उगती है देह उसकी हथेली पर
वह मुट्ठी भींच लेती है

उगती है देह उसकी आंखों में
दिखता है लहराता लाल गुलाब
पौधा नहीं दिखता
कसकर मींच लेती है आंखें
चुभते हैं कांटे
झपक कर रोकती है आंसू

गुलाब भीतर खींच लेती है
उगती है देह
उसके बालों की महक में
उचक कर बैठ जाती है माथे पर
ढंकती है इधर तो
बौखलाया उधर दिखने लगता है

कस कर बांधती है चोटी
तो उसकी सलवटों में उगती है देह
देह कभी पीछे
कभी आगे उगती है
बार-बार उसे पीछे खींचती लड़की
हांफती है
पसीने से भीगते हैं वक्ष
देह उन पर उतराती है…!

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जया जादवानी

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