अरुणेश नीरन  ARUNESH NIRAN

गद्य कवियों का निकष है, निबंध हिंदी गद्य का निकष है। आधुनिक हिंदी का निर्माण भारतेंदु के समय निबंध से ही शुरू हुआ, दूसरे संपूर्ण भारतीय चिंतन इस माध्यम से ही मुखरित हुआ। कवि-कर्म को कसौटी आज भी निबंध है। कवि को संवेदन सघनता और छंद का सहारा होता है पर, इन दोनों के प्रलोभनों को नियंत्रित करके आंतरिक लयबद्धता की ओर अपने को पूर्ण लय में संपृक्त कराते हुए भी, बीच-बीच में अपने को अलग कर देने की अपेक्षा निबंधकार से की जाती है। निबंध एक ऐसी विधा है कि इसमें प्राथमिक कक्षा के निबंधों से लेकर शोध-निबंध भी आते हैं, विचार प्रधान निबंध भी। और इस समय, जब विधाएँ टूट रही हैं, एक-दूसरे का अतिक्रमण करते हुए एक-दूसरे में प्रवेश कर रही हैं तब डायरी, संस्मरण, रिपोर्ताज, शब्द-चित्र भी इसी के अंतर्गत लिए जा सकते हैं। हिंदी आलोचना के खतियान का यह उत्कर्ष है।

लेकिन जिस निबंध को निबंध की कसौटी या उत्कर्ष माना जाता है, वह है ललित या व्यक्ति व्यंजक निबंध। यह गद्य की निहायत रम्य और आत्मीय विधा है। यह व्यक्ति की स्वाधीन चिंता का सहज रूपांतरण है और बतरस वाली इसकी मुक्त और उच्छल प्रकृति में लालित्य का सहज उल्लास मिलता है। संवेदना की दीप्ति में जो लालित्य होता है या जो भाव-संवाद नैसर्गिक बल कहीं में मिलता है वह ज्ञान-गुमान और शास्त्र-चिंतन के बोझ-तले दब जाता है। बतरस जैसी स्वच्छंद प्रकृति होती है ललित निबंध की। विधा की अर्गला से मुक्त लेकिन भाव की अर्गला से श्रृंखलित और अनुशासित। गपशप की ललित मुद्रा प्रज्ञा को आलोकित करनेवाले कोण की रचना करती रहती है और तभी बतकही की बात-बात में निकलने वाली बात, एक निरर्थक आलाप-विलाप-संलाप न होकर संवाद के विशिष्ट आस्वाद से संपन्न होती है।

आदरणीय हजारी प्रसाद द्विवेदी की निबंधकार की रचना-प्रक्रिया पर टिप्पणी है, ‘व्यक्तिगत निबंध का लेखक किसी एक विषय को छेड़ता है, किंतु जिस प्रकार वीणा के एक तार छेड़ने से बाकी सभी तार स्वतः झंकृत हो उठते हैं, उसी प्रकार उस विषय को छूते ही लेखक की चित्त-भूमि पर बँधे हुए सैकड़ों विचार बज उठते हैं।’ शास्त्र, लोक, मिथक सब आते हैं ललित निबंध में लेकिन शास्त्रीय मुद्रा में नहीं, सुर्तीठोंक मुद्रा में। यह लोक मुद्रा है और लोक में सब आते हैं, पशु-पक्षी जीव-जंतु, धरती-आकाश और जन-मन। इसीलिए ललित निबंधों में सब आते हैं कृतिकार के सृजनात्मक आकाश में पक्षी की तरह उड़ते हुए। द्विवेदी जी इसे ‘गप्प’ कहते हैं। ‘देवदारु’ में वे लकड़ी से भूत भगाने वाले पंडित जी कहानी सुनाने के बाद ‘गप्पा’ की महिमा-बखान करते हैं – ‘आदिकाल से मनुष्य गप्प हाकता आ रहा है, अब भी रचे जा रहा है। आजकल हम लोग ऐतिहासिक युग में जीने का दावा करते हैं। पुरखा मनुष्य ‘मिथकीय’ युग में रहता था, जहाँ वह भाषा के माध्यम को अपूर्ण समझता था। मिथक – गप्पें, भाषा की अपूर्णता को भरने का प्रयास हैं।’ भाषा बुरी तरह अर्थ से बँधी होती है। मिथक स्वच्छंद-विचरण करता है। आश्रय लेता है भाषा का, अभिव्यक्त करता है भाषातीत को। मिथकीय आवरणों को हटाकर उसे तथ्यानुयायी अर्थ देने वाले लोग मनोवैज्ञानिक कहलाते हैं, आवरणों की सार्वभौम रचनात्मकता को पहचानने वाले कला समीक्षक कहलाते हैं। दोनों को भाषा का सहारा लेना पड़ता है, दोनों धोखा खाते हैं। भूत तो सरसों में है। जो सत्य है, वह सर्जना शक्ति के सुनहरे पात्र में मुँह बंद किए ढँका-ही रह जाता है। एक-पर-एक गप्पों की परतें जमती जा रही हैं। सारी चमक सीपी की चमक में चाँदी देखने की तरह मन का अभ्यास मात्र है। गप्प कहाँ नहीं है, क्या नहीं है।’

