बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना
है हरसू उदासी तुम्ही कुछ कहो ना

मैं पतझड़ का मौसम हूँ चुप ही रहा हूँ
ओ गुलशन के वासी! तुम्ही कुछ कहो ना

कि ढलने को आई शबे-गम ये आधी
है बाकी ज़रा-सी तुम्ही कुछ कहो ना

समाकर समंदर में भी रह गयी है
लहर एक प्यासी तुम्ही कुछ कहो ना

मेरे दिल में तुम हो कहीं ये ज़माना
न ले ले तलाशी तुम्ही कुछ कहो ना

‘किरण’ बुझ न जाना,गमो की फिजा में
चली है हवा-सी तुम्ही कुछ कहो ना

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कविता किरण

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