मेरी मुन्नी का कमरा – तरुण कुमार

मेरी मुन्नी का कमरा
वो टेडी बियर पूछता है मुझसे तुम्हारा पता,
गुमसुम सा तकता वो रेसिंग कारे,
वो काठ का घोड़ा, वो गुडिया के उतरे कपडे,
जो सोती थी दुबक कर मुन्नी के साथ, कबसे वैसे पड़ी है ,
मुन्नी तुम्हारे कमरे में सबसे बेह्टर और बोलती हैं दीवारें,

तुम्हारी पेंटिंग्स के आगे एम् ऍफ़, पिकासों हैं फीके,
मेरा अजंता, एलोरा यही हैं,
मुन्नी ये दीवारें हैं खाली इनमे फिर आकर लिख दो कोई शिकायत,
तुम कर दो कोई फरमाइश, तुम लिख दो इन दीवारों पर अपनी चाहत मैं भर दूंगा,

नहीं

तुम भर दो आकर इस घर को अपनी किलकारियों से, अपनी तोतली जुबां से,
तेरे कमरे के सारे खिलोने नाच उठेंगे,
तेरे जाने से ये सब खामोश हैं, जैसे करते हों मुझसे शिकायत,
तुम आके इनको बता दो कंहा हो, मैं तुम्हारा बाबा रंगों को लेकर कबसे खड़ा हूँ,
आओ रंग दो इस घर को अपने ढंग से,

वो टेडी बियर पूछता है मुझसे तुम्हारा पता,
मुझे मालूम है कैसे रंगी हैं तुमने ये दीवारें,
कोई रंग ऐसा नहीं है जहां मैं,
वो चाकलेट से स्केच एलिफेंट,
वो पीली मिट्टी और कोयले से खींची अनगिनत लाइने थी
कल तक यंहा पर सब मैंने गिन डाली,
तुम्हारी मम्मी ने नहीं की कम कलाकारी,
उन्हें पोंछने की कोशिश में आयें हैं जो धब्बे,
वो भी अजन्ता एलोरा की लाते हैं यादें,

तुम अपनी अम्मी को लेकर चली आओ मुन्नी,
ये दीवारो दर अब तक खुले हैं,
इन्हें आकर रंग दो, मेरी गोद भर दो,
मुझे प्यारी सी पप्पी दे दो,
वो टेडी बियर पूछता हैं मुझसे तुम्हारा पता ।


तरुण कुमार
तरुण कुमार
१४ फरवरी १९९४

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2 विचार “मेरी मुन्नी का कमरा – तरुण कुमार&rdquo पर;

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