साहित्य, सहित का भाव है। जो हित के साथ हो वह सहित। ‘हित’ की सूक्ष्म अर्थच्छटाओं में जाते हुए काशी के पंडित पट्टाभिराम शास्त्री ने उसके अर्थ किए – सहित, रस से सहित होना। पिहित – अर्थात ढँका हुआ हिरण्यमय पात्र से सत्य का मुँह हमेशा ढँका होता है। बड़े तीव्र सावित्र प्रकाश को पुकार लगानी पड़ती है कि सविता इसे ऐसा तपाओ कि ढक्कन खुल जाय। साहित्य में सत्य इसीलिए विहित रखा गया कि जिसका चित्र अनुभव के प्रकाश से अभिशप्त न हुआ हो, वह इस ढक्कन को उखाड़ न सके और सत्य का पूरा साक्षात्कार वह न कर सके। आधा गृहीत हो, आधा न गृहीत हो, कुछ दिखे, कुछ न दिखे – जब तक यह न दिखे हो तब तक साहित्य में पुनः पुनः आवर्तित होने की क्षमता कैसे आएगी? तुलसीदास ने ‘ज्यों मुखु मुकुरु मुकरु निज मानी, गति न जाइ अस अद्‍भुत बानी’ में वाणी की अपूर्णतता की बात की है कि अपने हाथ में आईना हो और उसमें अपने मुख का प्रतिबिंब पड़ रहा हो, आप अपने मुख को पकड़ना चाहें, पकड़ नहीं सकते। आईने को उलटिए-पुलटिए बस वह दिखेगा, पकड़ में नहीं आएगा। गप्प में शब्द का पूरा अर्थ पकड़ में नहीं आता, कुछ न कुछ छूट जाता है। छूट जाता है तब भी दूसरे चेहरे उसमें आते हैं लेकिन वे भी पकड़ में नहीं आते।

बालमुकुंद गुप्त का एक लेख है ‘भँगेड़ी शिवशंभु’। ‘भँगेड़ी शिवशंभु’ का लक्ष्य विवेक, कभी शिथिल नहीं होता, ठीक वैसे ही बाहर से कोरा वाग-विलास प्रतीत होने वाले व्यक्तिव्यंजक निबंध का आधार नहीं छोड़ते। ‘भँगेड़ी शिवशंभु’ भंग के नशे में जिस विचार-सूत्र के प्रभाव में ऊँची उड़ान भरता है, वह साम्राज्यवाद के प्रति तीव्र युयुत्सा का भाव है। नशे की गहराई और विचार-धरातल की ऊँचाई का निर्वाह बालमुकुंद गुप्त बड़ी जागरूकता से करते हैं।

ललित या व्यक्ति व्यंजक निबंधों को अलग नाम देने का मुख्य कारण क्या था? कारण यह था कि इससे उन दूसरी अपेक्षाओं की काट हो जाएगी, जो निबंध के नाम से जाग उठतीं। हम निबंधों से विचार-वस्तु की अपेक्षा रखते, इतिहास और शास्त्र-चर्चा की अपेक्षा रख सकते। अज्ञेय कहते हैं, ‘ललित निबंध को ललित इसलिए कहा गया कि उससे ऐसी कोई अपेक्षा न की जाय।’ ललित निबंधों में सर्जनात्मकता पर बल है। सर्जनात्मक गद्य अच्छा गद्य होता है। उस पर व्यक्तित्व की छाप होती है जिससे अलग करके उस पर विचार नहीं किया जा सकता।

