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अब मैं पुश्तैनी घर कहा जाता हूँ ।
हाँ मैं तुम्हारे पुरखों को पनाह दिया करता था।
अब तुम्हारी राह तकने का गुनाह किया करता हूँ ।
हाँ मैंने तुम्हारे पुरखों की किलकारियाँ भी सुनी हैं यहाँ ।
अब तुम्हारे बच्चों के आने की राह तकता हूँ ।।1।।

अब मैं पुश्तैनी घर कहा जाता हूँ ।
मेरे दरवाजों, दीवारों, गवाक्षों, दालानों, बरामदों, छज्जों में,
मेरे पिछवाड़े के छोटे मकानों, अगवाड़े के उद्यानों में,
तुम्हारे नन्हे बचपन की छुअन आज भी ताज़ी है ।
अब तुम्हारे एक धक्के से द्वार खुलने की आस रखता हूँ ।।2।।

अब मैं पुश्तैनी घर कहा जाता हूँ ।
मेरे संग संग वो आम, जामुन, अमरुद, अनार, बरगद, पीपल, बेर, बेल, हरसिंगार, कचनार
तुम्हारे नटखट विनोद आज भी बिसरा नहीं पाते ।
अब तुम्हारे बच्चों के संग खेलने की चाह रखता हूँ ।।3।।

अब मैं पुश्तैनी घर कहा जाता हूँ ।
जानता हूँ कि अब कोई जन्मोत्सव मनेगा नहीं यहाँ,
न कोई डोली उठेगी, न बारात सजेगी कभी
मैंने तुम्हारे पुरखों की आखरी अर्थी को उठाया था ।
अब किसी को काँधा भी न दे पाने का सच समझता हूँ ।।4।।

अब मैं पुश्तैनी घर कहा जाता हूँ ।
तुम्हारी तरह उन दरख्तों के बाशिंदे परिंदे भी
नहीं आया करते,
मर्कटों, चमगादड़ों, उलूकों, गिरगटों, सर्पों का आशियाना हूँ,
जो अपने अनादि होने का घमण्ड किया करता था ।
अब अकस्मात् अंत की आशंका से सहम जाता हूँ ।।5।।

अब मैं पुश्तैनी घर कहा जाता हूँ ।
हो चुका हूँ बूढ़ा मैं जानता हूँ अपना यह सच
मेरे पड़ोसी की तरह किसी दिन मेरी भी मौत आएगी,
बिक जाऊँगा, मिट जाउँगा, तुम्हें धनवान बना जाउँगा,
एक विशाल इमारत को मेरी लाश पर सजा देख पाता हूँ ।।6।।

अब मैं पुश्तैनी घर कहा जाता हूँ ।
सोचता हूं मेरे बाद तुम्हारी संतति पुश्तैनी होना नहीं जान पाएगी,
उस इमारत में वो दम नहीं कि पुश्तैनी होने का भार सह पाएगी,
कब अचानक हवा के हल्के झोंके से मेरी ही लाश पर ढह जाएगी,
चलो सौभाग्यशाली हूँ पुश्तैनी होने का कर्ज चुका जाता हूँ ।।7।।

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रचनाः डॉ. शुभ्रता मिश्रा
स्वतंत्र लेखिका
204, सनसेट लगून, विज़ी बी स्कूल के पास
बायना, वास्को-द-गामा
गोवा-403802

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