अखिलेश मिश्रा


सच कहता हूँ! मैंने अपने पच्चीस साल की नौकरी के कार्यकाल में कभी विभाग का काम नहीं किया है। जब मैं जूनियर था, तब मेरा काम मेरे वरिष्ठ करते थे और आज जब मैं वरिष्ठ अफसर हो गया हूँ तो मेरा काम मेरे जूनियर करते हैं। मैं यह सब इसलिए बता रहा हूँ कि इनसान जैसा चाह ले, उस तरीके से वह जी सकता है। बस आपको अपने कर्म का रास्ता लक्ष्य के अनुसार चुनना पड़ेगा। आज बहुत से लोग काम… काम… काम चिल्लाते रहते हैं, जैसे देश का सारा बोझ यही उठाए फिर रहें हों। यह सब भटके हुए लोग हैं। मैं तो बिंदास जीता हूँ और ऐसा भी नहीं है कि मेरे वरिष्ठ या कनिष्ठ लोग हमेशा मुझसे नाराज ही रहे हों। ज्यादातर परिस्थितियों में यह लोग मुझसे खुश ही रहा करते हैं। मैं अकेला अफसर था जो अपने बॉस की बीवी के साथ डांस करता था और गाना गाता था। बॉस वहीं खड़े मुस्कुराते रहते थे। आज भी मौके के अनुसार यही करता हूँ, पर अब उम्र का लिहाज करना पड़ता है… हा! …हा! …वैसे मैं साला कभी बूढ़ा ही नहीं होऊँगा, पर दुनिया यह थोड़ी जानती समझती है …हा! …हा! …हा! मेरी ज्यादातर सीआर एक्सेलेंट है। सारे प्रमोशन मुझे समय पर मिले हैं। मेरे कई कनिष्ठ मेरी लापरवाही के कारण बड़े-बड़े विजिलेन्स केस में फँस गए पर उन्हें कभी अपनी वफादारी में पश्चाताप नहीं हुआ। मेरे कई कर्मचारी आज मुझे भगवान की तरह पूजते हैं। कई तो सुबह आठ बजे मेरे घर आ जाते हैं और फिर रात दस बजे तक मेरे ही साथ रहते हैं। यह लोग अपने बाप की उतनी इज्जत नहीं करते हैं, जितनी कि मेरी करते हैं। यह सब अपने माँ, बाप और बीवी को छोड़ सकते हैं पर मुझे नहीं।मैं यह सब बातें अपने साथ विभाग में काम करने वालों को और दूसरे अन्य लोगों को भी अक्सर बताता हूँ… बड़े फक्र के साथ! अपना यह गुण मुझे बहुत ही विलक्षण प्रतिभा वाला लगता है। मैं इसे कामचोरी बिलकुल नहीं मानता… जैसे कि मुझसे चिढ़ने वाले लोग कहते हैं, पीठ पीछे। इस काम के लिए भी बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ती है… अन्य विभागीय कार्यों से कई गुना ज्यादा कड़ी मेहनत! यह गुण भगवान सबको नहीं देता है।

मैं कोई भी बात गलत नहीं कह रहा हूँ… आप खुद ही सोचकर देख लीजिए। विभाग का काम भले ही मैं नहीं करता हूँ पर तब भी मेरे पास कभी भी एक मिनट का खाली समय नहीं रहता है। मुझे कोई आलसी नहीं कह सकता है… और न ही कामचोर! मेरे जैसे लोग और आलसी में बड़ा फर्क होता है। आलसी हर काम में सुस्त होता है जबकि मेरे जैसे लोग अपना स्वार्थ देखकर काम करते हैं। जहाँ स्वार्थ होता है, वहाँ हम लोग अर्थात मेरे जैसे अन्य लोग अपनी सारी ऊर्जा लगा देते हैं। हम लोग परिस्थिति के अनुसार अपने आप को बड़ी तेजी से बदल लेते हैं। हम आलसी की तरह हाथ मलते नहीं बैठे रहते हैं। आलसी से लक्ष्मी दूर भागती है जबकि मैं लक्ष्मी की पूजा करता हूँ इसीलिए लक्ष्मी भी मुझको आशीर्वाद देती है। कुछ खास परिस्थितियों में हमारे जैसे लोग बहुत आकर्षण व्यक्तित्व वाले इनसान के रूप में जाने जाते हैं। मेरे जैसी सोच वाले कई लोग सर्वोच्च पद की शोभा बढ़ाकर रिटायर होते हैं, बल्कि आजकल तो आधे से ज्यादा लोग इसी रास्ते पर चलकर आगे बढ़ रहे हैं।

मेरा चैंबर बहुत बड़ा है। मैंने अपने चैंबर की दीवाल में एक बड़ा सा दर्पण लगवाया हुआ है। मैं लगभग अपनी हर पोस्टिंग में चैंबर में दर्पण जरूर लगवाता हूँ। इसमें मैं अपने चेहरे को देखता रहता हूँ। चेहरे में हमेशा ताजगी दिखनी चाहिए। भले ही आप दिनभर मेहनत करते हों, लेकिन यदि आप थके हारे दिखेंगे तो कोई आपको पसंद नहीं करेगा। इसीलिए घिस्सू लोगों को काम निकल जाने के बाद कोई नहीं पूछता है। मैं अपने चैंबर को बहुत सजाकर रखता हूँ। अपने पास आनेवाली फाइलों को मैं एक आलमारी में बंद कर देता हूँ अन्यथा अपने नीचेवालों को मार्क कर देता हूँ। कुछ फाइलों की जरूरत पड़ने पर मैं हत्या भी कर देता हूँ… सदा के लिए… सच कह रहा हूँ! जो करता हूँ …वह बता रहा हूँ।

मैं अपने चैंबर में आनेवाले हर अधिकारी और कर्मचारी का आवभगत बहुत लगन से करता हूँ। मेरा मानना है कि यह सभी अफसरों और कर्मचारियों को करना चाहिए। चाय, काफी, बिसकुट, कोल्डड्रिंक, सिगरैट… अलग-अलग व्यक्ति के साथ अलग खातिरदारी! यह हमारी सभ्यता का हिस्सा रहा है… भारतीय संस्कृति और सभ्यता… अतिथि देवो भव!

