क़दमताल करती है औरत
कभी तेज़ कभी धीमे
जैसी बजती है धुन
नाचती है उसपर
कभी हँस कर
कभी रो कर

पाँवों को एक क्रम से
उठाने-बिठाने के
उसके बेढब प्रयासों को देखते
उससे बड़ी उम्र की एक औरत
मुँह बिचकाती है

उसके पल्लू को
अँगुली से लिपेटती
साथ-साथ ठुमकती है
घर की एक
छोटी औरत

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चंद्र रेखा ढडवाल

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