ज़िंदगी इक पहेली है
अनदेखी इक सहेली है
कही बेबाक़ नादानियाँ है
कही थोडी बचकानियां है
खुशियों की बरसात है
वही ग़मो का अन्धेरा है
कही तपती धूप है
तो कही नीम की छाँव है
हसरतें है इसमें
बचपन की ललक है इसमें
ज़िंदगी क्या है

चले तो उम्र भर की हमसफ़र है
वही पल दो पल की हमराह
बस की भीड़ है ज़िंदगी
तो कही बुलेट ट्रेन की रफ़्तार है ज़िंदगी
स्कूल की मोहब्बत है
अधूरी
तो कॉलेज की आज़ादी है ज़िंदगी
किसी शायर की मयखाने की वो शाम है ज़िंदगी तो
कभी उस ने सराय में गुज़ारी, वो रात है ज़िंदगी
बदलते हालात की तस्वीर है
तो कही अंधेरों में दिखाई देती एक रोशनी की झलक है ज़िंदगी
लफ्ज कम पड़  रहे है
कभी ना खत्म हो
वो कहानी है ज़िंदगी
मेने जो लिखी
वो तो बस लफज़ो की रुमानी है ज़िंदगी

© अजनबी राजा (राजेश मिडल )

रामदेव  कोलोनी, केरू
जोधपुर
राजस्थान

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