मैं चैंबर में बहुत कम समय के लिए ही बैठता हूँ, …मुश्किल से दो घंटे के लिए! मेरा काम जल्दी ही निपट जाता है। फालतू किस्म के काम मैं करता नहीं हूँ और दुनिया को दिखाने के लिए आठ घंटे कुर्सी तोड़ना मेरे सिद्धांतों के खिलाफ है।

बहुत से लोग अपनी कुर्सी के प्रति, सिस्टम के प्रति वफादार रहते हैं पर मैं तो मानता हूँ कि कर्मचारी, अफसर को अपने बॉस के प्रति वफादार रहना चाहिए। बॉस भी तो इसी सिस्टम का हिस्सा है। मैंने तो इसी सिद्धांत पर काम किया है। मेरा बॉस यदि हँसता मुसकुराता रहता है, तो मैं समझ जाता हूँ कि मेरा सिस्टम बढ़िया चल रहा है। यही उम्मीद मैं अपने कनिष्ठों से करता हूँ। कोई कर्मचारी भले ही रात दिन सिस्टम के लिए मेहनत करे पर यदि वह मुझे खुश नहीं रख पाता है तो मैं उसे कैसे अच्छा कर्मचारी मान सकता हूँ? आप ही बताइए? मेरे हाथों से वह कभी भी उत्कृष्ठ सीआर नहीं पा सकता है। सच कह रहा हूँ! हम लोग बॉस के लिए काम करते हैं, सिस्टम के लिए नहीं! सिस्टम को हमें बॉस के भरोसे छोड़ देना चाहिए। मुझे परेशानी सिर्फ तभी होती है जब कोई खड़ूस प्रकृति का बड़ा अफसर आ जाता है। ऐसे लोग किसी भी प्रकार की सेवा नहीं चाहते हैं। यह रात-दिन सिस्टम की भलाई के लिए कोल्हू के बैल की तरह लगे रहते हैं। इन्हें लगता है मानो इनका जन्म सिस्टम को सुधारने के लिए ही हुआ है। ऐसे बॉस के साथ मुझे तकलीफ होती है। यह बेहद नीरस लोग होते हैं। बल्कि मैं कहता हूँ कि यह लोग नालायक होते हैं। यद्यपि मुझे अपने वरिष्ठों के लिए ऐसे क्रूर शब्द आप लोगों के सामने नहीं कहने चाहिए। यदि किसी को बुरा लगा हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। मैं आप किसी को भी नाराज नहीं करना चाहता, बिना मतलब के!

जैसा कि मैंने पहले कहा, …मैं आज तक अपनी कुर्सी में कभी भी दो घंटे से ज्यादा नहीं बैठा हूँ। मैं दिनभर कुर्सी में बैठ ही नहीं सकता हूँ। मेरे पास और भी बहुत से काम रहते हैं। मनुष्य का जीवन एक बार मिला है। जीवन के विभिन्न आयामों पर ध्यान देना चाहिए। बड़े-बड़े सुधारक, ईमानदार, मेहनती लोग मरते हैं तो उनकी अर्थी में दस-बीस से ज्यादा लोग नहीं शामिल होते हैं पर मैंने इतनी जान पहचान बना ली है कि मेरे मरने पर कम से कम हजार पाँच सौ लोग तो आएँगे ही! मैंने इसी नौकरी में रहते हुए कइयों का भला किया है। सही तरीके से भला किया या गलत तरीके से, मैं इसे महत्व की चीज नहीं मानता। हर आदमी के लिए सही या गलत का पैमाना अलग-अलग होता है। नियम कानून बनाने वाले भी तो आखिर हम लोग ही हैं। किसी न किसी का फायदा तो होता ही है! आप ही बताइए दूसरे की मदद करना परहित होता है कि नहीं? अब मान लीजिए मैंने दफ्तर का कंप्यूटर उठा कर अपने किसी रिश्तेदार को दे दिया… रिश्तेदार के बच्चे उस कंप्यूटर में काम करेंगे… उससे कुछ सीखेंगे तो इससे देश का एक नागरिक आइटी में शिक्षित हुआ कि नहीं? बताइए? आखिर देश का तो फायदा ही हुआ और वैसे भी सब कुछ देश की ही तो संपत्ति है। देश की संपत्ति पर सबका अधिकार है। मैंने विभाग से पाँच लैपटाप इशू कराए हैं और सबको मैंने अपने परिचितों में बाँट दिया है। जब यह किसी काम के नहीं रह जाएँगे तो इन्हें वापस कर दूँगा। इनके बदले में पाँच नए लैपटाप खरीदूँगा और फिर से इन्हें अपने परिचितों में बाँट दूँगा। बड़े पद पर पहुँच कर यदि हम अपने किसी भी नात, रिश्तेदार या दोस्त, भाई का भला नहीं कर सके तो धिक्कार है ऐसी कुर्सी को और उस पर बैठने वाले स्वार्थी अफसर को! मैं इनको स्वार्थी इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह लोग सिर्फ अपने लिए ही सोचते और जीते हैं। यह लोग अपने को बचाने के लिए नियम कानून से डरते हैं।

भई! …यदि आप अपनों का भला नहीं कर सकते, तो देश का भला कैसे करेंगे? भलाई के संस्कार अपने घर परिवार, नात-रिशतेदारों से ही शुरू होते हैं। मैं यदि कुछ गलत कह रहा हूँ, तो आप टोक दीजिएगा!

मेरे घरवालों ने मेरा नाम मेरे स्वभाव के अनुसार ही रखा है, रंगीला प्रसाद! मेरा जैसा नाम है, मैं बिलकुल वैसा ही हूँ… बड़ा ही बाँका! …बड़ा ही रंगीला! …बड़ा ही नटखट! …बड़ा ही छैल छबीला! नाचना, गाना, घूमना फिरना मुझे बहुत भाता है। मुझे किसी भी चीज का बंधन पसंद नहीं है। मुझे कोई बाँधकर नहीं रख सकता। चाहे यह बंधन कर्तव्य का हो… समय का हो…, कुर्सी का हो या यहाँ तक कि रिश्ते-नातों का हो! मैं सबसे मुक्त हूँ। राज की बात बताता हूँ, मेरी बीवी भी मुझे बाँधकर नहीं रख पाती है।

मेरे अंदर ऊर्जा का प्रचुर भंडार है। मैं कभी थकता नहीं हूँ। मैं स्थिर होकर एक जगह बैठ नहीं सकता हूँ। विभाग में कुछ पार्टी करनी हो तो इसकी जिम्मेदारी मुझे ही सौंपी जाती है। विभाग में जब भी कोई नया बड़ा अफसर आनेवाला होता है तो मैं उस अफसर और उसके परिवार का सारा बायोडाटा अपने लैपटाप में कैद कर लेता हूँ। मैं पहले बॉस को खुश करने की कोशिश करता हूँ और फिर मैडम को। जिस तरह से भी यह दोनों प्राणी खुश रह सकें, मैं उसी उपाय में लगा रहता हूँ। जब बॉस और मैडम दोनों थोड़ा कड़क स्वभाव के और नियम कानून से चलने वाले होते हैं तब मैं एकात्म में खो जाता हूँ। जिस तरह कछुआ अपने हाथ पैर को अपने अंदर ही समेटकर दुबक जाता है, वैसे ही मैं भी शांत हो जाता हूँ। इस उम्मीद के साथ कि अपना कार्यकाल पूरा करके यह साहब एक दिन चले जाएँगे और फिर मेरे ही स्वभाव से मिलते जुलते कोई नए अफसर आएँगे। हर निशा के बाद आखिर नया सबेरा तो होता ही है।

