ज़िन्दगानी के भी कैसे-कैसे मंज़र हो गए – बलजीत सिंह मुन्तज़िर

ज़िन्दगानी के भी कैसे-कैसे मंज़र[1] हो गए ।
बे-सरोसामाँ[2] तो थे ही, अब तो बेघर हो गए ।

तुमसे मिलने पर बड़े आशुफ़्तासर[3] थे उन दिनों,
तुमसे बिछड़े तो हमारे दर्द बेहतर हो गए ।

एक क़तरे[4] भर की आँखों में थी उनकी हैसियत,
अश्क[5] जब पलकों से निकले तो समन्दर हो गए ।

कितनी बे-परवाह उड़ानों में थी पहले ज़िन्दगी,
जब ज़मीँ पाई परिन्दे दिल के बे-पर[6] हो गए ।

मौसम दयारे यार[7] का बदला भी तो कुछ इस तरहा,
जो ख़ुद मिसालें[8] थे बहारों की वो पतझर हो गए ।

आशनाई[9] के मुरव्वत[10] दौर में यूँ भी हुआ,
बे-मुरव्वत[11] लोग भी हमदर्द[12] अक्सर हो गए ।

बे-पनाह[13] तन्हाइयों की शाख़[14] से लिपटे हुए,
जो भी गुल उम्मीद के थे नामे दिलबर[15] हो गए ।

कितने तो अरमान दिल में सीfपयों से बन्द थे,
जब खुली राहें वफ़ाओं की तो गौहर[16] हो गए ।

थे बहुत ज़रख़ेज़[17] सपने, सब्ज़[18] थे एहसास भी
पर हक़ीक़त के क़हत[19] से सब ही बंजर हो गए ।।

Baljeet Singh.jpg

शब्दार्थ:

1- हालात, परिदृश्य, 2-सामान रहित, 3-खुश, आनन्दित, 4-बून्द, 5-आँसू, 6-पंख रहित

7-माशूक का घर, 8-उदाहरण, 9-मित्रता, 10-कृपा, दया, 11-कृपाहीन, 12-दुःख के साथी

13-आश्रयहीन, 14-टहनी, 15-माशूक के नाम, 16-मोती, 17-उपजाऊ, 18-हरे-भरे

19-अकाल, दुfर्भक्ष

 

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