हिंदी गद्य के आरंभ काल से ही व्यक्तिव्यंजक निबंध लिखे जाते रहे हैं। तब से अब तक के लेखन में कुछ समान चीजें मिलती हैं – निस्संग फक्कड़पन के साथ आस-पास के जीवन से गहरा लगाव, भाषा के सभी धरातल पर उसकी संभावनाओं की खोज और नई भाषा रचने का उत्साह – नए शब्दों को गढ़ने, पुराने शब्दों को नया अर्थ देने, सामान्य जीवन के वाचक शब्दों और सामान्य मुहावरों को विशेष दीप्ति के साथ दमकाने का लक्ष्य, आधुनिक बोध – जो समसामायिक चेतना को कालातीत चेतना से जोड़ने का संकल्प लेकर ही उपस्थित होता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, माधव मिश्र, गुलेरी जी, अध्यापक पूर्ण सिंह और परवर्ती पीढ़ी के हजारी प्रसाद द्विवेदी, सियारामशरन गुप्त, महादेवी वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय, शिवप्रसाद सिंह, रमेशचंद्र शाह से लेकर श्रीराम परिहार तक और उसके बाद के भी निबंधकार, सभी ऊपर की विशेषताओं के किसी न किसी अनुपात के साझीदार हैं साथ ही ये सभी जीवन के बहुरूपी अनुभव के प्रमाता होने के कारण जीवन में भी उतने ही रमे हुए हैं, जितना अपने साहित्य बोध में, इसलिए इनमें एक सतरंगीपन मिलता है और वे बहुत आत्मीय हैं। उनमें एक विशेष प्रकार की उदासी मिलती है लेकिन वह एक गहरी संवेदना की उदासी है और उसकी खुशी समष्टि की उल्लसित चेतना का ज्वार है।

ललित निबंधों का भाषा से सरोकार कुछ ज्यादा-ही होता है। इसमें बहकने, बहकाने, बात को घुमाने, उसकी कहीं से कहीं पहुँचाने और द्विवेदी जी के शब्दों में बतरसने का सहारा लिया जाता है। इसलिए नहीं कि बहकाना या बतरसना अपने-आप में उद्देश्य है, बल्कि इन सबका एक-ही उद्देश्य है कि पाठक इनकी आत्मीयता की डोर में बँध जाय और उसकी ऐसी अंतरंगता हो जाय कि लेखक का परिवेश उसका अपना परिवेश हो जाए, लेखक के साझे की कहानियाँ उसके साझे की कहानियाँ हो जाय। उसके सामने उसकी देखी, अधदेखी या अनदेखी घटना आ जाय और प्रत्येक दिशा में उसे ऐसा लगे कि हमको दिखाया नहीं जा रहा है बल्कि हम स्वयं देख रहे हैं। इसलिए एक ओर तो निबंध लेखक सामान्य दैनंदिन जीवन की सामान्य घटना को बड़े सामन्य अनुभव से बात शुरू करेगा और उसे ऐसे बड़े संदर्भों से जोड़ देगा जो उसके पाठक की भी जातीय स्मृति में अंकित हो – वे संदर्भ उसके साहिय के हों, कला के हों या लोकवार्ता के हों।

उदाहरण के लिए द्विवेदी जी के निबंध ‘कुटज’ को लिया जा सकता है। वे यहाँ से शुरू करते हैं, ‘कुटज का फूल अधिकांश ने देखा नहीं है। एकाध ने देखा भी होगा तो भर-आँख नहीं देखा होगा और तब वे ले जाते है, कुटज के फूल तक और उसके ऐसे-ऐसे गुण बखानते हैं कि पाठक को लगने लगता है कि यह तो सचमुच नायाब चीज है। हमारा परिचय इससे पहले क्यों नहीं हुआ? खूब तो खिलता है जब बरसात आती है, जहाँ ऊसर जमीन होती है, कोई रस नहीं होता, नाटा-सा पेड़ फूलता है तो कितना सुंदर लगता है?