जब भी कोई कड़क अफसर मुझे काम के लिए कहता है तो मैं उसे अपनी कोई न कोई परेशानी बता देता हूँ। मैं बड़े ही दीन भावना के साथ कहानी सुनाता हूँ। अच्छा इनसान स्वभावतः दयालु और परोपकारी होता है। बड़े अफसर भी मेरी कहानी को सच मानकर और मेरी वरिष्ठता का खयाल रखकर मुझे खुला छोड़ देते हैं। मैंने हर प्रकार के इनसान के गुण, अवगुण रट रखे हैं। मौका देखकर मैं इन्हें उपयोग में लाता हूँ। रंग बदलने में मैं गिरगिट को भी मात दे सकता हूँ। मैं पानी की तरह हूँ, जिसमें हर रंग घुल जाता है। मुझे यह सब बताने में कोई संकोच नहीं होता है, क्योंकि मैं ऐसा ही हूँ और अपने को विलक्षण प्रतिभा वाला मानता हूँ।

जो लोग रात दिन लगे रहते हैं अपनी क्षमता दिखाने में, उन्हें मैं महा मूरख मानता हूँ। हो सकता है कि वह लोग मेरे बारे में भी ऐसी ही राय रखते हों। लेकिन कोई मेरे बारे में कैसी राय रखता है, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर आप मुझे बेशरम मत समझ लीजिएगा… हा! …हा! …हा!

आजकल मेरे बड़े अफसर ईमानदार और नियम कानून से चलने वाले हैं। वह सज्जन और बहुत ही सीधे-साधे स्वभाव के हैं। मैं इनके साथ बड़ी ही विनम्रता से पेश आता हूँ। आजकल मैं दफ्तर भी दो-दो घंटे के लिए दो बार जाता हूँ। सामान्यतः मैं हमेशा एक हाफ में दो घंटे के लिए ही दफ्तर जाता हूँ, …और कभी-कभी तो दफ्तर जाता भी नहीं हूँ। वरिष्ठता को देखते हुए मुझे अक्सर ही कुछ छूट मिल जाती है …और मिले भी क्यों नहीं? बड़े साहब का स्वभाव ऐसा है कि वह किसी की बुराई सुनना पसंद नहीं करते हैं और इस वजह से उनको मेरे बारे में पूरी सच्चाई पता नहीं चल पाती है। यहाँ भी अपना फायदा ही हो रहा है …हा! …हा! …हा! मैंने भी अपने ऊपर एक बड़े सज्जन इनसान का चोला डाला हुआ है… पता नहीं कब तक जीना पड़ेगा, इस चोले के साथ। बोर हो रहा हूँ मैं! मेरी पूरी टीम भी अभी शांत है। हम सब लोग स्थितिप्रज्ञ अवस्था में पहुँच गए हैं।

अपने जैसे स्वभाव के लोगों की एक टीम बना रखी है, हम लोगों ने!

मेरे ही दफ्तर में एक कनिष्ठ अधिकारी अनुराग सिंह भी है। वह भी बड़े साहब की तरह नियम से चलने वाला और थोड़ा कड़क मिजाज का है। मूर्ख है साला! उसे यह नहीं मालूम है कि नियम कानून वरिष्ठों के ऊपर नहीं बल्कि कनिष्ठों के ऊपर चलाए जाते हैं। मेरी वरिष्ठता का उसे बिलकुल भी खयाल नहीं है… नालायक कहीं का! अनुराग मेरी सलाह और माँगों को नहीं मानता है। मैं उससे कुछ भी फायदा नहीं उठा पाता हूँ। मेरी टीम के कुछ साथियों को अनुराग ने अपने तरीके से ठीक करने कि कोशिश की है। मेरे टीम के साथी तो बहुत ही सीधे-साधे स्वामिभक्त कर्मचारी हैं, उन्हें क्या सुधारना? एक बार सेवा का मौका तो दो… तब पता चलेगा कि वह कौन सी प्रजाति के हीरे हैं। हर कोई दफ्तर का घिस्सू नहीं हो सकता है। सबमें अलग-अलग प्रतिभा होती है। मैं मन ही मन अनुराग से बहुत नाराज हूँ, पर बड़े साहब का अनुराग के प्रति स्नेह देखकर फिलहाल चुप हूँ। मैं उस सुबह का इंतजार कर रहा हूँ, जब बड़े साहब अपने सामान के साथ नई जगह ज्वाइन करने जाएँगे… तब मैं देखूँगा इस नालायक अनुराग को! …ब्लडी ईडियट को!

मुझे पता है कि समय चलता है और चलने के साथ-साथ यह बदलता भी रहता है। गृह नक्षत्र भी बदलते रहते हैं। इन्हीं के साथ इनसान की परिस्थितियाँ भी बदलती है। यह सब जरूरी होता है, गुण-दोष को परखने के लिए। सुबह, दोपहर, शाम, रात सबका अपना महत्व है। सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ही गुण, दोष इस दुनिया में रहे हैं और श्रष्टि के अंत तक यह रहेंगे। इनकी मात्रा में जरूर थोड़ा बहुत परिवर्तन होता रहता है। मेरे जैसे गुणी लोगों को हमेशा दबाकर नहीं रखा जा सकता है।

मेरे भी दिन अब बदलने वाले हैं। मेरी शुक्र की शुभ दशा आने वाली है। ज्योतिषियों ने मुझे अच्छे दिन के लिए तैयार हो जाने के लिए कह दिया है। शुक्र मेरी कुंडली में बारहवें घर में बैठा हुआ है और यह शुक्र की अच्छी जगह मानी जाती है। मैं बहुत खुश हूँ, भविष्य के बारे में सोचकर!

शुक्र की दशा… धन, नाम, ऐश्वर्य की दशा! मैं अपनी खुशी को दबा नहीं पा रहा हूँ। कहीं मैं पागल न हो जाऊँ, खुशी के मारे!

लीजिए बड़ी जल्दी ही मेरे शुभ दिनों की शुरुआत भी हो गई है। बड़े साहब का तबादला हो गया है। यद्यपि बड़े साहब ने मेरा कभी कोई नुकसान नहीं किया पर तब भी उनके समय में, मैं अपने कोई भी काम नहीं करवा पा रहा था। इस वजह से मैं उनके जाने से मन ही मन बहुत खुश हूँ। दूसरी अच्छी बात यह है कि बड़े साहब के रूप में श्री दलाई साहब आ रहे हैं जो मेरे स्वभाव से पूरी तरह तो नहीं मिलते हैं पर सेवा और चापलूसी उन्हें भी बहुत पसंद है। मैंने दलाई साहब की पसंद, नापसंद की जानकारी पहले से ही ले लिया है। मैं शुरू से ही दलाई साहब को अपनी गिरफ्त में लेने का काम चालू कर दूँगा। मैंने अपनी सेना को दलाई साहब के शानदार स्वागत के लिए तैयारी करने के लिए कह दिया है। ऐसा स्वागत होगा कि दलाई साहब इसे जीवन भर याद रखेंगे। मेरी पूरी सेना तैयारी में लग गई है।

एक बड़े होटल में शानदार कार्यक्रम का आयोजन किया गया। दलाई साहब को उनके सम्मान में रखी हुई पार्टियाँ बहुत पसंद आती हैं। मैंने भी एक स्वागत गीत गाया। इसे मैंने खुद ही लिखा है।

‘आए हैं आज जगत के नंदन, स्वागत करो दीप जला के रे!

