना के मूल्यबोध ने उनके आलोचक का निर्माण एवं परिष्कार किया है। अज्ञेय कहते रहे हैं – विनम्रतावश और विनम्रता विद्या विनय प्रत्यक्ष करती है, उसे लोक चिंतन से जोड़ती है कि आलोचक में अहं की स्फीति अच्छी तरह होती है। अज्ञेय ने विनम्र भाव से माना है कि समीक्षक को जैसा सुपठित शास्त्र निष्णात होना चाहिए वैसे हम नहीं हैं। उसका हमें पूरा ज्ञान है। आचार्यत्व की न हममें पात्रता है न आकांक्षा। किंतु मूल्यों का प्रश्न केवल आचार्य के लिए महत्व रखता है। ऐसा नहीं है, साहित्य के प्रत्येक अध्येता के लिए यह एक गुरुतर प्रश्न है। और लेखक के लिए तो उसकी मौलिकता असंदिग्ध है। क्योंकि कृतिकार अपनी कृति का सबसे पहला और सबसे निर्भय परीक्षक है। यह भी सच है कि सभी प्रतिमानों का सब मूल्यों का स्रोत मानव विवेक है। समीक्षा में मानववादी इस मानव विवेक की बौद्धिकता को आदर देता रहता है। वह सौंदर्य बोध की चर्चा में बुद्धि को हेय मानकर बोध को महत्व कैसे दे सकता है। इस तरह आलोचक का एक लक्षण है – रस या आस्वादन-क्षमता से संपन्न सहृदयता कला मूल्य अनुभवों की विविधता से प्राप्त होते हैं किंतु अनुभव अपने आप में प्रतिमान नहीं है। प्रतिमान की उपलब्धि तो तर्क बुद्धि से ही होती है – बुद्धि अनुभव के सहारे चलती है और अनुभव व्यक्तिगत, समाजगत, जातिगत, युग-युगांत संचित और अनुभव कोई स्थिर जड़ पिंड नहीं, निरंतर गतिशील, विकासशील। इस अर्थ में शाश्वत मूल्यों की बात अनुचित अथवा अर्थहीन हो जाती है। स्पष्ट विचार यह है कि अज्ञेय जी आलोचना में शाश्वतवादी दृष्टि को अस्वीकार करते हैं।

अज्ञेय जी की आलोचना दृष्टि में परंपरा या पूर्वापर संबंधपरकता का बड़ा भारी आदर है। उन्होंने कहा है कि किंतु विकास का सही अर्थ समझना चाहिए। बुद्धि का नए अनुभवों के आधार पर क्रमशः नया स्फुरण और प्रस्फुटन होता है और नया अनुभव पुराने अनुभव को मिटा नहीं देता, उसमें जुड़कर उसे नई परिपक्वता देता है। अनुभव के गणित में जोड़ ही जोड़ है बाकी नहीं है। साहित्य के क्षेत्र में हम परंपरा की चर्चा इसी अर्थ में करते हैं – तारतम्यता उसमें अनिवार्य हैं तो मूल्य या प्रतिमान, शब्दार्थ की दृष्टि से शाश्वत भले ही न हो, स्थायी अवश्य होते हैं। और उसमें जो परिष्कार या नया संस्कार (परिवर्तन उसे न कहना ही समीचीन होगा) होता है उसमें सदियाँ लग सकती है। संचित अनुभवों के दवाब नई दृष्टि देते हैं जिससे बुद्धि के व्यापक प्रखरतर आलोक से वह दीप्त हो उठता है। बुद्धि उस आलोक से लाभ उठाकर अर्थ की नई प्रतिपत्ति करती है। शिवत्व के प्रतिमान, नैतिक प्रतिमान, सौंदर्यबोध के प्रतिमान – मानव विवेक से उद्भूत होते हैं। जैसे साहित्य बँधी-बधाई लीकों से पाठक को उबारता है वैसे ही आलोचना भी लीकबद्धता को तोड़ती है। कलाकृति के परख की कसौटी नए सौंदर्य-बोध में निहित रहती है। कलाकृति में ‘काव्यत्व’ क्या है और ‘नया’ क्या है? कविता में ‘नई कविता’ क्या है और नई के साथ कविता को नई कविता को प्रतिष्ठित करना अज्ञेय का संकल्प रहा है। अज्ञेय के इस संकल्प का विरोध छायावादी प्रगतिवादी आलोचकों ने मिलकर किया, लेकिन अज्ञेय उनके सामने न रुके न झुके, निर्भय भाव से आगे बढ़े और जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचियों के प्रतिमानों पर प्रहार किया। छायावादी-प्रगतिवादी प्रतिमानों से कभी समझौता नहीं किया। बल्कि उनकी बराबर पोल खोली। इसलिए हिंदी आलोचना में मार्क्सवादी और रूसवादी दोनों अज्ञेय से शत्रुता मानते रहे हैं। समाजवादी या लोहियावादी लक्ष्मीकांत वर्मा ने अज्ञेय के विद्रोही तेवर को पहचानते हुए कहा – नई कविता बनाम अच्छी कविता के प्रकर्मक आज अपनी प्रतिष्ठा की उपलब्धि को परंपरा से संबद्ध करके अपने संपूर्ण प्रगतिशील व्यक्तित्व को प्रतिष्ठा देना चाहते हैं। (नए प्रतिमान पुराने निकष पृ. 296) समस्या थी स्वच्छंदता, काव्य संस्कारों के प्रतिमान इसमें थे और नई कविता बौद्धिक संवेदना की कविता थी – अपने द्वंद्वमय परिवेश से पूरे तनाव के साथ जूझती कविता थी। अज्ञेय के सामने नए प्रयोगों नए संस्कारों के प्रश्न थे वे स्वयं भी प्रश्नाकुल कवि थे। मैथिलीशरण गुप्त के शिष्य थे और विद्रोही संस्कार अज्ञेय जी ने गुप्तजी से अपनी तरह से अपनी शर्तों पर पाए थे। गुप्तजी दिखाई सरल-सीधे सपाट-बयानी के कवि देते हैं लेकिन है जबरदस्त विद्रोही और रीतिवाद विरोधी अभियान में शामिल आलोचक। अपने इस गुरु का प्रभाव अज्ञेय पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में पड़ा है।

रस-सिद्धांत, रस-विकास, रसवाद से अज्ञेय कभी आश्वस्त नहीं रहे। अज्ञेय के साथ नई कविता के सभी रचनाकारों ने रस-चिंतन के प्रतिमान को अस्वीकार किया। हरिऔध का रस कलश, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के रस-मीमांसा का चिंतन और डॉ. नरेंद्र का रस सिद्धांत कभी भी अज्ञेय को रास नहीं आया। अज्ञेय के नई कविता-सिद्धांत में रस-सिद्धांत को एक दम जगह नहीं है। रसानुभूति की अनिर्वचनीयता, अखंडता, तन्मयता ब्रह्मानंद सहोदरता, संबंधित विश्रुति विश्रांति में अज्ञेय का दूर-दूर तक विश्वास नहीं है। अज्ञेय की अनुभव संपदा के अनुसार आज के बुद्धिप्रधान युग में मानव की अनुभूतियाँ रागात्मक नहीं रह गई हैं – नए रागात्मक संबंधों के उदय ने उनका पूरा संसार बदल दिया है। अब कोई भी साकेत, कामायनी, रंगभूमि और अंधायुग के अंगीरस के खोजने के चक्कर में नहीं पड़ता। जो पड़ता है वह पिछड़ा है क्योंकि नई कविता का भाव बोध हमें रिझाता नहीं है खिजाता है तनावग्रस्त करता है और तमाम संशयों से भर देता है। डॉ. नगेंद्र ने रस प्रतिमान को लेकर अज्ञेय की छोटी कविता ‘सोनमछली’ का भाष्य लिखा और समीक्षा के क्षेत्र में उपहास का विषय बने। ‘सोन मछली’ को लेकर डाँ नगेंद्र ने कहा, अज्ञेय की यह कविता नई कविता है और सुंदर भी। उसके आकर्षण का रहस्य क्या है? सुंदर बिंब? हाँ इन पंक्तियों द्वारा प्रमाता की कल्पना में उदबुद्ध बिंब निश्चय ही अत्यंत आकर्षक और सजीव है।’ (रस सिद्धांत पृ. 356-57) लेकिन नई कविता की आधुनिकता ने रसचिंतक का विरोध किया। अज्ञेय ने कहा है कि रस का आधार है समाहिति, अद्वंद्व। किंतु नई कविता द्वंद्व और असामंजस्य की कविता है। एक नई कविता वर्तमान पर केंद्रित है जबकि रस आधारित कविता अतीतमुखी रहती है। नई कविता का विषय है क्षण की अनुभूति। जबकि रस का आधार है – जन्मांतर्गत वासना और स्थायी भाव। (अज्ञेय का अभिभाषण) इसी माहौल ने रस चिंतन का पूरा गठन ही ध्वस्त करा दिया। नई कविता के सिद्धांत पर विजयदेव नारायण शाही ने रस संबंधी तमाम बहसों से थककर यह अनुरोध किया कि रस सिद्धांत पर बहस अब बंद हो जानी चाहिए क्योंकि कोई फायदा नहीं निकलेगा। अज्ञेय और शाही जी के रस विरोधी चिंतन का हिंदी आलोचना में नुकसान यह हुआ कि लोग आचार्य रामचंद्र शुल्क के ‘रस मिमांसा’ के लेखों में व्याप्त रस चिंतन को बिना समझे अंधे होकर खंडित करने लगे। और मौके पाकर मार्क्सवादी आलोचना ने समीक्षा भूमि को मनमाने ढंग से घेर लिया। हिंदी आलोचना पर मार्क्सवादी सामंतवाद के काबिज होने की यह एक अद्भुत कहानी है। फिर हुई मार्क्सवादी आलोचना की कम्युनिष्ट परिणति जिसकी क्रूरता और चौंकानेवाली है।

