१-

अलिफ से अल्लाह जो कहे ,
और ॐ कहे दिल से ,
उनसे कहें , मस्जिद मंदिर ,
तुम्हारी चले फिर से ,
हमें उनसे करो आज़ाद जो ,
इंसान को देखें घिन से ,
थक गए हैं , पक गए हैं ,
धर्मांधों के सितम से ,
तुम लड़ो तो लड़ो खुद के लिए ,
भूख प्यास , हद के लिए ,
पर बदनाम न करो राम , खुदा ,
राक्षसी , शैतानी इलम से ,
इससे तो है जंगल ही भला , बिन इमारत ,
आज़ाद हर ज़ुल्म से !!

२-

दरख्तों पे शामें आई , परिंदों की थकानें आयीं ,
और आई कहानियों की बलाएँ , बेताल ,
और मैं खाली निहारूं , खाली खाली चौपाल ,
मैंने काँधे पे दिन ढोया जो , कौन सुनें उसका हाल ?
अब बतियानें को न दिल है न , चुहिल बाज़ी को जवानीं ,
गाँव में भी पसरा है , टी वी , मोबाइल , इण्टर नैट शैतानी ,
अब खींचता नहीं आँचल किसी का कोई ,
न रखता कोई कंधे पे हाथ ,
निकल जाती है बिना झूले बरसात ,
न कोई बंसी की धुन , न आरती , अलाप ,
रचना , गाना , नाचना नचाना , अब बिसरी बात ,
लोक गीत लगते है मशीनी , दिल का न कोई रंग ,
हो चली हैं शामें मदिरा में , डूब , बस बदरंग ,
और मैं घिरते अंधेरों में ग़ुम हो चला हूँ ,
जैसे साये , दरख्तों के , दरख्तों में ही हो चले इकसार ,
दरख्तों पे शामें आई , परिंदों की थकानें आयीं ,
और आई कहानियों की बलाएँ , बेताल ,
और मैं खाली निहारूं , खाली खाली चौपाल !!

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