अब जाने का नाम मत लेना, स्वागत करो दीप जला के रे!

बड़े दिनों के बाद, अब अच्छा समय आया है रे!

स्वागत करो पूरे दिल से, जाने मत देना इस पल को रे!

झूम के नाचो, झूम के गाओ, आज इस पल में रे!

आए हैं आज जगत के नंदन, स्वागत करो दीप जला के रे!’

इस स्वरचित स्वागत गीत के बाद मैंने एक फिल्मी गीत भी गाया था।

‘तुम आ गए हो… नूर आ गया है!’

आज मैं बहुत ही खुश हूँ। मेरे शरीर की ऊर्जा अब उबाल बनकर बाहर छलकना चाहती है। मेरी पूरी सेना भी अब अपने रंग में आ गई है। जैसा मैंने पहले बताया ही है कि मैंने अपने स्वभाव से मिलते जुलते लोगों की एक सेना बनाई हुई है। यह लोग विभाग का काम छोड़कर बाकी दुनिया के सारे काम करते हैं। इन्हीं लोगों के सहारे मैं अपना जलवा मैंटेन करता हूँ। इन लोगों के हितों की जिम्मेदारी मैं अपने दोनों कंधों से ढोता हूँ। मैं इन सबका हूँ और यह सब मेरे हैं। जिन अफसरों ने मेरी रंगीला सेना के सदस्यों को विभाग का काम नहीं करने के कारण प्रताड़ित किया था, अब मैं उनको सबक सिखाना चाहता हूँ। इस सूची में पहला नाम अनुराग सिंह का है। अनुराग ने मेरे कई साथियों की तनख्वाह काटी है, क्योंकि यह बेचारे लोग अपने घर के काम के कारण दफ्तर नहीं आ पाते थे। मेरे खौफ के कारण ऐसी गुस्ताखी कोई अफसर करता नहीं है पर यह अनुराग साला हीरो बनता है। रानाडे भी अनुराग के ही साथ का है पर वह कितना सीधा है, कितना विनम्र है। अपने अफसरों से इतना डरता है कि यदि वह उसे जोर से डाँट देंगे तो वह बेचारा सू-सू कर देगा पैंट में ही। आखिर क्यों डरता है रानाडे ? …सी आर के लिए! …प्रमोशन के लिए …पोस्टिंग के लिए …डरना भी चाहिए। आज के युग में ऐसे विनम्र लोग ही सफल होते हैं। अनुराग इनसे सबक नहीं लेता है।

उतारता हूँ हीरोगीरी अब सबकी!

‘सर अब हमें बदला लेना चाहिए।’ सभी कामचोरों ने रंगीला साहब से कहा।

‘जरूर!’

‘सर! अनुराग साहब विभाग को अपने बाप की पूँजी समझते हैं। मैं एक हाफ दफ्तर नहीं आता था तो उन्होने मेरी तनख्वाह ही कटवा दिया। मेरे अपने पैसे डूब गए।’

‘यह तो अन्याय है। हम सरकारी नौकरी में हैं। मुझे पता है कि तुम आधे समय अपनी आटा चक्की में बैठते हो!’

‘सर! सभी के घर में कुछ न कुछ काम तो होता ही है?’

‘क्यों नहीं? मैं खुद दफ्तर में कभी दो घंटे से ज्यादा नहीं बैठता हूँ। भाई यह सरकारी संस्था है, किसी के बाप की नहीं है!’

‘सर, दलाई साहब को बोलकर पहले अनुराग सिंह का तबादला कराइए। बाकी से बाद में निपटते हैं।’

‘चिंता मत करो! मैं मौके की तलाश कर रहा हूँ। ऐसे समय तबादला करवाऊँगा जब उसको सबसे ज्यादा परेशानी होगी।’

‘मतलब?’

‘मतलब, अक्टूबर महीने में तबादला करने से वह अपने परिवार को साथ नहीं ले जा पाएगा। इससे वह और उसका परिवार दोनों परेशान रहेंगे।’

‘सर! यू आर जीनियस!’

‘तो, अभी तक तुम लोग मुझे क्या समझ रहे थे?’

‘सर आप हमारे डॉन थे, डॉन हैं और हमेशा रहेंगे।’

मैं यह सुनकर बहुत खुश हो गया हूँ… सच में। मुझे अपने आप को डॉन कहलवाना बहुत पसंद है। मैं तो साला गलती से अफसर बन गया, …वास्तव में मुझे डॉन ही बनना था!

खैर! अच्छा हुआ कि कई लोगों का जीवन बच गया… हा! …हा! …हा! आज जितने डॉन हैं, उन्हीं से दुनिया परेशान है।

मजाक छोडकर अब काम की बात में आता हूँ। मैंने दो सूची बनाई हुई है। एक में वह लोग हैं, जिनसे मुझको बदला लेना है और दूसरी में वह नाम हैं जिनको मैं फायदा पहुँचाना चाहता हूँ। मेरी सोच बड़ी स्पष्ट हैं, यह तो आप अब तक समझ ही गए होंगे। अपने काम करवाने के लिए मुझे दलाई साहब की जमकर चापलूसी करनी पड़ेगी। चापलूसी की सारी हदें भी मुझे पार करनी पड़ी तो मैं करूँगा पर अपने काम करवाकर रहूँगा। मैं जो चाह लेता हूँ, वह करके रहता हूँ।

कल ही एक मीटिंग होने वाली है। उसी में मैं दलाई साहब को दाल मखानी वाला तड़का लगा देता हूँ। आप हँसिए नहीं… यह मेरा कर्तव्य है और काम करने का अपना तरीका है।

मीटिंग में मैंने दलाई साहब के बारे में बोलना चालू कर दिया है, ‘दलाई साहब जैसे अफसर कभी-कभी पैदा होते हैं। यह लोग समाज की धुरी हैं। यह अफसर नहीं बल्कि एक इंस्टीटूसन हैं। ज्ञान और अनुभव की गंगा हैं। इन पर शोध होना चाहिए। हमारे लिए यह गर्व की बात हैं, कि इतना महान आदमी हमारे मुखिया के रूप में यहाँ हैं। हम लोगों को इनसे बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। मैंने तो सोच लिया है कि जितना ज्ञान मैंने अपने पिता और शिक्षकों से नहीं प्राप्त किया है, उससे कहीं ज्यादा ज्ञान मैं आदरणीय, पूज्यनीय, वंदनीय श्री दलाई साहब से प्राप्त करने की कोशिश करूँगा। मैं कह रहा हूँ कि कोशिश करूँगा क्योंकि दलाई साहब सागर हैं और मैं इस सागर की एक बूँद। मैं कोशिश करके जितना भी सीख पाऊँगा, मेरे लिए वह ही बहुत है। मैं उनके चरण कमलों के प्रति सदैव नतमस्तक रहूँ, यही मेरे लिए भाग्य की बात होगी।’