हिंदी आलोचना के इसी दौर में विजयदेव नारायण शाही ने अज्ञेय, जयशंकर प्रसाद और शमशेर की काव्यानुभूतियों की बनावट के विश्लेषण का बीड़ा उठाया। अज्ञेय से सिर से पैर तक प्रभावित विजयदेव नारायण साही में अद्भुत बौद्धिकता थी। उन्होंने शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट शीर्षक लेख में कहा कि नई कविता की बहसों में यह मान्यता अंतर्भुक्त रही है कि न सिर्फ कविता का ऊपरी कलेवर बदला है या नए प्रतीकों या बिंबों पर शब्दावली की तलाश हुई है बल्कि गहरे स्तर पर काव्यानुभूति की बनावट में ही परिवर्तन आ गया है। शाही के इस कथन से नई कविता के आलोचना संग्राम में तेजी आई। डॉ. देवराज, डॉ. नामवर सिंह, प्रकाशचंद्र गुप्त, रामविलास शर्मा, शमशेर, गिरीश कुमार माथुर, नेमिचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल समेत तमाम प्रबुद्ध समीक्षकों का दल कविता के प्रतिमानों पर विचार करते लगा और लक्ष्मीकांत वर्मा की पुस्तक नई कविता के प्रतिमान को किनारे कर दिया गया। हिंदी आलोचना में बड़ा भारी भीषण संग्राम हुआ। अनुभूतियों के परिवर्तन सौंदर्यों पर खोज शुरू हुई तो फिर अज्ञेय चर्चा के केंद्र में आए। क्योंकि पहली बार अज्ञेय ने ‘दूसरा सप्तक’ 1951, की भूमिका में रागात्मक संबंधों के बदलाव के विचार को पूरा बल देकर उगाया था। अज्ञेय का कथन इस प्रकार है कि यह कह सकता है कि हमारे मूल राग-विराग नहीं बदले प्रेम अब भी प्रेम है और घृणा अब भी घृणा है। यह साधारणतया स्वीकार किया जा सकता है। पर यह भी ध्यान में रखना होगा कि राग वही रहने पर भी रागात्मक संबंधों का क्षेत्र होने के कारण इस परिवर्तन का कवि-कार्य पर बहुत गहरा असर पड़ा है। अज्ञेय के इस कथन में यह विचार भी खुलकर सामने आगया कि बदलाव के पीछे युग का यथार्थ बोध है।

अज्ञेय ने अपने विचार को भीतर से खोलते हुए कहा ‘निरे तथा और सत्य में या कह लीजिए वस्तु सत्य और व्यक्ति-सत्य में यह भेद है कि सत्य बाह्य तथ्य है जिसके साथ हमारा रागात्मक संबंध है। बिना इस संबंध के वह एक बोध वास्तविक है जो तद्वत काव्य में स्थान नहीं पा सकती। लेकिन जैसे-जैसे वाह्यिक वास्तविकता बदलता है, वैसे-वैसे उससे हमारे रागात्मक संबंध जोड़ने की प्रणालियाँ भी बदलते हैं और अगर नहीं बदलती तो उस बाह्य वास्तविकता से हमारा संबंध टूट जाता हैं। कहना होगा की जो आलोचक इस परिवर्तन को नहीं समझ पा रहे हैं। वे उस वास्तविकता से टूट गए हैं जो आज की वास्तविकता है। उससे रागात्मक संबंध जोड़ने के असमर्थ वे उसे केवल बाह्य वास्तविकता मानते हैं जब कि हम उससे वैसा स्थापित कर के उस आंतरिक सत्य बना लेते है।

प्राचीन शास्त्रीय अवधारणाओं की व्याख्या – पुनःवक्ता में अज्ञेय जैसा सचेत रचनाकार आलोचक कम मिलेगा। साधारणीकरण के बिना और प्राचीन समस्याओं पर उनका ध्यान जाता है कि प्राचीन काल में ज्ञान सीमित था कवि वैज्ञानिक के अलग-अलग बिल्ले अनावश्यक थे साधारणीकरण की समस्या दूसरे प्रकार की थी तब भाषा का केवल एक महत्व था। लेकिन स्थिति बदल गई है विज्ञान के युग में भाषा का एक रहते हुए भी उसके मुहावरे बदल गए है। भाषा आज भी प्रेषण का माध्यम है यह कोई नहीं कहता कि अब उसने सार्वजनिकता की प्रवृत्ति छोड़ दी है या छोड़ दे। लेकिन अब वह प्रवृत्ति है तथ्य नहीं। ऐसी कोई भाषा नहीं जो सब समझते हों, सब बोलते हों। गणितज्ञ की अन्वेषी दृष्टि है और रचनाकार की दृष्टि ऐसी स्थिति में कवि के सामने रागात्मक सत्य को प्रेषित करने की समस्या है – इस प्रकार वह साधारणीकरण के लिए ही एक संकुचित क्षेत्र का साधारणीकरण मुहावरा छोड़ने को बाध्य होगा अर्थात एक दूसरे अंतर्विरोध की शरण लेगा। यदि यह निरूपक ठीक है तो प्रश्न बनता ही है कि दोनों अंतर्विरोधों में से करना साग्राह्य है। हम इतना ही कहेंगे कि जो दूसरा क्षेत्र चुनता है उसे कम से कम एक अधिक उदार अधिक व्यापक दृष्टि से देखने या देखना चाहने का श्रेय तो मिलना चाहिए।

साधारणीकरण का प्रश्न भाषा का प्रश्न है शब्द-अर्थ का और इस प्रश्न से अज्ञेय जीवन भर जूझते रहे। हर साँस में कहते रहे जरा भाषा के मूल प्रश्न पर शब्द और उसके अर्थ संबंध पर ध्यान दीजिए। शब्द में अर्थ कहाँ से आता है। क्यों और कैसे बदलता है, अधिक या कम व्यप्ति पाता है? अज्ञेय ने उदाहरण देकर समझाया – हम कहते हैं गुलाबी और उससे एक विशेष रंग का बोध हमें होता है। निस्संदेह इसका अभिप्राय है गुलाब के फूल जैसा रंग, यह उपमा उसमें निहित है। आरंभ में गुलाबी शब्द से उसे उस रंग तक पहुचने के लिए गुलाब के फूल की यह मध्यस्थता अनिवार्य रही होगी, उपमा के माध्यम से ही अर्थ लाभ होता रहा होगा। उस समय यह प्रयोग चामत्कारिक रहा होगा। पर अब ऐसा नहीं है। अब हम शब्द से सीधे रंग तक पहुँच जाते हैं। फूल की मध्यस्थता अनावश्यक है अब उस अर्थ का चमत्कार मर गया है। अब वह अभिधेय हो गया है।

अज्ञेय ने अपने रचनानुभव से संवाद करते हुए आलोचना में एक बेहद महत्वपूर्ण स्थापना की ओर साधारणीकरण के पुराने सिद्धांत को नया अर्थ संदर्भ दे दिया। उन्होंने कहा यह क्रिया भाषा में निरंतर होती रहती हैं और भाषा के विकास की एक अनिवार्य क्रिया है। चमत्कार मरता रहता है और चामत्कारिक अर्थ अभिधेय बनता रहता है। यों कहें कि कविता की भाषा निरंतर गद्य की भाषा होती जाती है। इस प्रकार कवि के सामने हमेशा चमत्कार दृष्टि की समस्या बनी रहती है वह शब्दों को निरंतर नया संस्कार देता चलता है और वे संस्कार क्रमशः सार्वजनिक मानस में पैठ कर फिर ऐसे हो जाते हैं कि उस रूप में कवि के काम के नहीं रहते… बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है। कवि के सामने वागर्थ प्रतिपत्ति की समस्या हर युग में रहती है और इसी समस्या की ओर कालिदास ने संकेत किया। तब इस बात को उन्होंने समझा था और इसीलिए वाक में अर्थ की प्रतिपत्ति की प्रार्थना की थी। जो अभिधेय है जो अर्थ वाक् में है ही उसकी प्रतिपत्ति की प्रार्थना कवि नहीं करता। अभिधेयार्थ युक्त शब्द तो वह कच्ची मिट्टी वह कच्चामाल है जिससे वह रचना करता है ऐसी रचना जिसके द्वारा वह अपना नया अर्थ उसमें भर सके। उसमें जीवन डाल सके यही वह अर्थ प्रतिपत्ति है जिसके लिए कवि वागर्थ बिंब संपृक्त पार्वती परमेश्वर की प्रार्थना करता है।

कवि-कर्म न निरा वैचित्र्य है न नएपन की खोज। वह निरंतर नए अर्थ की नए अर्थ संदर्भ की रागात्मक प्रतिपत्ति है। इस स्थिति पर अज्ञेय का कथन है ‘जब चमत्कारिक अर्थ मर जाता है, उस अर्थ से रागात्मक संबंध स्थापित नहीं होता। कवि तब उस अर्थ की प्रतिपत्ति करता है जिस से पुनःराग का संचार हो, पुनः रागात्मक संबंध स्थापित हो। साधारणीकरण का अर्थ यही है।’ साधारणीकरण का यह अर्थ न भट्टनायक को अभिप्रेत था न अभिनव गुप्त को न साधारणीकरण और व्यक्ति वैचित्र्यवाद का संबंध लिखनेवाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल को एक नई रचना स्थिति का तर्क अज्ञेय ने दिया और कहा – नहीं तो। यह भाव भी नहीं जाने पुराने हैं रस भी और संचारी व्यभिचारी सबकी तालिकाएँ बन चुकी हैं तो कवि को नया करने को क्या रह गया है? क्या है तो कविता को आवृत्ति का नहीं सृष्टि का गौरव दे सकता है? कवि नए तथ्यों को उनके साथ रागात्मक संबंध जोड़ कर नए सत्यों का रूप दे, उन नए सत्यों को प्रेष्य बनाकर साधारणीकरण करे। यही नई रचना है। इसे नई कविता का कवि नहीं भूलता।’