पंडित जी को जब विश्वास हो जाता है कि अब पाठक हमारे साथ हैं, तो वे उड़ जाते हैं। कालिदास का यक्ष बादल को जिस फूल से ‘अर्ध’ चढ़ाता है वह कुटज है। इस एक सूत्र से पाठक के मन में उत्सुकता जग जाती है और तब पंडित जी उसमें मनुष्य को लाते हैं, जो कभी हार नहीं मानता, कठिन से कठिन परिस्थितियों में कहीं भी रहता है, खड़ा रहता है, फूलता रहता है, तना रहता है, सबके उल्लास में उल्लसित रहता है। कुटज मनुष्य बन जाता है और मनुष्य कुटज। कविता में यही बात दूसरी तरह से व्यंजित की जा सकती थी, पर कविता व्यक्तित्व को विखंडित करके ही बात को उपस्थित कर सकती है जबकि निबंध व्यक्तित्व को साथ लिए चलता है – पर खंडित रूप में नहीं, छँटे हुए – तराशे हुए रूप में। व्यक्ति का विलय नहीं होता न उसके वैयक्तिक अनुभव का महत्व कहीं कम होता है, उसके परिवेश के शब्द, कथानक, स्मृतियाँ, गूँजें और अनुगूँजे निरंतर आत्मीय संबंध की स्थापना में सहायक होती है।

ललित निबंधकारों के त्रिविर हजारीप्रदास द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र, कुवेरनाथ राय व्यक्तित्व को साथ लिए चलते हैं और हाथ अलग करके भी। उनके लिए व्यक्तित्व वैयक्तिक स्तर पर संबंध स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम है। व्यक्तित्व के साथ यह संलग्नता कि वह माध्यम है, साधना से आती है। इसलिए हिंदी की लोकप्रिय विधा होने के बावजूद हिंदी में ललित निबंधकार थोड़े हैं और जो हैं उनकी भी ललित निबंध मुख्य विधा नहीं है।

निबंध को ‘गप्प’ कहने वाले हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध न केवल मुद्रा लालित्य में बेजोड़ है, बल्कि उनके वैचारिक धरातल तक पहुँच पाना साधारण प्रतिभा के लिए संभव नहीं है। इसी प्रकार मांतैन, चार्ल्स लैंब और गुलेरी जी का भरपूर स्वाद लेने के लिए यह जरूरी है कि पाठक विद्या-संस्कारी हो। कुट्टीचातन – अज्ञेय के निबंधों का व्यंग्य और लालित्य बहुश्रुत और अधीन व्यक्ति के लिए आस्वाद्य है। विद्यानिवास मिश्र में माटी-महिमा का जैसा उच्छल उल्लास और गतिमान वैदुष्य का जैसा सहज लालित्य दिखाई देता है वह भारतीय भाषा-परिदृश्य में विरल है। रमेशचंद्र शाह के निबंधों की रम्य मुद्रा आज भी प्रसन्न है, जो प्रमाण है इस विधायक स्थिति का, कि व्यक्तित्व की खोज की प्रवृत्ति और आत्मज्ञान की उन्मुक्त चेतना क्षीण नहीं हुई है। श्रीराम परिहार भय के बीच भरोसा तो दिलाते ही हैं, उनके निबंध बौराये बाग की तरह लालित्य-सौभाग्य से संपन्न हैं।

नामवर जी ने द्विवेदी जी के दूसरे प्रिय शब्द (पहला है ‘गप्प’) ‘छंद’ की चर्चा की है। इसका प्रयोग द्विवेदी जी विशिष्ट अर्थ में करते हैं। देवदारु का पेड़ उन्हें मूर्तिमान छंद मालूम होता है। ‘उसकी झबरीली टहनियाँ कटीले पत्तों के ऐसे लहरदार छंदों का वितान ताननी हैं कि छाया चेरी-सा अनुगमन करती है।’ फिर, ‘पेड़ क्या है, किसी सुलझे हुए कवि के चित्त का मूर्तिमान छंद है – धरती के आकर्षण को अभिभूत करके लहरतार वितान की श्रृंखला को सावधानी से सँभालता हुआ, विपुल व्योम की ओर एकाग्रीभूत मनोहर छंद। उनकी दृष्टि में यह अर्थातीत छंद है और इसीलिए अर्थातीत आंनद भी महादेव के तांडव के तुल्य।