मैं बोलते समय दलाई साहब की तरफ बीच-बीच में देख रहा हूँ। मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि दलाई साहब का सीना फूलकर चौड़ा हो गया है और वह इधर-उधर देख रहे हैं। वह बहुत भावुक हो गए हैं और उनकी आँखों में स्पष्ट तरलता देखी जा सकती है।

प्रशंसा हर किसी को अच्छी लगती है। भगवान को भी अपनी स्तुति अच्छी लगती है फिर दलाई साहब को प्रशंसा क्यों अच्छी नहीं लगेगी? मैंने भगवान का उदाहरण इसलिए लिया जिससे आप अपनी सीमा के अंदर आ जाएँ, अन्यथा आप मुझे चापलूस समझेगें और मेरे ऊपर दाँत निपोरकर हँसेंगे।

मेरी तकनीक काम कर गई है। दलाई साहब मुझ पर बहुत अधिक विश्वास करने लगे हैं। वह अपने हर निर्णय में मुझसे राय मशविरा जरूर करते हैं। हर मीटिंग और अन्य मौकों पर वह मेरी जमकर तारीफ भी करते हैं। विश्वास एक ऐसी चीज होती है जो अपने आप बहुत जल्दी आ जाती है, चाहकर इसे नहीं पाया जा सकता। लेकिन मुझे इसे पाने के सारे तरीके पता हैं।

अब मुझे अपने काम करवाने हैं। किसी दिन मौका देखकर, थोड़ा उदास होकर दलाई साहब के पास जाता हूँ। एक्टिंग करने में तो कोई मुझसे आगे हो ही नहीं सकता। न जाने कितनी बार अपने माँ बाप को धोखा दिया है। जब मैं अपने माँ बाप को, जिन्होने मुझे जन्म दिया है, धोखा दे सकता हूँ फिर बॉस किस खेत की मूली है… हेंह!

‘मे आइ कम इन सर?’

‘कम इन …कम इन …रंगीला जी! प्लीज टेक यौर सीट।’

‘धन्यवाद सर!’

‘क्या बात है रंगीला जी! आज आप खुश नहीं दिख रहें हैं?’

‘सर! आजकल जूनियर लोग सीनियर लोगों की इज्जत नहीं करते हैं।’

‘यह बहुत ही गलत चीज है और मैं इसके सख्त खिलाफ हूँ। तुम किसकी बात कर रहे हो?’

‘सर! अनुराग मेरी बात नहीं सुनता है। उसे जरा भी लिहाज नहीं है कि मैं उससे पंद्रह साल वरिष्ठ हूँ।’

‘तुम क्या चाहते हो?’

‘सर! उसे आराम की कुर्सी में बैठा दीजिए। बहुत काम-काम चिल्लाता है।’

‘तुम जहाँ कहो, मैं उसे वहीं भेज देता हूँ।’

‘सर, यह दो सूचियाँ हैं। इन पर सब लिखा है।’

‘चलो! एक-एक करके डिस्कस कर लेते हैं।’

‘ठीक है सर!’

दलाई साहब ने जल्दी ही मेरे मन की मुराद पूरी कर दी है। यह सब साहब इतना जल्दी कर देंगे, मुझे खुद इसका अनुमान नहीं था। अनुराग का तबादला अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में कर दिया गया।

उसे साल भर हर तरीके से परेशान किया गया। अच्छा काम करने के बावजूद उसकी सीआर खराब कर दी गई है। इसी तरह एक दो और लोगों को मैंने सबक सिखाया है।

साले! …बड़े चले थे ईमानदार और मेहनती बनने! इन नालायकों को यह नहीं पता है कि दुनिया कितना आगे चली गई है।

मेरी पूरी रंगीला सेना आज बहुत खुश है। सबने मिलकर मुझे एक शानदार दावत दिया है, बड़े होटल में। मैं इसे दावत नहीं बल्कि उनका मेरे प्रति सम्मान और प्यार समझता हूँ। इस पार्टी में मैंने भी शराब का लुप्त उठाया। मैं बहुत कम मौकों पर ही पीता हूँ, आप लोग मुझे पियक्कड़ मत समझ लीजिएगा।

‘सर! दलाई साहब कब तक रहेंगे?’ दिलीप ने पूछा।

‘क्यों बे? तू उन्हें जल्दी भेजना चाहता है।’

‘सर मैं तो चाहता हूँ कि वह यहीं से रिटायर करें।’

‘तो अब दुबारा उनके जाने की बात मुँह से मत बोलना। आदमी जैसे सोचता है, वैसे ही ऊर्जा उसकी तरफ आती है।’

‘जी सर!’

‘क्या हालचाल है सोहन सिंह?’

‘सर आजकल लग रहा है कि हम सरकारी नौकरी में हैं। वरना पहले तो अनुराग साहब ने हमारा जीना मुश्किल कर दिया था।’

‘अब तुम लोग आराम से ऐश करो!’

‘सर! यू आर ग्रेट!’ राव ने कहा।

‘तुम्हें अभी पता चला?’

‘सर हम लोग आपकी काबिलियत के कायल हैं।’ राजेंद्र ने कहा।

‘अब तुम लोग अनुराग, जयप्रकाश और राकेश के बारे में तरह-तरह की बातें फैलाओ!’

‘सर! हम लोग आज से ही लग जाते हैं।’

‘इन लोगों को बिना मतलब बदनाम करो! मगर थोड़ी होशियारी से! साला मैं इस मामले में पहले से बदनाम हूँ। लोगों को पहला शक मेरे ऊपर ही होता है।’

‘आप निश्चिंत रहें सर! मैं इतना बड़ा कुत्तापन करूँगा कि यह ईमानदार लोग अपना जीवन ठीक से जीना भूल जाएँगे। आखिर आपकी दी हुई शिक्षा कब काम आएगी?’ दिलीप ने कहा।

‘साला मैं तो हमेशा से तुम्हें कमीना कुत्ता ही समझता रहा हूँ! तुम इनसान हो ही नहीं!’ यह कहकर रंगीला प्रसाद जोर का ठहाका लगाते हैं।

‘सर! चेला किसका हूँ?’ दिलीप यह कहकर रंगीला प्रसाद के साथ ठहाका लगाने लगता है।

सब कुछ अपने नियंत्रण में है। समय अच्छे से कट रहा है। कुछ लोग समझते हैं कि मैं उफनाती नदी की तरह फैल रहा हूँ। मुझे रोकने के लायक न कोई किनारा है और न ही कोई मजबूत बाँध। मेरा व्यवहार भी अब पूरी तरह बदल गया है, और क्यों नहीं बदले? विभाग के लोगों को भरोसा ही नहीं होता है कि यह वही रंगीला प्रसाद है। यद्यपि पुराने लोग मेरी इस आदत के बारे में सब जानते हैं। लोगों को मेरी चाल से अभिमान की गंध आती है, जलते हैं साले! मैं इनको जलाने के लिए ऐसा चलता हूँ मानो कोई मदमस्त हांथी चल रहा हो! मेरी फुर्ती बड़े तूफान से भी ज्यादा तेज है। मेरे ओंठों पर रहने वाली विनम्र मुस्कान, क्रोधी ऋषि की गंभीरता में बदल गई है। निष्क्रियता की जगह अति सक्रियता आ गई है। दीनता ने मानो शरमाकर मुँह ढक लिया है। विनम्र मीठी आवाज की जगह बिजली कड़कने लगी है। एक सीधा-साधा इनसान, रॉबिनहुड जैसे दिखने लगा है, जो कि मैं वास्तव में हूँ। ऊर्जा का प्रचुर भंडार तो मैं पहले से ही था। यह सब परिवर्तन मैंने जान बूझकर किए हैं। आखिर क्यों मैं अपने असली रंग में नहीं आऊँ? यह समय मेरा है… सिर्फ और सिर्फ मेरा।

बहुत कष्ट झेले हैं हमने… गुलामों की तरह रहते थे!