इसलिए यह कहना कि अज्ञेय साधारणीकरण का सिद्धांत स्वीकार नहीं करते। छायावादी आलोचकों का गलत प्रचार है। साधारणीकरण को लेकर को भ्रम न रहे इसलिए कहा है साधारणीकरण का आग्रह भी उसका कम नहीं हैं, बल्कि यह देखकर की आज साधारणीकरण अधिक सार्थक है वह अपने कर्तव्य के प्रति अधिक सजग है और उसकी पूर्ति के लिए अधिक बड़ा जोखिम उठाने को तैयार है। उलझी संवेदनाओं के कारण साधारणीकरण का काम कवि कर्म में चुनौती बनगया है इस विज्ञान की विशेषिकरण की प्रवृत्ति ने कवि कर्म में इस काम को अधिक कठिनतर बना दिया है।

अज्ञेय ने 1943 में ‘तारसप्तक’ में जब हिंदी के मौलिक समीक्षा शास्त्र की ओर ठोस और निर्भय कदम उठाया तो हिंदी के आलोचनाशास्त्र में एक भूचाल आ गया। लेकिन कुछ समय बाद वाद-विवाद और पाठ-कुपाठ के बाद यह अनुभव किया गया कि सभी नई अवधारणाओं के बीच ‘तारसप्तक’ की भूमिका में ही मौजूद हैं। जब कि अज्ञेय जैसे मूर्धन्य प्रतिभा का अवदान अभी तक सही आकलन की प्रतीक्षा कर रहा है। इस बात को ठीक से समझा नहीं गया कि आधुनिकता, आधुनिक संवेदना, आधुनिक भावबोध और आधुनिक रचना स्थिति के तर्क की शुरुआत ‘तारसप्तक’ से हुई ‘शेखरः एक जीवनी’ से हुई। कविता को लेकर जिस बेचैन प्रश्नाकुलता, प्रयोगशीलता, नई सर्जनात्मकता, की शुरुआत हुई थी आज वहीं नए सृजन में फल-फूल रही है, जिन कवियों ने ‘राहों का अन्वेषी’ कहने पर अज्ञेय का विरोध किया था वे बदली हवा में अज्ञेय की चरण धूलि सिर पर धारण कर रहे हैं। इन सभी को ‘प्रयोग’ की सूझ से अनेक राहें दिखाई दे रही हैं। धीरे-धीरे अज्ञेय नए काव्य में विद्रोह के मिथक-पुरुष बन गए है। आज अज्ञेय भगवान हैं। कि उनकी नई दृष्टि, नई परिवेश चेतना, नई मूल्यदृष्टि साहित्य में रचना प्रतिमान बनी है ओर नई पीढ़ी अज्ञेय की नई छवि पढ़ने में निकल पड़ी हैं।

साहित्य में अज्ञेय को भुलाकर न शमशेर को समझा जा सकता है न मुक्तिबोध को न केदारनाथ अग्रवाल को न केदारनाथ सिंह को न श्रीराम वर्मा को और न नंदकिशोर आचार्य को। अज्ञेय को इस बात की पहचान थी कि आगे आनेवाला यंत्र युग नए सृजन संकट उपस्थित करेगी और जैसे जैसे कलाकृति केद्रित विमर्श केंद्रीय स्थान प्राप्त करेगा वैसे-वैसे प्रतिमानों की चर्चा पर जोर कम होता जाएगा। कलाकृति के भीतर से ही राग दीप्त सच लिए नए प्रतिमान नई काव्य समझ से पैदा होंगे। आरोपित मार्क्सवादी प्रतिष्ठान परिधि पर जाकर विलखते मिलेंगे। क्योंकि कलाकृतियाँ विचारधाराओं की गुलामी स्वीकार नहीं कर सकतीं। रचना की स्वायत्तता के मूल्य चेतना का अपना तंत्र होता है। यह समझकर ही स्थापित व्यवस्था के प्रति अज्ञेय ने अपना सत्ता विरोधी, विचारधारा विरोधी, संप्रदाय या दल विरोधी आलोचनात्मक रुख आलोचना शास्त्र जड़ चिंतन के लिए अज्ञेय ने विचारों की जिस स्वतंत्रता की अगुआई की थी उसका एक गौरवपूर्ण इतिहास नई पीढ़ी के सामने उपस्थित है।

हमारी आलोचना धर्म, संप्रदाय जाति वर्ग, उपनिवेशवादी आधुनिकता से उबरकर उस गहराते सांस्कृतिक संकट का सामना कर रही है जिसे अज्ञेय ने ‘त्रिशंकु’ के निबंधों और ‘तारसप्तक’ तथा सप्तकों की भूमिकाओं में अनुभव किया था। आज हिंदी की बहुवचनात्मक दृष्टि और मिश्र संस्कृति खतरे में है हमें हर मोड़ पर अज्ञेय की याद आती हैं। वे तो साहित्य विरोधी आंदोलन के आंदोलनों में थे और सृजन में मानव मुक्ति के अवलंबदार साहित्य की समाज में जगह बनाने में अज्ञेय अनथक भाव से सक्रिय रहे। अज्ञेय का मौन और सच्चा रूप हिंदी आलोचना को समझ में न आया। उनके सामने गुणवत्ता वे ही अपने को समझते रहे जो झूठ मसखरी से साहित्य वधू का शीलहरण करते रहे। जबकि अज्ञेय ने लगभग पाँच दशकों तक हिंदी का सृजन और आलोचना कर्म समृद्ध किया। उनकी आलोचना ने अनेक नई अवधारणा उसको चिंतन के केंद्र में स्थापित किया और प्रतीक 1946, तथा नया प्रतीक 1972 ने नए प्रतिमान साहित्य में प्रस्तुत किए। व्यक्ति-स्वातंत्र्यवाद, अस्मिता की खोज प्रेय परंपरा, मिथक, आख्यान, इतिहास, संस्कृति आधुनिकता, औपनिवेशिक मानस, काव्यभाषा, काव्य बिंब, कथ्य-भाषा और संप्रेषण कविता और द्वंद्व, लय और ध्वनि बोध, आदि को लेकर न जाने कितने नए से नए प्रश्न उठाए, साथ ही हिंदी आलोचना को सर्जनात्मकता का नया रंग देते हुए भाषा में सर्जनात्मक टिप्पणियों को स्थान दिया। वे मार्क्सवाद के विरोधी रहे लेकिन मानव की मुक्ति और वृहत्तर सामाजिकता, मानव जातियाँ, वरण की स्वतंत्रता, लघुतापरक साहित्यिक दृष्टिपात, रचनाकार के सामाजिक दायित्व का उन्होंने सदैव सम्मान किया। आज जब साम्यवाद की सत्ताएँ व्यवस्थाएँ, ढहकर धूल में ध्वस्त हो रही हैं और नव पूँजीवाद के उत्तर औद्यगिक समाज और उपभोक्तावादी संस्कृति ने नव इतिहासवादियों, नव मार्क्सवादियों के सामने नए प्रश्न उठा दिया हैं तब अज्ञेय का चिंतन बेहद अर्थवान और अज्ञेय की आपत्तियाँ सच सिद्ध हो रही हैं। विचारधाराओं के अंत के साथ शीत युद्ध की समाप्ति और मार्क्स का प्रेत घूम रहा है। अब स्थिति यह बनी है कि अज्ञेय भी ज्यादातर स्थापनाओं को ‘प्रतिक्रियावादी’ या ‘प्रतिगामी’ या अमरीकी पूँजीवादी’ ‘नवसमीक्षावादी’, ‘लघुमानवतासिद्धांतवादी’ भाववादी’ आदि कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है। अज्ञेय पर पुनर्विचार और नया भाव जरूरी हैं। आज अज्ञेय के व्यापक अवदान की महिमा एवं गरिमा को स्वीकार करना हिंदी आलोचना में जरूरी है ताकि नई पीढ़ी उनके अवमूल्यन से बच सके। अज्ञेय का व्यवस्थित मार्क्सवादी ध्वंस आज भी आलोचना में अतार्किक, हास्यास्पद और खिसियाए बौद्धिकपन की व्यंजना कहा जा सकता है।

आखिरकार कोई तो खास बात है कि पिछले साठ वर्षों से भी ज्यादा समय में तारसप्तक 1943, सबसे ज्यादा विवादास्पद ओर विचारोत्तेजक कविता पुस्तक प्रतिमान साबित हुई है। यह कहना गलत न होगा कि पिछली तमाम बहसों विवादों संवादों के केंद्र में तारसप्तक, रहा है और अज्ञेय की स्थापनाएँ निरंतर महत्व पाती रही हैं। ‘दूसरा सप्तक’ 1951, ने ‘तारसप्तक’ को और अधिक अर्थवान सौंदर्यवान बना दिया। वे युवा रचनाकार और जो आलोचक ‘तारसप्तक’, ‘दूसरा सप्तक’ के प्रति आपत्तिक व बुद्धि के कारण नकार का भाव रखते थे अब प्रौढ़ हो जाने पर अज्ञेय के ‘सप्तकों’ को सराहते नहीं थकते। इनमें से बहुतों को याद है कि ‘तारसप्तक’ पर छायावाद के नामी गिरामी आलोचक नंददुलारे वाजपेयी ने ‘प्रयोगवादी’ कविताएँ शीर्षक से जितना ध्वंसात्मक लेख लिखा था, जिसे अज्ञेय ने दूसरा सप्तक में तर्कविकृति का अनुपम उदाहरण माना है। लगभग दो ढाई साल बाद कवि शमशेर ने ‘तारसप्तक’ पर एक गंभीर समीक्षा लिखी और अज्ञेय को आदर से याद किया। तत्पश्चात लंबे समय तक ‘प्रयोग’ को लेकर करारी बहसें चली हैं।

