देश में पिछले कुछ दिनों से बढती असहिष्णुता का होव्वा खड़ा करके काफी शोर मचाया गया पर वामपंथ का गर्भ बन चुके जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेसर ऐसे भी है जो अपनी ही मुस्लिम बिरादरी के लिए अछूत बन गए है। असल में बिहार के गोपालगंज के रहने वाले और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले डॉ खुर्शीद आलम इसरायली भाषा हिब्रू के प्रोफेसर है और उन्होंने इजरायल के जेरूसलम के “हिब्रू युनिवर्सिटी ऑफ़ जेरूसलम” से यहूदियों की इस मातृभाषा में पीएचडी भी की हुई है।

मुस्लिमों को सबक सिखाने के लिए रेप की इजाजत देता है लेकिन उनकी यही खासियत आज उनके लिए एक बड़ा सिरदर्द या यूँ कहे नासूर बन चुकी है। हिब्रू भाषा के प्रोफेसर होने के कारण उन्हें आम मुसलमान यहाँ तक की उनके मुस्लिम छात्र भी हेय और घृणा की दृष्टि से देखते है।

किस्सा यही ख़त्म नहीं होता, डॉ आलम के बारे में उर्दू अखबारों में कई आपत्तिजनक बाते लिखी जाती है। इन्हें आम मुसलमान या तो यहूदी कहता है या यहूदियों और इजराइल का एजेंट कह कर बुलाता है।

यहाँ तक की जामा मस्जिद में इन्हें नमाज तक नहीं पढने दी जाती। इनके खिलाफ भारत की सबसे बड़े इस्लामिक संस्था देवबंद दारुल उलूम ने भी फतवा जारी किया हुआ है। अपनी हैदराबाद यात्रा के दौरान इन्हें वहां के कई लोगों के फेंके हुए पत्थरों को भी झेलना पड़ा था। इन सबके बावजूद वे आज भी अपने मजहब इस्लाम पर कायम है और खुद को सच्चा मुसलमान बताते है लेकिन आम मुसलमानो ने केवल एक भाषा सिखने के कारण उन्हें इस्लाम से दूर कर दिया है। मुसलमानो के लिए अछूत बन चुके डॉ खुर्शीद आलम का केवल ये अपराध है की उन्होंने यहूदियों की भाषा हिब्रू सीख ली जिन्हें आम मुसलमान कुरान के अनुसार अपना सबसे बड़ा दुशमन मानता है। दरअसल कुरान के अनुसार यहूदी इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन है।

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