विभाग के सोकॉल्ड ईमानदार, मेहनती और सीधे-साधे लोग अब परदे की पीछे से चुपचाप अपना काम कर रहे हैं, गधों की तरह। उनकी आजकल कोई पूछ नहीं है। उनका मनोबल टूट रहा है। वह निराश हो रहे हैं और उन्हें निराश होना भी चाहिए। थोड़ा सा काम क्या कर देते थे, अपने आप को बड़े बहादुर समझते थे। हम लोगों को यह लोग बड़े हेय द्रष्टि से देखते थे। अब मरे सालें! आजकल सब जगह मेरा और मेरी टीम का ही बोलबाला है। सब लोग कहते हैं कि विभाग का आउटपुट गिर रहा है पर मैं इससे सहमत नहीं हूँ। मैं तो मानता हूँ कि आजकल हमारे विभाग में सच्चा समाजवाद और समता का वातावरण है। आजकल सब खुश हैं, केवल कुछ गधों को छोडकर। पर गधे तो कभी खुश हो भी नहीं सकते हैं। इनके लिए ज्यादा काम है तो परेशानी… और काम नहीं है तो भी परेशानी!

हम लोग मजे से जी रहे थे पर पता नहीं मेरे ऊपर किसकी नजर लग गई है। दलाई साहब का अचानक तबादला हो गया है। यह खुद दलाई साहब के लिए एक सदमा है। इससे पहले इतना जल्दी वह कहीं से नहीं गए थे। वह अक्सर खुश होकर कहते भी थे कि मैं जहाँ भी जाता हूँ, वहीं धूनी जमाकर बैठ जाता हूँ। मैं और मेरी पूरी सेना दुखी है। मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। हम लोग किसी भी हालत में दलाई साहब को नहीं जाने देना चाहते हैं। बहुत दिनों के बाद हमारे जीवन में बहार आई थी और वह इतनी जल्दी उजड़ जाएगी, यह हमारे कल्पना से बाहर है। आज मुझे लग रहा है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता खुद नहीं है। कर्म और भाग्य दोनों पर मेरा विश्वास कम हो रहा है। कर्म का फल, इस सिद्धांत से मेरा मन उचटने लगा है।

‘आखिर हम लोगों ने क्या गलत किया था कि भगवान से हमारा थोड़ा सा जलवा देखा नहीं गया? क्या हम लोग पापी हैं? क्या हम लोग दुष्ट हैं? रंगीला साहब ने तो जीवन भर परहित ही किया है। नियम कानून को ताक पर रखकर, अनगिनत लोगों का उन्होने भला किया है। न जाने कितने आर्केस्ट्रा वाले सरकारी पैसे की मदद से बच गए, नहीं तो वह कबके बंद हो गए होते? फर्जी सर्टिफिकेट बनवाकर, न जाने कितने ही लोगों को उन्होने नौकरी में रखवाया है। अनगिनत कामचोर लोगों की सीआर सुधरवाकर, उन्होंने प्रमोशन दिलवाए हैं। यह सब और कौन कर सकता है? …सिर्फ और सिर्फ हमारे रंगीला साहब! न जाने कितने लोगों की, जिनकी नौकरी काम में नहीं आने से जा सकती थी, रंगीला साहब ने फर्जी हाजिरी लगवाकर बचाया है! वह बाबू लोगों को डाँट दपटकर खुद अपने हाथ से मस्टर भरते थे। नवीन तो एक साल दफ्तर ही नहीं आया था पर उसे पूरी तनख्वाह मिलती रही…, किसके कारण? …रंगीला साहब के कारण! ऐसे संत की खुशी भगवान से देखी नहीं जाती है। धिक्कार है ऐसे ईश्वर को!’ दिलीप यह कहकर रो रहा था, दहाड़ मार-मारकर, गले को फाड़-फाड़कर!

उसने भविष्य में किसी भी मंदिर में न घुसने कि कसम खा ली थी, हाथ में जल लेकर!

मेरा भक्त! …दिलीप! भगवान को छोड़ सकता है पर मुझे नहीं। मेरे वफादारों के सामने, कुत्ते अपनी वफादारी भूल जाएँगे।

मैं इतना जल्दी हार मानने वाला नहीं हूँ। मैं अभी दलाई साहब के पास जाता हूँ।

‘सर! हम आपको इतना जल्दी नहीं जाने देंगे।’

‘आदेश तो ऊपर से आया है। हमें तो जाना ही पड़ेगा।’

‘सर! हम लोग कोशिश तो कर लेते हैं।’

‘क्या करोगे?’

‘सर! हवन कराऊँगा, नेता मंत्री को पकड़ूँगा, साम, दान, दंड, भेद सब करूँगा!’

‘हम लोग मिलकर प्रयास करेंगे तो सफल हो सकते हैं।’

‘जरूर सर! वी विल विन!’

‘ओके!…गो अहेड बट बी केयरफुल!’

‘डोंट वरी सर एंड हैव अ कॉन्फ़िडेंस इन मी!’

मैंने अपने आप से कहा कि मेरा तो जीवन ही बीत गया है, यही सब करते हुए। मेरी पूरी सेना बहुत दुखी है। उनके अंदर मातम सा छा गया है। मैं उनको इस हालत में नहीं देख सकता। मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि उनके अंदर जान फूँकी जाए। मैंने सबको आदेश दिया है कि वह अपने-अपने क्षेत्र के नेताओं को पकड़ने की कोशिश करें। रंगीला सेना में कई ऐसे लोग हैं, जिनकी क्षेत्र के नेताओं से थोड़ी बहुत जान पहचान है। मैंने शहर के कई बड़े ज्योतिषियों को दलाई साहब की कुंडली दिखाई है। उसमें तबादला रोकने के उपाय ढूँढ़ने का प्रयास किया जा रहा है। हम ऐसे ही हार नहीं मान जाएँगे।

बहुत भटकने के बाद आखिर एक बड़े ज्योतिषी ने कुछ ऐसे उपाय बताए हैं जिससे साहब का तबादला रुकवाया जा सकता है। एक हवन करना पड़ेगा और हवन को करवाने में ग्यारह हजार रुपए का खर्चा आएगा। इतने पैसे की बात सुनकर मुझे थोड़े समय के लिए कुछ झटका तो महसूस हुआ लेकिन फिर मैंने आगे के बारे में सोचकर अपनी जेब से बारह हजार रुपए निकालकर पंडित को दे दिए।

इनवेस्टमेंट करने वाले को ही उसका फल मिलता है… आप समझ रहे हैं न! जो रिस्क ले सकता है, वही सिकंदर है।

‘पंडित जी ग्यारह हजार रुपए हवन कराने के लिए और एक हजार हवन सामग्री के लिए है। हवन शुद्ध घी से होना चाहिए।’

‘जरूर जजमान! ऐसा ही होगा!’