प्रश्न उठता है कैसे छपा ‘तारसप्तक’? इसका उत्तर अज्ञेय ने ‘तारसप्तक’ के विन्हति और पुरान्हति में दिया। ‘तारसप्तक’ को जवाहर प्रेस, 161/1 हरिसन रोड कलकत्ता द्वारा मुद्रित और संग्रहित कवियों की ओर से ‘प्रतीक’ प्रकाशन की नई पोस्ट बाक्स-62, दिल्ली से 1943 में ढाई रुपये कीमत पर हुआ। ‘तारसप्तक’ पर अर्धेंदु दत्त द्वारा बनाया गया रेखाओं से निर्मित चित्र योजना के विषय में अज्ञेय ने कहा – ‘तारसप्तक’ में सात युवक कवियों अथवा कवि युवकों की रचना हैं। वे रचनाएँ कैसे एक जगह संगृहित हुई इसका एक इतिहास है। कविता या संग्रह के विषय में कुछ कहने से पहले उस इतिहास के विषय में जान लेना उपयोगी होगा।

दो वर्षों हुए जब दिल्ली में अखिल भारतीय लेखक सम्मेलन का आयोजन किया गया था। उस समय कुछ उत्साही बंधुओं ने विचार किया कि छोटे-छोटे फुटकर संग्रह छापने के बजाय एक संयुक्त संग्रह छापा जाय, क्योंकि छोटे-छोटे संग्रहों की पहले तो छपाई एक सामस्या होती है। फिर छपकर भी वे सहरे में एक बूँद से खो जाते हैं। इन पंक्तियों का लेखक योजना विश्वासी के नाम से पहले ही बदनाम था। अतः यह नई योजना तत्काल उसके पास पहुँची और उसने अपने नाम (बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा) के अनुसार उसे स्वीकार कर लिया। आरंभ में योजना का क्या रूप था और किन-किन कवियों की बात उस समय सोची गई थी, यह अब प्रसंग की बात नहीं रही। किंतु यह सिद्धांत रूप से मान लिया गया था कि योजना का मूल आधार सहयोग होगा अर्थात उसमें भाग लेने वाला प्रत्येक कवि पुस्तक का साक्षी होगा। चंदा काट के इतना धन उठाया जाएगा कि कागज का मूल्य चुकाया जा सके। छपाई के लिए किसी प्रेस का सहयोग माँगा जाएगा जो बिक्री की प्रतीक्षा करे या उसकी छपी हुई प्रतियाँ ले ले। अज्ञेय ने तो यह इतिहास बताया लेकिन हिंदी आलोचना में इस बात को लेकर बड़ा विवाद हुआ कि ‘तारसप्तक’ की मूल योजना किसकी थी कौन इसका प्रवर्तक? अज्ञेय ने कैसे योजना कार्य किया आदि-आदि।

अज्ञेय ने यह भी स्पष्ट किया कि दूसरा मूल सिद्धांत यह था कि संग्रहीत सभी कवि ऐसे होंगे जो कविता को प्रयोग का विषय मानते हैं – जो यह नहीं कहते कि काव्य का सत्य उन्होंने पा लिया है। केवल अन्वेषी ही अपने को मानते हैं। इस आधार पर संग्रह को व्यवहारिक रूप देने का दायित्व मेरे अंतरंग के विषय में भी कहूँ। ‘तारसप्तक’ में सात कवि संग्रहीत हैं। सातों एक दूसरे के परिचित हैं – बिना इसके इस ढंग का सहयोग कैसे होता? किंतु यह परिणाम न निकला जाय कि वे कविता के किसी एक स्कूल में कवि हैं या कि साहित्य जगत के किसी एक गुट अथवा दल के सदस्य या समर्थक हैं। बल्कि उनके तो एकत्र होने का कारण यही है कि वे किसी एक स्कूल के नहीं हैं अभी राही हैं। राहों के अन्वेषी। अज्ञेय के इस वक्तव्य को लेकर हिंदी आलोचना में ऐसा संग्राम हुआ कि उस संग्राम का हिंदी आलोचना में एक अलग इतिहास है।

अज्ञेय के द्वारा यह भी कहा गया है कि उनमें मतैक्य नहीं है। सभी महत्वपूर्ण विषयों पर उनकी राय अलग-अलग है जीवन के विषय में, समाज और धर्म और राजनीति के विषय में। काव्य-वस्तु और शैली के, छंद और तुक के कवि के दायित्वों के प्रत्येक विषय में उनका आपस में मतभेद हैं। यहाँ तक कि हमारे जगत के ऐसे सर्वमान्य और स्वयंसिद्ध मौलिक सत्यों को भी वे समान रूप से स्वीकार नहीं करते जैसे लोकतंत्र की आठ प्रमुखता, उद्योगों का सामाजीकरण, यांत्रिक युद्ध की उपयोगिता वनस्पति की बुराई अथवा काननबाला और सहगल के गानों की उत्कृष्टता इत्यादि। वे सब परस्पर एक दूसरे पर, एक दूसरे की रुचियों कृतियों और आशाओं विश्वासों पर एक दूसरे की जीवन परिपाटी पर और यहाँ तक कि एक दूसरे के कुत्तों और मित्रों पर भी हँसते हैं। यही कथन सच सिद्ध हुआ ‘तारसप्तक’ के कवियों में मत-विरोध उभरा और ‘तारसप्तक’ की सबसे अच्छी समीक्षा भी ‘तारसप्तक’ के कवियों ने ही की है। ‘तारसप्तक’ की इन समीक्षाओं में चाहे वह नेमिचंद्र जैन की हो या शमशेर द्वारा की गई समीक्षा हो उसमें हिंदी आलोचना का एक नया चेहरा, एक नया विचार, बिंब निर्मित होता दिखाई देता हैं। इस तरह यह सच भी उभरता है कि ‘तारसप्तक’ किसी एक गुट का प्रकाशन नहीं है और ‘तारसप्तक’ की योजना प्रगतिवाद की हत्या करने के लिए नहीं बनी थी। न वह किसी कला वाद, रूपवाद, सौंदर्यवाद प्रयोगवाद का हरामखोर आंदोलन था।

‘तारसप्तक’ के कवि एकत्र संगृहित, हैं इसका कारण है कि उसके प्रति एक अन्वेषी का दृष्टिकोण उन्हें समानक के सूत्र में बँधता है। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि प्रस्तुत संग्रह की सब रचनाएँ प्रयोगशीलता के नमूने हैं या कि इन कवियों की स्वरचनाएँ रूढ़ि से अधुना हैं या कि केवल यही कवि प्रयोगशील हैं बाकी सब घास छीलनेवाले। वैसा दावा यहाँ कदापि नहीं हैं। दावा केवल इतना है कि ये सातों अन्वेषी हैं। अज्ञेय ने यह भी कहा है कि ‘तारसप्तक’ की कविता वैसी जड़ाऊ कविता नहीं हैं। वह वैसी हो भी नहीं सकती। जमाना था जब तलवारें और तोपें भी जड़ाऊ होती थीं। पर अब गहने भी धातु को साँचों में ढाल कर बनाए जाते हैं और हीरे भी तप्त धातु की सिकुड़न के दबाव से बँधे हुए काव्य में से ‘तारसप्तक’ में रूप सज्जा को गौण मानकर अधिक से अधिक सामग्री देने का उद्योग किया गया है।

‘तारसप्तक’ में अज्ञेय के कवि वक्तव्य पर प्रायः कम ध्यान दिया गया है जब कि अज्ञेय की सृजनात्मक और आलोचनात्मक मानसिकता को समझने के लिए इस वक्तव्य पर ध्यान केंद्रित करना आवस्यक है उनका बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिरार और मद्रास में बीता, शिक्षा मद्रास और लाहौर में हुई किंतु वे साहित्य के साथ-साथ बमबाजी और विषैले रसायनों का अध्ययन भी करते रहे। इन विषयों का कुछ आभ्यास भी किया। फिर कुछ महीने पुलिस के साथ चोर छिपौवल करके नवंबर 1980 में मुहम्मद बक्श नाम से पकड़े जाकर एक महीना लाहौर किले में और साढ़े तीन साल दिल्ली और पंजाब की जेलों में बिताया। फिर दो मास किले में और दो वर्ष नजरबंद में। मार्क्सवाद ‘सैनिक’, विशालभारत’ में। मेरठ में साहित्य परिषद की स्थापना की। शांतिनिकेतन जाते समय दिल्ली रुक गए। आल इंडिया रेडियों में अढ़ाई वर्ष। फिर खाकी पहन कर सेना में भर्ती, कैप्टन रहे असमिया रेजीडेंट फोर्स। इसी बीच कविता, कहानी, निबंध और अंग्रेजी कविता का संग्रह। चित्रकला मूर्तिकला, फोटोग्राफी, मनोविश्लेषण और डाक्टरी की शगल और नदी-तालों की यायावरी, अकेले रहने और चिंतन करने का अभ्यास बढ़ा। सभी ने मिलकर रचनाकार आलोचक अज्ञेय की मानसिकता का निर्माण किया।

अज्ञेय के आलोचक ने गंभीर विवादास्पद भूमिकाएँ लिखी लेकिन हमेशा माना कि कविता ही कवि का परम कर्तव्य है, इसके बाहर जो गद्य में कहा जाता है वह कविता की पराजय है। मानव जीवन के विकास के साथ जटिलता बढ़ी है इसलिए आत्मस्पष्टीकरण वांछनीय हो गए हैं। यह भी माना कि कवि का कथ्य उसकी आत्मा का सत्य है – वह सत्य कवि बाध्य न होकर व्यापक सत्य है और जितना व्यापक है उतना ही काव्योत्कर्षकारी। जीवन की बढ़ती जटिलता ने जीवन की व्यापकता को सीमित कर दिया है। आज कवि और पाठक दोनों बदल गए हैं और दोनों पर समकालीनता का दबाव बढ़ा है – यह आज के कवि की सबसे बड़ी समस्या हैं। ये समस्याएँ अनेक हैं – काव्य विषय की, सामाजिक उत्तरदायित्व की, संवेदना के पुनः संस्कार की, आदि। किंतु इन सबका स्थान उसके पीछे है क्योंकि वह कवि कर्म की ही मौलिक समस्या है साधारणीकरण और कम्यूनिकेशन की समस्या है और कवि को प्रयोगशीलता की ओर प्रेरित करनेवाली सबसे बड़ी शक्ति यही है। कवि अनुभव करता है कि भाषा का पुराना व्यापकत्व उसमें नहीं है – शब्दों के साधारण अर्थ से बड़ा अर्थ हम उसमें भरना चाहते हैं पर उस बड़े अर्थ को पाठक के मन में उतार देने के साधन अपर्याप्त हैं। वह या तो अर्थ एक पाता है या भिन्न पाता है।