उनके प्राणवेगी गद्य का एक उदाहरण पुनः ‘देवदारु’ से – ‘मगर कुछ लोग ऐसे होते हैं कि उन्हें सबै धान बाइस पसेरी दिखते हैं। वे लोग सबको एक-जैसा ही देखते हैं। उनके लिए वह खूँसट वह पाधा, वह सम, वह सनकी, वह झिंझोटा, वह झबरैला, वह चपरपेंगा, वह गदरौना, वह खितखिटा, वह झक्षी, वह झुमरैला, वह घोकरा, वह नटखटा, वह चुनमुन, वह बाँकुरा, वह चौरंगी सब समान है।’ देशज और तद्भव विशेषणों की यह सूची लहालोट करने वाली है। छंद द्विवेदी जी की मज्जा में हैं। ‘गप्प’ और छंदमयता के कारण द्विवेदी जी के निबंधों से एक अनुगूँज आती है जो बहुत देर तक भीतर गूँजती रहती है। पता नहीं चलता कि ये विचार की तरंगें हैं या प्रकाश की लहरें। इसीलिए इनकी लयकारी और लहरदारी इतनी मोहक है।

विद्यानिवास मिश्र में ‘संद्यःसीरोत्कर्षण सुरभि’ (ताजा जुते खेत की गंध) आती है। सर्जनात्मक गद्य से मंडित उनके निबंधों में उनका अनुभव-संसार इतना विस्तृत और बहुरंगी है कि आश्चर्य होता है अपने निबंधों के बारे में उनकी कुछ विशिष्ट मान्यताएँ हैं। उनका कहना है कि एक व्यक्तिव्यंजक निबंध व्यक्ति का व्यंजक नहीं है, व्यक्ति के माध्यम से व्यंजित है। जो कुछ अनुभव के दायरे में आता है – ऐंद्रिय या अतींद्रिय – किसी भी अनुभव के, उसे निबंधकार लोगों तक पहुँचा पाने वाली भाषा की कड़ाही में झोंक देता है। जो पककर निकलता है वह व्यक्तिव्यंजक निबंध है अराजक मुद्रा में मुखर होकर भी निबंध में रचना का बुनियादी अनुशासन होता है। व्यक्तिव्यंजक निबंध केवल सतह पर तर्कहीन होता है, अन्यथा उसमें सतह पर तर्क होता है, उसमें सतह पर तर्क का उपहास होता है, कुतर्क का उपयोग होता है, उसमें अनर्गल तर्क दिए जाते हैं। पर यह सब इसलिए कि पाठक महसूस करने लगे कि इस तर्क से भिन्न संगीत की तलाश करनी चाहिए। एक उदाहरण है अज्ञेय का निबंध ‘मार्गदर्शन’। आदमी रास्ता पूछता है लेकिन कोई सही रास्ता नहीं बताता जो बताता भी है वह उस ओर इशारा करता है जिस ओर नहीं जाना है। मार्गदर्शन के आलावा सारी चीजें हैं। मार्ग का अदर्शन ही सब-कुछ हो जाता है। मार्गदर्शन प्रश्नचिह्न बन कर रह जाता है। पाठक को अपने आप एक अन्विति दिखती है कि इस सारी उलझन और परेशानी में एक ही प्रतीयमान है कि मार्ग का दिखना कठिन है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी और विद्यानिवास मिश्र इसकी बुनावट का एक महत्वपूर्ण बिंदु शब्द-चयन को मानते हैं। इस प्रक्रिया में वे शब्दों से खेलते हैं और एक-एक शब्द की अर्थक्रीड़ा में दूर तक रस लेते हैं। आम्र और कुटज, अशोक और देवरारु में इतिहास की परतों को खोलने में द्विवेदी जी ऐसा रस लेते हैं कि पाठक लहालोट हो जाता है। विद्यानिवास जी पर्वो और उत्सवों पर लिखते हुए उनकी गाँठें खोलते हैं। दोनों की प्राण-नाड़ी गाँव ने रची है। जन्म-गाँव और पड़ोसी गाँव के चेहरे-चरित्र, साँवली मिट्टी की शोभा-सुरभि, जातीय तीज-त्यौहार के उल्लास की उद्दाम लहरों का आस्वाद और अपनी धरती के जुझारू पौरुष तथा संघर्षप्रियता का विरल तेज उनके मन में हमेशा बसा रहता है। गाँव की संवेदना उनकी संवेदना है, जो मूल्यों और समष्टि से संसिक्त होती है।