‘यह एक हजार और रख लीजिए… पूरे ध्यान से मंत्र पढ़िएगा।’

‘निश्चिंत रहिएगा… आपने मेरे दिमाग को पूरी तरह एकाग्र कर दिया है।’

हवन करने के बाद ही संयोग से एक नेता से भी जान पहचान निकल आई है। मैंने खुद नेता जी से बात की है और उन्होने दलाई साहब का तबादला रुकवा दिया है।

खुशी! …अपार खुशी मिली है, मेरी पूरी टीम को!

इस घटना से दलाई साहब की धाक जम गई है। मैं इस घटना को खूब प्रचारित कर रहा हूँ। गधे लोगों को छोडकर बाकी सबके बीच हमारी अच्छी धाक जम गई है। मुझे पता हैं कि आप कहेंगे कि हम लोगों ने कमजोर, निरीह, और कायर लोगों के बीच अपनी इज्जत जमा ली है। आप ऐसा ही समझ रहे हैं क्योंकि आप हमसे जलते हैं। वास्तव में हमारी पहुँच बहुत ऊपर तक है। इस तबादले को रुकवाने में हमारी कोई कचूमड़ नहीं निकली है, जैसा कि आप समझ रहे हैं।

‘रंगीला और दलाई मिलकर खूब कुर्सी का नशा भोग रहे हैं। उनके उद्देश्य विभाग की भलाई नहीं, बल्कि कुछ और हैं। रंगीला को देखकर ऐसा लग रहा है मानो कि वह कितने सालों से लक्ष्मी की उपासना कर रहा था और आज माँ लक्ष्मी ने उनको आशीर्वाद दिया है। करीब एक साल में इन दोनों ने मिलकर विभाग की ऐसी की तैसी कर दी है।’ अनुराग फोन पर यह बात पुराने साहब को बता रहा था।

अनुराग जैसे लोग समय के साथ बदल नहीं पाए हैं और इसीलिए दुखी और हारे हुए हैं।

क्या बुराई है, मेरे जीवन दर्शन में? आज कौन ज्यादा सफल है, मेहनती ईमानदार कि मैं? मैं बड़े आराम से यहाँ तक पहुँच गया हूँ। खूब ऐश किया हूँ और आगे भी करता रहूँगा। मैं क्यों बदलूँ, अपने आप को?

अब सब लोग मुझसे सफलता पाने की सलाह लिया करते हैं। जो लोग सलाह नहीं लेते हैं, उन्हें मैं अपने से ही सलाह दे देता हूँ। यद्यपि यह मेरी एक कमजोरी है। बिना माँगे सलाह नहीं देना चाहिए। जिसको नहीं सुधरना है, उसका ठेका मैंने थोड़ी लिया है। मेरी कुछ मुख्य सलाह निम्न हैं, ध्यान से पढ़िएगा –

अपने से बड़े अधिकारी की खूब सेवा करो… अच्छे महँगे होटल में खाना खिलाओ… बॉस का गुलदस्ते से अभिवादन करो… उनकी सभी जरूरतों का ध्यान रखो… फिल्म शोले के गब्बर की तरह बॉस को फॉलो करो, अर्थात बॉस हँसे तो हँसो वरना चुपचाप शांत होकर बॉस के आदेश की प्रतीक्षा करो… बॉस जब तुम्हारे मुख्यालय आए तो उसे इतनी शॉपिंग कराओ कि वह मुख्य काम भूल जाए… बॉस को बीच-बीच में घर बुलाकर खाना खिलाओ… बॉस की मैडम को खुश रखो… बॉस और उनकी मैडम का, जब भी मौका मिले दिल खोलकर तारीफ करो… इत्यादि, इत्यादि!

कई लोग मेरी सीख को अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाने लगे हैं। लोकेश तो इन सुझाओं पर बहुत अधिक चिंतन मनन करता रहता है पर उसे यह नहीं मालूम है कि इन गुणों को पाने के लिए कुछ साल तपस्या करनी पड़ेगी। रातों रात कोई भी इन पर एक्सपेर्ट नहीं हो जाएगा। वह जल्दबाजी में कुछ गड़बड़ियाँ कर देता है।

आजकल मेरी सेना में नई भर्तियाँ हो रही हैं… रोज!

समय चलता है …चलता ही रहता है …दिन बदलते हैं …स्थिति बदलती है।

आज अनुराग को अपने चैंबर में बुलाता हूँ। देखता हूँ कि मिर्च में तीखापन अभी बचा भी है कि खतम हो गया।

‘अनुराग, एक मिनट के लिए मेरे पास आओगे?’

‘सर! अभी आता हूँ।’

‘आजकल कैसे हो, अनुराग?’

‘सर! बिल्कुल ठीक ठाक!’

‘यहाँ कुछ काम धाम तो होगा नहीं?’

‘सर! थोड़ा बहुत काम तो रहता ही है। बाकी अच्छा है कि मुझे अपने लिए भी समय आराम से मिल रहा है।’

‘लेकिन तुम्हें मजा नहीं आ रहा होगा?’

‘सर! मुझे यहाँ ज्यादा आनंद आ रहा है। मैं पावर और पैसे में विश्वास नहीं करता हूँ बल्कि कर्तव्य की भावना के साथ अपनी कुर्सी से न्याय करने की कोशिश करता हूँ।’

‘तुम्हें नहीं लगता है कि इस रास्ते पर चलकर तुम जल्दी ही थक जाओगे?’

‘बिल्कुल नहीं! वैसे भी जब रास्ता कुछ ऊबड़-खाबड़ होता है, तभी पता चलता है कि इनसान चलने लायक भी है या नहीं।’

‘तुम्हारे अंदर बहुत जोश है!’

‘सर! जिसके अंदर जोश नहीं है, वह इनसान नहीं बल्कि मुरदा होता है।’

‘शाबास! तुम्हारे विचार बड़े उच्च हैं।’ रंगीला ने व्यंग्य के साथ कहा।

‘सर! आपके विचार भी तो एक अलग ही किस्म की उच्चता को दर्शाते हैं!’

‘ कैसे?’