अज्ञेय के मन में प्रयोगशीलता के प्रति अपार निष्ठा रही है। इसी लिए कहा है ‘प्रयोग सभी कालों के कवियों ने किए है, यद्यपि किसी एक काल में किसी विशेष दिशा में प्रयोग करने की प्रवृत्ति होना स्वाभाभिक ही है। किंतु कवि क्रमशः यह अनुभव करता है कि जिस क्षेत्रों में प्रयोग हुए हैं उनसे आगे बढ़कर अब उन क्षेत्रों का अन्वेषण करना चाहिए जिन्हें अभी नहीं हुआ गया या जिनको अभेद्य मान लिया गया है। भाषा को अपर्याप्त पाकर विराम संकेतों से, अंकों और सीधी तिरछी लकीरों से छोटे-बड़े टाइप से, सीधे या उल्टे अक्षरों से लोगों और स्थानों के नामों से, अधूरे वाक्यों से – सभी प्रकार इतर साधनों से कवि उद्योग करते लगा कि अपनी उलझी हुई संवेदना की सृष्टि को पाठकों तक अक्षुण्ण पहुँचा सके। प्रश्न उठता है कि क्या इस कार्य में उसे सफलता मिल सकी? अज्ञेय का उत्तर है ‘पूरी सफलता उसे नहीं मिली जहाँ वह पाठक के विचार संयोजन सूत्रों को नहीं छू सका वहीं उसे पागल, प्रलापी समझा गया या अर्थ का अनर्थ पा लिया गया। बहुत से लोग इस बात को भूल गए कि कवि आधुनिक जीवन की एक बहुत बड़ा समस्या का सामना कर रहा है। भाषा की क्रमशः संकुचित होती हुई सार्थकता की केंचुल फाड़कर उसमें नया, अधिक व्यापक, अधिक सारगर्भित अर्थ भरना चाहता है और अहंकार के कारण नहीं इसलिए कि उसके भीतर इसकी गहरी माँग स्पंदित है – इसलिए वह व्यक्ति सत्य के व्यापक सत्य बनाने का उत्तरदायित्व अब भी निबाहना चाहता है पर देखता है कि साधारणीकरण की पुरानी प्रणालियाँ, जीवन के ज्वालामुखी से बहकर आते हुए लावा से भरकर और जमकर रुद्ध हो गई हैं – प्राण संचार का मार्ग उनमें नहीं है।

प्राण संचार का मार्ग कैसे पैदा होगा? कौन करेगा? कवि करेगा यह कार्य कि जो व्यक्ति का अनुभूत है उसे समष्टि तक कैसे उसकी संपूर्णता में पहुँचाया जाय यही पहली समस्या है जो प्रयोगशीलता को ललकारती है। उसके बाद इतर समस्याएँ हैं कि वह अनुभूत ही कितना बड़ा या छोटा है। फिर अपने को भीतर तक टटोलते हुए कहा, मैं स्वांतःसुखाय सुरबाध नहीं लिखता कोई भी कवि केवल मात्र स्वांतःसुखाय लिखता है यह स्वीकार करने में मैंने अपने को सदा असमर्थ पाया है। तुलसीदास स्वांतःसुखाय लिखने की बात कहते हैं लेकिन उनके स्वांतःसुखाय का अर्थ बहुजन हिताय शिवेतरक्षतये है। उनकी आत्माभिव्यक्ति में लोकाभिव्यक्ति है। हर कोने से व्यक्तिवाद का निषेध है और सुर सरि सम सब का हित हो का लोक है। स्वयं अज्ञेय कहते हैं अपनी अभिव्यक्ति पर किस पर अभिव्यक्ति? इसीलिए अभिव्यक्ति में एक ग्राहक या पाठक या श्रोता मैं अनिवार्य मानता हूँ और इसे पाठक भरसक जो दायित्व लेखक का या कवि या कलाकार पर आता है उससे कोई विस्तार मुझे नहीं दीखा। अभिव्यक्ति भी सामाजिक या असामाजिक कृतियों को ही हो सकती है और आलोचक उनका मूल्यांकन करते समय ये सब बातें सोच सकता है किंतु वे बाद की बातें हैं। प्रयोगशीलता का महत्व भाषा में दिया है – ‘जीवन की जटिलता को अभिव्यक्त करनेवाले कवि की भाषा का किसी हद तक गूढ़, अलौकिक अथवा दीक्षा द्वारा गम्य (Esoteric) हो जाना अनिवार्य है किंतु वह उसकी शक्ति नहीं, विवशता धर्म नहीं अवधार्य हैं।

अज्ञेय ने मनोविश्लेषण शास्त्र का गहरा अध्ययन चिंतन किया है और मनोविश्लेषणवादी आलोचना के बीज उनमें मौजूद हैं। फ्रायड, युंग, एडलर के चिंतन से प्रभावित होकर कहा है कि आधुनिक युग का साधारण व्यक्ति यौन वर्जनाओं का पुंज है। उसके जीवन का एक पक्ष है उसकी सामाजिक रूढ़ि की लंबी परंपरा जो परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ साथ विकसित नहीं हुई और दूसरा पक्ष है स्थिति परिवर्तन की असाधारण तीव्रगति जिसके साथ रूढ़ि विकास असंभव है। इस विषय का परिणाम है कि आज के मानव का मन यौन परिकल्पनाओं से लदा हुआ है और वे परिकल्पनाएँ सब दमित और कुंठित है। उसकी सौंदर्य चेतना भी इससे आक्रांत है। उसके उपमान सब यौन प्रतीकार्थ रखते हैं। इस तरह प्रतीक हमारे आदिम अवचेतन के देवता है जो व्यंजनाओं में बोलते हैं और मुखौटे लगाकर बोलते हैं।

मानव ही प्रतीकों का सृष्टा है और प्रतीक सर्वाधिक सर्जनात्मक संकेतात्मक बहुवचनात्मक भाषा हैं। प्रतीक द्वारा कभी कभी वास्तविक अभिप्राय अनावृत्त हो जाता है तब वह उस स्पष्ट इंगित से घबराकर भागता है जैसे बिजली के प्रकाश में व्यक्ति चौंक जाए (डी.एच.लारेंस) एक कविता के प्रेम प्रसंग में एकाएक बिजली चमकने पर पुरुष अपना प्रेमालाप छोड़कर छिटककार अलग हो जाता है। बिजली ने उस व्यापार को उधाड़ दिया है। और उस आंतरिक संघर्ष के ऊपर जैसे काठी कस कर एक बाह्य संघर्ष भी बैठा है व्यक्ति का व्यक्ति से नहीं। व्यक्ति समूह का कवि और श्रेणियों का संघर्ष है। व्यक्तिगत चेतना के ऊपर वर्गगत चेतना भी लदी हुई है और उचितानुचित का अनुशासन करती है जिस के एक दूसरे प्रकार की वर्जनाओं का पुंज खड़ा होता है और उनके साथ ही उनके प्रति विद्रोह का स्वर जागता है।

कविता के सामने आधुनिक जीवन की जटिलताओं की अनेक समस्याएँ हैं – एक मार्ग यौन स्वप्न सृष्टि का दिवास्वप्नों का है उसे वह अपनाना नहीं चाहता। फिर वह क्या करे? यथार्थ दर्शन केवल कुंठा उत्पन्न करता है। वास्तव की वीभत्सता की कसौटी पर चाँदनी रोटी दीखती है। कवि अपनी काव्य परंपरा का मूल्यांकन करता है और चारणकाल से लेकर छायावाद काल तक की कविता को तात्कालिक परिस्थिति अथवा जीवन प्रणाली पर घटित करके समझ लेता है, किंतु फिर भी आज के जीवन दबाव की अभिव्यंजना का मार्ग उसे नहीं दीखता। क्योंकि आज उनकी अनुभूतियाँ तीव्रतर है तो वर्जनाएँ भी कठोरतर है। परिणाम है व्यंजना भीरुक्षेत्र का विस्फोट, जो अश्लील, इसलिए है कि भावनाओं और वर्जनाओं के संघर्ष को सहसा सामने ले आता है। और प्रेम? एक थका माँदा पक्षी है जो साँझ घिरती देख आशंका से भी घिरता है और साहस संचित करके लड़ता भी जा रहा है। निराशा और कुंठा से धैर्यपूर्वक लड़ता हुआ किंतु विश्वास की निष्कंप अवस्था से कुछ नीचे आज के प्रेम का सर्वोत्तम रूप यही है। लेकिन मूल मंतव्य यह कि आज हमें कवि पर नहीं, कविता पर भरोसा करना चाहिए।

