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“ये है कन्हैया…एक वामपंथी नेता से पुरस्कार प्राप्त करते हुए…और यही से शायद इनकी वामपंथी विचारधारा की नींव पड़ी…ऐसा नही है कि मेरा संपर्क वामपंथियों से कभी नहीं रहा। बहुत करीब से जानता हूँ मैं वाम पंथी विचार धारा को| आज जहाँ कन्हैया खड़ा हुआ है…कभी उस जगह मैं भी खड़ा था और जानते है मुझे पुरस्कार में क्या मिला था- मार्क्स, एंगेल्स की बुक्स! जिसमें उनकी आइडियोलॉजी थी| ऐसी चार पुस्तके मुझे दी गयी और उसके बाद इन कॉमरेड्स से मुलाकाते भी हुई और यकीन मानिए ये राष्ट्रद्रोही भी है और हिंदुत्व के विरोधी भी हैं| इनसे मुलाक़ात एक मिनट की हो या 24 घंटे की, ये हर समय ब्रेन वाश करने में ही लगे रहते है हिन्दू विरोधी मानसिकता के साथ और निःसंदेह ये हिंदुओं के दलित समाज के मनोभाव को समझने में कामयाब रहे और अपने साथ उन्हें जोड़ने भी कामयाब रहे।

और अंत में यही कहूँगा की यदि आप ये समझते है की एक कन्हैया की गलती से जेएनयू को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए तो आप किस आधार पर गांधी जी की मृत्यु के लिए पूरे आरएसएस को जिम्मेदार ठहराते हैं? आप को गांधी जी की हत्या दिखाई देती है आप को देश का विभाजन नहीं दिखाई देता? आप को कन्हैया एक बालक नज़र आता है लेकिन उसके मुँह से अलगाववादी नारे और फिदायीन समर्थन की बाते नहीं सुनाई पड़ती? हर युग में समय आधुनिकता की ओर ही बढ़ता रहा है तो यदि आज आप ये कहे की पुरानी बाते भूलो, आज हम आधुनिक समाज में है…इससे काम नहीं चलेगा। समाज हर युग में आधुनिक हुआ है और हम हिन्दू हर युग में मारे गए, तोड़े गए, विभाजित किये गए, हमारा धर्म परिवर्तन किया गया और आज भी हम आधुनिक युग में है….लेकिन हवा का रुख ज़रा घूम गया है अब। ये बरसों से दबी चिंगारी थी। जो अब आसानी से शांत नहीं होगी।

दुनिया के कई देशो ने अपने आपको ईसाई या इस्लामी राष्ट्र घोषित किया हुआ है, हम सिर्फ एक ही हिन्दू राष्ट्र है इस दुनिया में फिर हम ये सेक्युलर राष्ट्र का तमगा ले कर क्यों घूम रहे है? इन गद्दारों को पनपने देने के लिए? हरगिज़ नही। यहाँ के गैर हिन्दू लोग दूसरे देश में अपने धर्म पर हो रहे आक्रमण से यहाँ जुलूस निकालते है और उन्हें उन देशों के इस्लामिक राष्ट्र होने पर भी आपत्ति नही है लेकिन यहाँ भी वो हिन्दू विरोधी बाते करते है और ढोंग करते है कि भारत को सेक्युलर राष्ट्र रहने दो! क्यूँ  भाई ? चित्त भी अपनी और पट्ट भी अपनी! ”

रत्नेश श्रीवास्तव
(लेखक स्वतंत्र रचनाकार है)

नोट – यह लेख एवं विचार पूर्ण रूप से व्यक्तिगत है और इससे लिटरेचर इन इंडिया समूह किसी भी प्रकार से सहमत या असहमत नहीं हैं।

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