‘सर! आप में जो क्षमता है, वह असाधारण है।’

अनुराग ने यह बातें जिस अंदाज से कही है, उससे मैं अंदर से काँप गया हूँ… सच में! मेरे दिमाग में हलचल चालू हो गई है। किसी आदमी ने पहली बार मुझे अंदर से सोचने के लिए विवश किया है। मैं अंदर से खुश भी हो गया हूँ और डर भी गया हूँ। खुश इसलिए हो गया हूँ, क्योंकि मुझे अपना भविष्य अब सुरक्षित नजर आने लगा है। मुझे ऐसा लगता है कि जब तक अनुराग जैसे कर्तव्यनिष्ठ, मेहनती, ईमानदार लोग हैं, जिन्हें कि मैं बेवकूफ कहता और मानता हूँ, तब तक मैं और मेरी सेना इसी तरह ऐश कर सकते हैं। हम लोग चाहते भी यही हैं कि हमारे अलावा बाकी सब घिस्सू रहें। लेकिन अनुराग के तेवर और बदलते समय ने मुझे यह अहसास करा दिया है कि अब कामचोरों को अपना तरीका थोड़ा सा बदलना पड़ेगा। काम तो हम लोग कर नहीं सकते हैं क्योंकि हम इसके लिए बने ही नहीं हैं, पर अब ऐसा दिखाना पड़ेगा कि हम काम कर रहे हैं। बिना दफ्तर आए, तनख्वाह लेने का समय अब गुजर गया है। अब दफ्तर में सबको आना पड़ेगा, भले ही दफ्तर में बैठकर घर का काम करें। युवा आबादी आँख मूँदकर नहीं बैठ सकती है। एक बात और, अब हम लोगों को काम करने वालों से कभी भिड़ना नहीं चाहिए वरना हारने की पूरी संभावना है। बल्कि हम लोगों को अब काम करने वालों की जमकर खुशामद करनी चाहिए जिससे हम सुखपूर्वक जीवन बिता सकें।

मैं अपनी सेना के कार्यकारणी सदस्यों की एक बैठक बुलाता हूँ जिसमें इन सारी बातों को विस्तार से बताऊँगा और अपनी सेना के नियमों में बदलाव के लिए प्रस्ताव भी रखूँगा।

‘समय के साथ बदलना ही जीवन है। हम लोगों को अपनी संख्या ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहिए। हम लोगों को मेहनती लोगों की प्रशंसा करनी चाहिए और सिर्फ मौके पर ही उन्हें दिमाग से हराना चाहिए जिससे हमारी आवश्यकता पूरी होती रहे। मौके से मेरा मतलब प्रोमोसन और पोस्टिंग से है। हमें अपनी टीम में सिर्फ पैदाइसी कामचोरों को ही रखना है। बनावटी और समय के साथ बदल जाने वाले कामचोरों को अपने आसपास भी नहीं फटकने देना है। आज इनसान उसी पर विश्वास करता है जो आँखों से दिखता है। सोचने, समझने का समय अब किसी के पास नहीं है अतः हम कामचोरों को भी अब अपनी कुर्सी में बैठना होगा। अपने व्यक्तिगत काम अब मोबाइल के सहारे दफ्तर से ही करना पड़ेगा। एक बात और… हम लोगों को मेहनत करते हुए दिखना है, मेहनत करने की आदत नहीं डालनी है वरना हमारी प्रजाति ही समाप्त हो जाएगी। ‘मैंने यह सब बातें अपनी कार्यकारिणी से कही।

रंगीला साहब की जय! …रंगीला साहब अमर रहे! …अफसर हमारा कैसा हो, रंगीला प्रसाद जैसा हो! …रंगीला साहब आप संघर्ष करो, हम आपके साथ हैं!

सभाकक्ष में चारो तरफ यह नारे गूँजने लगे। मैंने मुस्कुराकर अभिवादन स्वीकार किया। आज थोड़े समय के लिए मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो धरती और स्वर्ग के बीच सिर्फ और सिर्फ मैं हूँ, सच में!

सब कुछ मन के मुताबिक ही चल रहा था कि अचानक मैं जमीन पर पटक दिया गया हूँ। मैं बहुत दुखी हो गया हूँ, पर रो नहीं रहा हूँ। भगवान लगता है दलाई साहब और मुझसे, दोनों से खुश नहीं है। दलाई साहब का तबादला हो गया है। इस बार भी मैंने बहुत तरह के प्रयास किए पर मेरा कोई भी उपाय सफल नहीं हो पाया है। हवन में खर्च हुए पैसे इस बार बेकार चले गए हैं। दलाई प्रसाद को जाना पड़ा है और उनकी जगह श्री नारायण राव आ गए हैं जो बेहद कड़क मिजाज के ईमानदार अफसर के रूप में जाने जाते हैं।

यानि कि मेरे और मेरी सेना के किसी काम के नहीं हैं।

पूरी की पूरी रंगीला सेना ने अपने आप को फिर से बदल लिया है…, और कर भी क्या सकते हैं बेचारे! इन लोगों ने अपने ऊपर विनम्रता और धैर्यशीलता का एक चोला पहन लिया है। मुस्कान को लिपिस्टिक की तरह अपने ओंठों से चिपका लिया है। यह शांत इतने हो गए हैं, मानो कि स्थितिप्रज्ञ अवस्था को प्राप्त कर लिए हों। विनम्र ऐसे हो गए हैं कि मानो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को चुनौती दे रहे हों। मजबूरी में सभी के साथ यह लोग अचानक अच्छा व्यवहार करने लगे हैं। धैर्य इनके अंदर इतना आ गया है, जैसे कि वह चकवे की तरह पानी की पहली बूँदों यानि की अपने जैसे ही किसी अफसर के लिए इंतजार कर रहे हों।

इनकी यह दशा मुझसे देखी नहीं जाती है। मुझे पता है, कितनी तकलीफ होती है यह सब करने में। एक नई दुल्हन से भी ज्यादा एडजस्ट करना पड़ता है। हर नया बॉस हम लोगों के लिए नई ससुराल की तरह होता है।

दफ्तर के सभी लोग श्री दलाई साहब के जाने से बहुत खुश हैं। सब लोग समझ रहे हैं कि अब मेरा खौफ कुछ कम हो जाएगा। कुछ लोग तो यह भी मानकर चल रहे हैं कि अब मैं भी यहाँ से चला जाऊँगा। आप भी यही सोच रहें होंगे… है न? खैर! उम्मीद पर ही तो दुनिया टिकी है। सब अपने लिए ही सोचता है। सभी गधे मिलकर फिर से काम करने लगे हैं। काम तो यह पहले भी करते थे पर तब इनका मुँह फूला रहता था। सब दुखी और दबे रहते थे। अब मुस्कुराने लगे हैं, कुछ तो खिलखिलाते भी हैं।

पर लोग इस बात को न भूलें कि समय बदलता है… मैं फिर से लौट के आऊँगा, एक नए रंग के साथ क्योंकि रंगीला किसी न किसी रूप में आप सबके अंदर घात लगाए बैठा रहता है और मौका मिलते ही बाहर आ जाता है!

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