‘तारसप्तक’ का पुनमुद्रण एक इतिहास का निर्माण… फिर संपादक की धारणा है कि ‘तारसप्तक’ ने अपने प्रकाशन का औचित्य प्रमाणित कर दिया। उसका पुनमुद्रण एक ऐतिहासिक दस्तावेज के केवल उपलब्ध बनाने के लिए, बल्कि इस लिए भी संगत है कि परवर्ती काव्य प्रगति को समझने के लिए इसका पढ़ना आवश्यक है। इन सात कवियों का एकत्रित होना अगर केवल संयोग भी था तो भी वह ऐतिहासिक संयोग हुआ जिसका प्रभाव परवर्ती काव्य विकास में दूर तक व्याप्त है। यह भी संयोग है कि योजना के इतिहास को लेकर ‘तारसप्तक’ के कवियों ने ही बहस विवाद को जीवंत रखा। इस पूरे इतिहास पर निगाह डालते हुए अज्ञेय ने कहा ‘जो 1943 के प्रयोगी थे वे सन् 1963 के संदर्भ हो गए। साथ ही तब की संभावनाएँ अब की उपलब्धियों में परिणत हो गई हैं। यह भी अनुभव किया गया कि ‘तारसप्तक’ ने जिन विविध नई प्रवृत्तियों को संकेतित किया था उनमें एक यह भी रही कि कवि का पूरा संबंध सदा के लिए बदल गया था। ये सभी कवि अपने समय को नए ढंग से बाँध रहे थे और उनके लिए समानधर्मा का अर्थ था मानवधर्मा – कविधर्मा – आधुनिक-धर्मा।

रचनात्मक कार्य आगे बढ़ सकता है। जो कहता है मैंने जीवन भर कोई प्रयोग नहीं किया वह वास्तव में, यही कहता है कि मैंने जीवन भर यह कोई रचनात्मक कार्य करना भी नहीं चाहा है। ऐसे व्यक्ति की कविता कविता नहीं है। उसमें कला, शिल्प और रचनात्मकता नहीं है। प्रयोग का महत्व तभी है जब वह गोताखोरों की तरह मोती लाता है। इस दृष्टि से प्रयोग का वाद बेमानी है। इस तरह अज्ञेय ने निरंतर विचारमग्न होकर कहा कि प्रयोग का कोई वाद नहीं है। तीसरा सप्तक भी यही ध्वनित करता आया। प्रयोग से जुड़ी नई कविता शिल्प या रूपवाद नही हैं उसमें जीवन संवेदना की गहराई ओर गरमाहट है। प्रयोगवाद पर अड़े रहे लेकिन प्रयोगवाद के आगे का काल नई कविता का काल कहलाया है इस नई कविता में प्रयोगवादी प्रगतिवादी दोनों प्र संवाद के साथ समा गए।

अज्ञेय ने भारतीय शब्द परंपरा के चिंतन का ‘तीसरासप्तक’ की भूमिका में विस्तार किया और राहों के अन्वेषी की बात पर पुनः जोर दिया। प्रत्येक शब्द का प्रत्येक समर्थ उपयोक्ता उसे नया संस्कार देता है। इसी के द्वारा पुराना शब्द नया होता है। यही उसका कल्प है। इसी प्रकार शब्द वैयक्तिक प्रयोग भी होता है और प्रेषणा का माध्यम भी बना रहता है। दुरूह भी होता है और बोधगम्य भी, पुराना परिचित भी रहता है और स्फूर्तिप्रद अप्रत्याशित भी। नए कवि ने शब्द की लीक नहीं पीटी उसे नया अर्थ सौंदर्य दिया है। इस दृष्टि से नई कविता भावबोध है नई भावादर्श और नई मनोभूमिका भावस्फोट, नई मनःस्थिति का प्रकाश अज्ञेय ने ‘नई कविता’ शीर्षक निबंध में अपनी कविता ‘बगई पिछली हवाएँ चैत की’ का उदाहरण देकर कहा कि इस कविता पर अज्ञेय का नाम लिखा है तो यह प्रतिक्रियावादी कविता है अगर इस पर शमशेर, नागार्जुन का नाम लिखा है तो प्रगतिवादी कविता। हिंदी आलोचना दुर्भग्यवश नामों की दलबंदी में फँसकर कृतियों की समीक्षा से भटक गई है।

कविता में शब्द अपने में न संपूर्ण होता है न आत्यांतिक स्वयंभूत अर्थ भी नहीं होता। शब्द तो पात्र है जिसमें कवि अर्थ भरता है संदर्भ उसे अर्थ देता है लेकिन जो लकीर के फकीर हैं उन्हें शब्द का नया प्रयोग नहीं सुहाता। वे पुराने अर्थ देवता को अंर्तध्वनि होते नहीं देख सकते। शब्द प्रयोक्ता के साथ पाठक की समीक्षा संप्रेषक करते भी है। यह भी संभव है विषय पुराना रहे पर वस्तु नई रहे। पर विषय नए हो सकते हैं मौलिक नहीं। मौलिकता वस्तु से संबंध रखती है। विषय संप्रेक्त नहीं है। मौलिकता की कसौटी का यही क्षेत्र है और यही कवि की शक्ति अथवा प्रतिभा का क्षेत्र है। क्योंकि यह कवि मानस की पहुँच का क्षेत्र हैं। यहाँ स्वीकार किया जाय कि नए कवियों में ऐसे की संख्या कम नहीं है जिन्होंने विषय को वस्तु समझने की भूल की है और इस कारण स्वयं भी पथभ्रष्ट हुए है और पाठकों में नई कविता के बारे में अनेक भ्रांतियों के कारण बने हैं।

आलोचक अज्ञेय ने हमेशा नव लेखकों से सावधान किया है क्योंकि वे माल की असलियत के बारे में धोखा देते हैं। आलोचक का काम है कि वह असली की शकल बिगड़ने न दे और नकली के प्रति सावधान करे। हमारे यहाँ नकली कवियों से ज्यादा नकली आलोचक हैं – उनका धातु भी खोटा है और कसौटियाँ भी खोटी हैं। कसौटी पर वे आज भारतेंदु और मैथिलीशरण गुप्त को ‘हिंदू’ कवि कहकर नीचा दिखाना चाहते हैं। अज्ञेय ने द्विवेदी युग, छायावादी युग में नकलचियों की बात उठाकर रखी। प्रगतिवाद ने कम नकलची पैदा नहीं किए। हमें किसी भी वर्ग में उनका समर्थन या पक्ष पोषण नहीं करना है। पर यह चिंता भी करनी है कि उनके पक्षपात के कारण मूल्यवान की उपेक्षा न हो। प्रगतिवाद की खोटी कसौटी के कारण माखन लाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सुभद्रा कुमारी चौहान, हरिवंशराय बच्चन, रामधारी सिंह दिनकर, नरेंद्र शर्मा आदि तमाम मूल्यवान कवि निरादर के शिकार हुए। जिनके मूल्यांकन की और ‘लघु या पक्के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ निबंध में विजयदेव नारायण शाही ने ध्यान दिलाया है कि असली को नकली से न नापा जाय। प्राचीन समय से रचना कर्म में साधना का महत्व रहा है अज्ञेय ने इस साधना परंपरा पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा है कि साधना अभ्यास और मार्जन का ही दूसरा नाम था। बड़ा कवि वाक् सिद्ध होता था और भी बड़ा कवि रससिद्ध होता था। आज वाक् शिल्पी कहलाता अधिक गौरव की बात समझा जा सकता है। आज तो शिल्पी एक गाली है और एक नया वर्ग नई काव्य प्रवृत्ति के आंदोलन को रूपवाद फार्मलिज्म का आंदोलन कहकर उड़ा देना चाहते है जबकि नई प्रकृति का यह आंदोलन वस्तु और रूप की अभिन्नता का आंदोलन हैं जिसमें कविता बुद्धि की मुक्तावस्था की ओर उन्मुख है।

प्रयोगवादी नई कविता पर यह आरोप निराधार है कि वह काव्य में सामाजिक चेतना है और कहीं नहीं। (तीसरा सप्तक भूमिका); यह मानने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि प्रगतिवाद सबसे अधिक समाजाग्रही रहा है, पर केवल इसी से यह नहीं प्रमाणित हो जाता है कि उस वाद के कवियों में गहरी सामाजिक चेतना है या कि जैसी है वही उसका स्वस्थ रूप है उसकी पड़ताल प्रत्येक कवि में अलग करनी होगी। ‘तारसप्तक’ के सभी कवियों की सामाजिक राजनीतिक, साहित्यिक मान्यताएँ अलग-अलग हैं। कुछ कवि सप्तकों में आमंत्रित होस्ट भी रह गए। उन्होंने स्वयं इसमें अपना नाम नहीं चाहा। इसलिए कि दूसरे कवियों का साथ उन्हें पसंद नहीं था। अज्ञेय ने अनथक भाव से ‘चौथा सप्तक’ निकाला तो बड़ी चिकचिक हुई। अज्ञेय ने एक साक्षात्कार में कहा कि ‘चौथा सप्तक’ निकाल कर कोई अपराध नहीं किया है। ‘तीसरा सप्तक’ संपादक के काव्य विवेक और काव्य दृष्टि का प्रतिफलन था तो ‘चौथा सप्तक’ घोषित तौर पर एक संपादक की काव्य दृष्टि। साहित्यिक रुचि और साहित्य विवेक का प्रतिफलन है। लेकिन यह सच है कि ‘चौथा सप्तक’ को लेकर अज्ञेय पर विवाद बढ़ा और यह सप्तक किनारे कर दिया गया। इसे लेकर मताग्रही आलोचना ने अज्ञेय पर घेरा डाला और अनाप-शनाप कहा। लेकिन अज्ञेय ने कहा कि ‘चौथा सप्तक’ या समकालीन कविता के बीज छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, तीनों में ही थे। आज की कविता उन्हीं बीजों का नया विचार-वृक्ष है। परिस्थितियाँ आज ऐसी हैं कि आज की कविता में बोलता बहुत है उसमें वक्तव्य बाजी भी बढ़ी है। आज की कविता पर ‘मैं’ छा गया है। वह अन्य को कम सुनता है। अज्ञेय ने यह भी कहा कि आज की कविता में मुखौटा या छल का खेल बढ़ गया है। वैसे सृजन में मुखौटा केवल धोखा देने के लिए बल्कि सच्चाई को प्रस्तुत करने के लिए भी लगाए जाते हैं। (चौथा सप्तक – भूमिका), साधारण जीवन में मुखौटा बुरा चीज है लेकिन नाटक अथवा काव्य में यथार्थ को प्रस्तुत करने का ढंग है हुनर है। अज्ञेय का आलोचक समकालीन कविता को लेकर कितना चौकन्ना था यह बात उनके इस कथन से सामने आती है आज की कविता का बहुत बड़ा और शायद सबसे बड़ा दोष यह है कि उस पर एक ‘मैं’ छा गया है – वह भी एक आरक्षित और अविसर्जित मैं। आज की कविता बहुत बोलती है। जब कि कविता का काम बोलना है ही नहीं। इधर कवियों में राजनीतिक पक्षधरता बढ़ी है जबकि राजनीतिक पक्षधरता को कसौटी नहीं बनाया जा सकता।