कुबेरनाथ राय के निबंधों को तमस के घटाटोप में संवेदना की रोशनी रचती है। आज गाँव-शहर-मनुष्य ने अपना मूल धरातल छोड़ दिया है। इसलिए तमस अपने डरावने रूप में खेत-खलिहान, आँगन-बगीचे, और राह-बाट में हर क्षण चीत्कार करता रहता है। कूट मुहावरों की व्यंजना पकड़ में नहीं आती और जब खुलती है तो डर लगता है। अपनी मिट्टी ही पराई लगने लगती है। यह परायापन उदास करता है इसलिए ललित निबंधों में एक स्थायी उदासी का भाव छाया रहता है।

ललित और व्यक्तिव्यंजक निबंधों के सभी प्रमुख निबंधकार पूर्वांचल के भोजपुरी क्षेत्र से आते हैं। द्विवेदी जी, विद्यानिवास मिश्र, शिवप्रसाद सिंह, कृष्णबिहारी मिश्र सब इसी क्षेत्र के हैं। कुबेरनाथ राय की भी यही धरती है। इन सभी ने अपने अध्ययन के साथ संस्कृत से गहरा संबंध जोड़ा था तो दूसरी ओर अपनी आंचलिक बोली के माध्यम से आंचलिक जीवन के साथ अटूट संबंध जोड़े रखा। इसीलिए उनकी निबंध-भाषा में एक ओर संस्कृत थी तो दूसरी ओर बोली की छटा जगमगाती रही। इनके पहले के जो निबंधकार थे, जैसे गुलेरी जी और बाबू गुलाब राय, आरंभ से ही खड़ी बोली में पले थे, उनकी भाषा में जिस बोली की सहजता लक्षित होती वह बोली भी वही थी, जो वह लिख रहे थे। इसलिए उनकी भाषा में किसी विशेष रंगत की खुशबू नहीं मिलती। रमेशचंद्र शाह के पास भी एक भाषा है जो खेलती नहीं, कहती है क्योंकि उसके पास कहने को बहुत कुछ है – ऐसा बहुत कुछ, जो स्वयं राग रंजित है इसलिए रंजित भाषा की अपेक्षा नहीं रखता।

चूँकि यह एक सर्जनात्मक विद्या है इसलिए वह निर्बंध चिंतन को ही नहीं, निर्बंध कल्पना को खुली छूट देता है। वह कल्पना ही तो है जो चिंतन को निर्बंध करती है और इसीलिए चिंतन की निर्बंधता व्यक्तिव्यंजक हो जाती है। कल्पना अगर मुक्त है तो उसे किसी क्षेत्र-विशेष के साथ जोड़ना कोई विशेष अर्थ नहीं रखता, लेकिन कल्पना जो बिंब उभारती है उसका स्रोत भले ही कहीं झाँकते हों स्वस्थ मानसिकता वाले चरित्रों के माध्यम से वे पूरे समाज को बदलने-सुधारने का संकल्प लिए हुए है। शाह के निबंधों में रूढ़ियों के सम्मोहन के प्रति प्रेम नहीं एक वितृष्णा का भाव है जो उन्हे निरंतर मानव की विकास यात्रा के अग्रिम चरणों से जोड़ता है। वे कहीं रूमानियत के शिकार नहीं हुए हैं इसीलिए वे कुबेरनाथ राय की तरह सम्मोहनों से अपने को तोड़ पाने में असमर्थ नहीं हैं।

