श्रावण की कृष्ण-वर्णी,
पलकों में, अलकों में,
छलक-छलक जाता है,
बूँद-बूँद पानी!
तूलिका के मृदुस्पर्शी,
रेशों में, केशों में,
झलक-झलक जाती है,
अनकही कहानी!
मरुथल की अनबुझी,
तृष्णा- वितृष्णा की,
तुष्टि-संतुष्टि का,
समाधान पानी!
सृष्टि के, समष्टि के,
मूल पंच तत्वों का,
प्राणधन चंचल मन,
कितना अभिमानी!
श्रावण की कृष्ण-वर्णी,
पलकों में, अलकों में,
छलक-छलक जाता है,
बूँद-बूँद पानी!

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