अज्ञेय का ध्यान आपातकाल पर न गया हो ऐसी बात नहीं है – राजनीतिक पक्षधरता का स्थान राजनीतिक असहिष्णुता लेने लगी तो उन्होंने अनुभव किया आपातकाल ने एक लगभग देशव्यापी आतंक की सृष्टि की तो उस की परिधि के भीतर विभिन्न प्रकार की असहिष्णुताएँ, आतंक के छोटे-छोटे मंडल बनाती रहीं। आपातकाल की समाप्ति से आतंक का तो अंत हो गया लेकिन मतवादी असहिष्णुताओं के ये वृत्त अभी कायम हैं। इधर के कवियों ने स्वायत्वता और स्वातंत्र्यबोध का अनुभव कई तरह से किया है। इसी दौर में अज्ञेय ने पश्चिमाभिमुख आधुनिकता या औपनिवेशिक आधुनिकता को सजा कर बहस का जोरदार अभियान चलाया हालाँकि यह अभियान चला तो ‘तारसप्तक’ से था लेकिन बाद के सप्तकों में गांधी, फ्रायड, मार्क्स, लोहिया, जयप्रकाश नारायण आदि प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष झाँकने लगे। सभी ने अपनी सहमति और मतभेद का दौर अपनी शर्तों पर जिया। पता नहीं क्यों अज्ञेय ने भारतीय स्वाधीनता के आंदोलन पर चुप्पी नहीं तोड़ी जबकि एक समय में नेहरू अभिनंदन नेहरू जी को भेंट किया और भारतीय आधुनिकता, भारतीयता को अपने ढंग से परिभाषित भी किया। तंत्र का तानाशाह हो भी अज्ञेय को मथता है और वे चिंतन के तनाव में राजनीतिक अवमूल्यन से कष्टमय दिखाई देते हैं उस पर व्यंग्य कविताएँ लिखते हैं ‘शाबाश’। मेरे देश के रौशनजमीर नेताओं। तुम्हारी मर्जादा वह हाथी का पैर है। जिस में सीता समा गई थी। यहाँ ध्यान देने की बात है कि अज्ञेय की आलोचना चाहे वह ‘सप्तकों’ से आई हो ‘त्रिशंकु’ जैसे निबंध संग्रहों से आई हो या ‘भवंती-अंतरा-शाश्वती’ शेषा जैसी अंतःप्रक्रियाओं से आई हो या उनके द्वारा निकाले जानेवाली पत्र-पत्रिकाओं, अनगिनत निबंधों, यात्रावृत्तों व्याख्यानों से आई हो वह आलोचना बुनियादी तौर पर सभी संवादों, वाद-विवादों का उद्गम-स्रोत है। हिंदी आलोचना की इस बहसों में अज्ञेय के साथ रघुवीर सहाय, मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, गिरिजाकुमार माथुर, शमशेर, रामविलास शर्मा, प्रभाकर माचवे जौसे धाकड़ व्यक्तित्व हिस्सेदार रहे हो। लेकिन हिंदी आलोचना में नई बहसों की परंपरा के प्रवर्तन का श्रेय अज्ञेय को ही जाता है। उन्होंने काल चिंतन की नई शुरुआत के साथ स्मृति पर आनेवाले संकट के प्रति हमारी पीढ़ी को जागृत किया। ‘स्मृति के परिदृश्य’ शीर्षक दो व्याख्यानों में स्मृति का देश, स्मृति का काल पर जिस गहराई चिंतन किया है, वह हमारी सर्जनात्मक आलोचना की उपलब्धि है। जिसे हिंदी में आज हम आधुनिक संवेदना से संपन्न बौद्धिक मुक्तावस्था की सर्जनात्मक आलोचना कहते हैं उसकी शुरुआत अज्ञेय से ही हुई। पंत, प्रसाद, निराला, महादेवी के सामने पुराने रीतिवाद से जूझने की समस्या रही और उससे जूझकर इन रचनाकार आलोचकों ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल और प्रेमचंद की दिशा में चलकर हिंदी में नवजागरणवादी काव्यशास्त्र के आधार को पौन-पुष्ट किया। उस आधार की मदद से अवधारणात्मक चिंतन का एक नया युग हिंदी आलोचना में अज्ञेय ही लाए। उन्होंने रोलाबार्थ की तरह न जाने कितनी नई बहसों को हमारी आलोचना में जन्म दिया। कठिन बौद्धिक, अवधारणाओं को टी.एस. एलियट – चाहे वह निर्वैयक्तिकता का सिद्धांत हो या भागनेवाले और रचनेवाले प्राणी के दूरी वाला सिद्धांत या आब्जेक्टिव कोरिलेटिव या परंपरा – वैयक्तिक प्रतिभा से जुड़ा चिंतन हो, अज्ञेय ने उनका भारतीय संदर्भों में सुलझा भाव प्रस्तुत किया। हिंदी में नई आलोचना संस्कृति को लाने में उनके द्वारा यह बहुत बड़ा काम हुआ। ‘त्रिशंकु’ 1945, के तमाम निबंधों में परिचय की विश्व दृष्टियों के बढ़ते आतंक से अज्ञेय ने हिंदी आलोचना को आतंकमुक्त किया।

अज्ञेय ने भाषा-अस्मिता और अस्तित्व का प्रश्न उठाकर बार-बार ध्यान दिलाया कि भाषा ही स्मृति है, इतिहास है, तो वह भाषा में ही मौजूद रहता है। मैं सच लिखता हूँ। लिख-लिख कर सब झूठा करता जाता हूँ। कहनेवाले कवि अज्ञेय का गहरा मंतव्य है यह समझ है कि साहित्य सत्य नहीं है गल्प है। गल्प में धार होती है इसलिए रूढ़िवादी व्यवस्थाएँ साहित्य से भयभीत रहती हैं। कविता का सच है सत्ता पर निरंतर संदेह। राष्ट्रवाद, समाजवाद, साम्राज्यवाद, औपनिवेशवाद के नाम पर बीसवीं शताब्दी में जो भयानक दमन-चक्र चला उसकी पोल किसने खोली – साहित्य ने। साहित्य ने केंद्रीयता को तोड़ा और बहुलतावाद की ओर बढ़ता ही रहा। एक ऐसा समाज जब शब्द और सत्ता पर निरंतर हमला हो रहा था – अज्ञेय ने उसकी पवित्र गरिमा के लिए संघर्ष किया और पाठक में पैदा किया पावनता जनित विवेक। शब्द को बचाना न रूपवादी होना है न ‘न्यू क्रिटिसिज्म’ का पिछलग्गू। इसलिए हिंदी आलोचना में अज्ञेय को कलावादी-फ्रायडवादी कहना पूरा गलत पाठ पढ़ना है।

अपने मूल भारतीय स्रोतों में गहरे धँसकर अज्ञेय ने कहा कविता भाषा में नहीं होती। वह शब्दों में भी नहीं होती, कविता शब्दों के बीच की नीरवताओं में होती है। जब की स्वयं अज्ञेय अपनी कविताओं में अनकहा बहुत कम छोड़ते है। मितकथनों में व्यंजनाओं को उछालते हैं, नाद सौंदर्य से अर्थ प्रभाव बढ़ाते है और काल का डमरू नाद सुनते हैं। अज्ञेय और समकालीन आलोचना को अहसास है कि ‘तारसप्तक’ के 1943 में प्रकाशन के बाद हिंदी आलोचना में बहुत कुछ ऐसा नया आधुनिक, नया, परिवेशजन्य, संस्कृति-संवेदना से परिपूर्ण और प्रयोगशील इतिहास भूगोल का नक्शा बनता गया। अज्ञेय की आलोचना दृष्टि ने रचना का महत्व, रचना-प्रक्रिया, रचना-प्रेरणा और प्रभाव रचना-भाषा-शिल्प-बिंब-प्रतीक, मिथक, छंद-लय, सामाजिकता और वाचिक परंपरा के अनेक विषय आलोचना में स्थापित किए। प्रयोगवादी और नई कविता में यह भूमिका अनायास टी.एस. एलियट, डी.एच. लारेंस, एफ.आर. लीविस की याद दिलाती है, जिनका साहित्य चिंतन सहकार के रूप में आया। यह कहना आवश्यक है कि शुक्लोत्तर हिंदी आलोचना और आलोचना शास्त्र के विकास में अज्ञेय भी भूमिकाएँ – ‘रूपांबरा’ की भूमिका ‘पुष्करिणी’ की भूमिका, ‘सप्तकों की भूमिकाएँ’, ‘सर्जना के क्षण’ की भूमिका नए रूपों-बोधों को रेखांकित करती है। आज भी शुक्लोतर आलोचना में इन भूमिकाओं का महत्व कम नहीं हुआ है। अज्ञेय की भूमिकाएँ, आलोचना का विजय मंच बनी है और पुराना शंभु धनुष इनसे टूटा हैं।