साहित्य भी विधा के रूप में हिंदी ललित निबंध संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश की कथा – विशेष रूप से ‘आख्यायिका’ का उत्तराधिकारी है और वह इसलिए कि प्रकृति एवम मानव-जीवन में एक विंबानुविंव-भाव देखने का अभ्यासी है। पश्चिम में प्रकृतिपरक निबंधों में यह बात नहीं मिलती। प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण उसमें जरूर मिलता है और उसमें रमने की उत्कंठा भी मिलती है लेकिन उसके साथ गहरा तादात्म्य नहीं मिलता। हिंदी में प्रकृति में घटित होने वाले परिवर्तनों में मानव-जीवन-संवत्सर का जैसा आवर्तन देखने का भाव है वह भी वहाँ नहीं मिलता हिंदी ललित निबंध की वैचारिक पृष्ठभूमि की तीन विशेषताएँ हैं – अखंड विश्व-दृष्टि, मुक्त फक्कड़ भाव, सामान्य में निगूढ़तम वैशिष्ट्‍य की तलाश। इस वैचारिक पीठिका को भूल कर लोग शैली को ही निबंध मान लेते हैं और विचार को निबंध के लिए गौण। लेकिन वे भूल जाते हैं कि सर्जन के क्षण में विचार या भाव में विश्लेष या विलगाव असंभव है। सर्जनात्मक साहित्य भाव और विचार का ऐक्य मात्र है। विचार प्रधान निबंध भी सर्जनात्मक हो सकते हैं जैसे आ. रामचंद्र शुक्ल के निबंध। विचार प्रधान निबंध में भी भावना तिरोहित नहीं होती, उसका एक भिन्न प्रकार का बौद्धिक संस्कार होता है। वहाँ समस्त रागात्मकता बुद्धि-रूप में परिणत हो जाती है। इस प्रकार दोनों में भाव भी हैं, विचार भी हैं। दूसरा अंतर यह है कि ललित निबंध तर्क से मनवाने की कोशिश नहीं करता, विचारप्रधान के लिए तर्क एक प्रधान साधन है। चाहे वह तर्क से यही सिद्ध करे कि बहुत कुछ शेष रह जाता है, जो तर्क से परे है।

हिंदी के महत्वपूर्ण ललित निबंधकारों में गाँव की मिट्टी का महत्व ज्यादा है। जैसे कुम्हार मिट्टी के बर्तन या खिलौने बना कर, पकने से पहले उन्हें चिकनी मिट्टी का ओप देता है, उसी तरह द्विवेदी जी, विद्यानिवास जी, कुबेरनाथ राय, कृष्णबिहारी मिश्र, शिवप्रसाद सिंह आदि अपने ललित निबंधों को गाँव के सीधे मुहावरे का ओप देते हैं जिससे पकने पर उनमें एक विशिष्ट चमक आ जाती है। इनमें प्रथम तीन देहाती मिट्टी के ओप के बाद फिर संस्कृत के खनिजों से भी उसे अलंकृत करते हैं। बावजूद इसके, एक अनलंकृत भोलापन भी उनमें मिलता है।

रमेशचंद्र शाह जड़ों की तलाश करते हैं तो जड़ खोदकर नहीं, अपनी प्राणनाड़ी का संधान करते हुए करते हैं। वे समस्त जातीय चेतना के रसग्राही स्रोत में धँसी हुई जड़ की खोज करते हैं और अधूरेपन से उद्विग्न होकर समग्र का चित्र अंकित करने के लिए स्वप्नाविष्ट होते हैं। उनमें विभाजन नहीं है, संशय नहीं है, चित्त के दो पाटों के बीच जीने का, ‘दारुण दुसःह दुख’ को न्यौत कर समग्र होने के लिए विभक्त होने का संकल्प है। यह संवेदनशील जागरूक लेखक की नियति है। ऐसे लेखक को लीक की नहीं, परंपरा की चिंता होती है, क्योंकि परंपरा और आगे जाने की राह है। वह श्रेष्ठतर की, परत्तर की तलाश है, वह पराये से भी पराये को आत्मीय बनाने की चुनौती है। वह आत्म के जरिए अध्यात्म तक पहुँचते हैं।

ललित निबंध के त्रिविर और अन्य निबंधकारों ने हिंदी गद्य की सत्ता को एक नई ऊँचाई, एक नया रूप दिया है। अवसाद और भय के बीच भरोसा लिए इन निबंधकारों ने अपने सर्जनशील स्पर्श से उस बुझती हुई आग को फिर-से चेताया है जो धुँधुँआती है तो धुँआ उठता है और जब जलती है तो वह सब प्रकाशित हो जाता है जो धुंध, धूल और धुएँ में खोया हुआ है। आश्वस्ति की संभावनापूर्ण आवाज को उठाने में गद्य बहुत आगे रहा है, ललित निबंध उससे भी आगे है।

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