अज्ञेय ने लगातार समकालीन कृतित्व का पर्यवेक्षण किया और पूर्ववर्ती साहित्य के संदर्भ में रखकर उसका भाव्य या डिस्कोर्स किया। इस भाव्य-विमर्श के आधार पर समकालीन रचना कर्म के लिए परंपरा के मूल्य, आधुनिकता की दृष्टि पर विचार किया और यह प्रयत्न भी समकालीन जटिल संवेदना के लिए पूरे साहित्य का क्या महत्व है। विश्व साहित्य में अज्ञेय जैसे बहुत कम रचनाकार, आलोचक होंगे जिन्होंने निरंतर साहित्य संवेदना और साहित्यिक परंपरा का इतने मनोयोग से अध्ययन-मूल्यांकन किया है। अज्ञेय का चिंतन अपनी रचना यात्रा की वकालत भर नहीं रहा उसने स्वतंत्र चिंतन यात्रा का पथ प्रशस्थ किया। साथ ही वे अपनी अवधारणाओं को निरंतर संशोधित करते रहे। ‘संर्जना और संदर्भ’ आत्मपरक, केंद्र और परिधि, तथा स्मृतिच्छंदा के सैकड़ों निबंधों ने एक नए चिंतन क्षेत्र का विकास किया है और हिंदी आलोचना को पश्चिम का उपनिवेश नहीं बनने दिया। उन्होंने आधुनिकतावाद अस्तित्ववाद, नव्य समीक्षा पर बहस करते हुए संप्रेषण के सैद्धांतिक महत्व की पहचान कराई। पश्चिम और पूर्व की चिंतन परंपराओं की तुलना और महत्व से कृति केंद्रित आलोचना के द्वीपता स्वीकार की और कृति के ‘इंटरप्रटेशन’ मूल्य निर्णय नए आयाम जोड़े है।

हिंदी आलोचना में अज्ञेय ने यह प्रश्न बहुत भरे हृदय से उठाया कि हमने निराला को मुक्त-छंद प्रवर्तन का श्रेय तो दे दिया लेकिन उनके प्रयोगों से सीखा नहीं। हमने वह विचार नहीं किया कि मुक्त छंद में मुक्ति क्या है, क्यों है और कहाँ तक हैं। संदेह होता है कि इसकी समुचित समझ बहुत कम की अवधि में विकसित हुई। छंद के अभ्यास की प्रथा तो उठ ही गई बहुत बुरा हुआ। लेकिन छंद तो बोध अभ्यास से अलग चीज है। मात्राएँ और वर्ण गिनना और तुकें जोड़ कंठस्थ रखना अभ्यास का वह अंग था जिससे छूट पाने से विशेष अहित नहीं हुआ। किंतु श्रुति भी एक दीक्षा थी जो पुरानी स्थितियों में छंद के अभ्यास के साथ-साथ मिल जाती थी। यह पक्ष उपेक्षा के कारण अब लगभग चला गया है। श्रुति संवेदन के प्रति यह उपेक्षा और भी दारुण इसिलिए हो गई कि काव्यालोचन राजनीति के कारण के कारण ऐसे सब विचारों को ‘रूपवाद’ कहकर उपहास का विषय बनाया गया। इसी तरह ‘बोलचाल की भाषा के निकट आने के आग्रह को भी गलत समझा गया और उसका अर्थ यही लगाया गया गद्य और पद्य की लय में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। आज तो बहुत से कवि यशःप्रार्थी ऐसे भी हैं जो यह भी नहीं बता सकेंगे कि लय कहते किसे है। वे प्रायः यही मानते पाएँ जाएँगे कि एक तो गीत होता है जिसमें छंद, तुक, ताल, लय सब कुछ का विचार होता है और जो इसलिए एक घटिया काव्यरूप है और दूसरे आधुनिक कविता होती है जो मुक्त छंद में होती है अर्थात उन में इन सब चीजों में से किसी का विचार नहीं होता और यति का निर्णय भी। बिलकुल स्वै रहस्यों में किया जाता है। एक से बहुत से कवि निराला और मुक्तिबोध की दुहाई भी देते – उन्हीं की परंपरा नहीं, उनकी परंपरा में होने का नहीं, बल्कि उनकी विरासत में होने का दावा भी करेंगे। (कवि दृष्टि – पृ. 16) उन्हें पता नहीं है कि लयों का वैविध्य निराला में है मुक्तिबोध में नहीं। मुक्तिबोध को छंद-लय काकपरक है। निराला छंद और संगीत के उस्ताद हैं। अज्ञेय ध्यान दिलाते हैं कि मुक्त छंद अनुशासन रहित पदरचना नहीं है वह छंद से मुक्त नहीं है बल्कि मुक्तयुक्त छंद है।

अज्ञेय कथाकार, यात्रा-संस्मरणकार, नाटककार, पत्रकार, संपादक अनेक भूमिकाओं में उतरे लेकिन कहा हमेशा यही मैं कवि ही रहूँगा उपन्यासकार नहीं बनूँगा। उनकी धारणाएँ ‘त्रिशंकु’ से लेकर ‘स्मृति के गलियारे’ तक की पचास साल की विचार यात्रा में फैली हैं। कवि को वे ‘हविष्यवादी अग्निपुरुष’ कहते हैं और रचना को यंत्रणा-भरी तनाव की प्रक्रिया। अज्ञेय में जो ‘अर्थ-गर्भ मौन का अनुभूति की अद्वितीयता’ का ईमानदारी का जो मंथन चलता है वह फूट फूट कर कह उठता है। चिंतन प्रसाद ने अधिक किया है काव्य निराला का श्रेष्ठ है। कभी कभार उनका चिंतक ‘सागर में गागर’ भरकर कहता है प्रसाद पढ़ाए जाएँगे, निराला पढ़े जाएँगे, पंत से सीखा जाएगा। रचना और आलोचना को सांस्कृतिक प्रक्रिया मानने के कारण अज्ञेय का सर्वाधिक झुकाव लगन प्रसाद के प्रति है। विजयदेव नारायण साही ने लघुमानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस शीर्षक प्रसिद्ध निबंध में लंबी बहस के बाद यह निष्कर्ष निकालते है कि लेकिन यह परंपरा हमेशा परिवर्तन और औचित्य की दिशाओं में फूटती हुर्ह चलती है तो अज्ञेय आगे के इतिहासकार को प्रसाद को ही परंपरा में दिखाई पड़ेंगे।

दरअसल अज्ञेय की आलोचना दृष्टि अपने समय की रचनाशीलता और रचनात्मक संवेदना से गहरी संपृक्ति के कारण अपने युग के तीखे प्रश्नों से टकराती है चाहे वे प्रश्न आधुनिकतावाद ने उठाए है या मार्क्सवाद, फ्रायडवाद ने उठाए हो या नव्य समीक्षा ने, अस्तित्ववाद ने उठाए हो या औपनिवेशिक आधुनिकता के दबावों ने उठाए हो अज्ञेय उनसे बौद्धिक संवाद करते हैं। पश्चिमवाद को भीतर-बाहर से पढ़ने समझने पर भी अज्ञेय उस चिंतन से आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तरह आतंक मुक्त रहते हैं। उनकी आलोचना का पूरा आंतरिक पाठ भारतीय साहित्यालोचन भी गहन गंभीर परंपरा से मुकम्मल होता है। इसलिए अज्ञेय की आलोचना आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परंपरा का विकास है – पुनर्नवा का विमर्श है। और हिंदी में एक मौलिक समीक्षा शास्त्र की आधार-शिला को दृढ़ करने वाली संकल्पबद्ध तैयारी है। इसके भीतर भारतीय आलोचना का पूरा चरित्र शास्त्रों और विधाओं को मथते हुए सर्जनात्मक आलोचना का है। इसलिए जो लोग अज्ञेय को पश्चिम का नकलची, व्यक्तिस्वातंत्र्यवाद का पूँजीवादी प्रचारक, रूपवादी कलावादी कहकर बदनाम करते रहे हैं उन्हें पुनर्विचार की जरूरत है। उन्हें ‘इतिहास और स्वतंत्र्यबोध’, ‘निरंतरता और स्वतंत्रता’, ‘स्वाधीन कर्तृत्व का ऊर्जास्रोत’, ‘मेरी स्वाधीनता सबकी स्वाधीनता’, ‘सभ्यता का संकट’ समग्र परिवेश की राजनीति’, ‘देशीयता और मौलिकता’, ‘स्थान भाषा : समस्या के कुछ पहलू, ‘भाषा कला और औपनिवेशिक मानस’, तथा साहित्य, संस्कृति और समाज परिवर्तन की प्रक्रिया जैसे चिंतन प्रधान निबंधों पर अवश्य ध्यान देना होगा।

अज्ञेय आलोचक कर्म को भारतीय अस्मिता की खोज से जोड़ने के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे हैं। ग.मा. मुक्तिबोध जिस सभ्यता समीक्षा के प्रतिमान को सामने लाते हैं उसमें अज्ञेय की सर्जनात्मक आलोचना का गौरव अक्षुण्य है। स्वाधीन मनुष्य, स्वाधीन चिंतन, स्वाधीन-भाषा के साथ अज्ञेय स्वाधीनता या मुक्ति की आलोचना में पुकार लगाते हैं उन्हें यूरोपियन मानस की गुलामी पसंद नहीं हैं। संस्कृतियाँ प्रभाव ग्रहण करती हैं – इसलिए पश्चिमी प्रभाव को वे स्वीकार करते हैं क्योंकि आदान-प्रदान से दृष्टि में व्यापकता आती है लेकिन नकलची बनकर, पिछलग्गू बनकर, आत्म-धिक्कार का शिकार होकर, अपने पूरे मूल्यवान चिंतन को फेंककर पश्चिम से सब कुछ ग्रहण करने में वे भलाई नहीं समझते हैं। उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तर चिंतनावाद, तथा पाठ और पाठकवादी आलोचना, विरेचनवादी आलोचना को भी हमें जस का तस नहीं ग्रहण करना होगा। क्योंकि सांस्कृतिक चिंतन की हमारे पास पश्चिम से ज्यादा समृद्ध परंपरा है। जरूरत उस परंपरा के पुनराविष्कार की है।

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