कन्हैया कुमार के रिहाई फैसले में न्यायालय के महत्वपूर्ण बिंदु

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कन्हैया की ज़मानत की सुनवाई करते हुए जस्टिस प्रतिभा रानी ने 23 पन्ने के अपने फैसले में कहा है कि राष्ट्रद्रोह के मामले की जांच अभी “शुरुआती स्तर” में है इसलिए जेएनयूएसयू अध्यक्ष को छह महीने की अंतरिम ज़मानत दी जाती है.

57 बिंदुओं में दिए गए फैसले में जस्टिस प्रतिभा रानी ने 37 बिंदुओं में बचाव पक्ष और सरकारी वकील की दलीलों का हवाला दिया है. फैसले में 9 फ़रवरी की शाम से लेकर 11 फ़रवरी तक के घटनाक्रम का सिलसिलेवार वर्णन है. कोर्ट के फैसले पर गृहमंत्री ने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.

कन्हैया कुमार के वकील ने भी कुछ टेलीविजन चैनलों को दिए साक्षात्कार में कोर्ट के फैसले पर कुछ नहीं कहा. लेकिन भाजपा के कुछ प्रवक्ता बार बार अदालत के फैसले के कुछ बिंदुओं को दोहराते नज़र आए जिसमें जेएनयू कैंपस में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का ज़िक्र किया गया था.

फैसले में जस्टिस प्रतिभा रानी ने कहाः

1. मैं अपने आपको एक चौराहे पर खड़ा महसूस कर रही हूं. जांच अभी शुरुआती स्तर पर है और 9 फ़रवरी को कन्हैया की मौजूदगी का दावा उस दिन शूट किए कुछ वीडियो फ़ुटेज के आधार पर किया गया है. सवाल ये है कि जिस तरह के गंभीर आरोप हैं और सबूतों के आधार पर जो राष्ट्र विरोधी रवैए का पता चला, उन्हें जेल में रखा जाना चाहिए.

2. जेएनयू के छात्र संघ के नेता होने के कारण कन्हैया की कैंपस में होने वाले कार्यक्रमों को लेकर कुछ ज़िम्मेदारियां और जवाबदेही है. भारत के संविधान में दी गई अभिव्यक्ति की आज़ादी के तहत हर नागरिक को अपनी विचारधारा और राजनीतिक जुड़ाव के साथ जीने का हक़ है. जमानत की सुनवाई करते हुए ये ध्यान में रखने की बात है कि हम अभिव्यक्ति की आज़ादी इसलिए मना पा रहे हैं क्योंकि हमारे जवान सरहदों पर तैनात हैं. हमें सुरक्षा देने वाली हमारी सेना दुनिया के सबसे कठिन इलाकों जैसे कि सियाचिन और कच्छ के रण में तैनात है.

3. ये भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि ऐसे लोग इस तरह की स्वतंत्रता का आनंद आराम से विश्वविद्यालय परिसर में ले रहे हैं, उन्हें इसकी समझ नहीं है कि दुनिया के सबसे ऊंचे ठिकानों पर लड़ाई के मैदान जैसी परिस्थियों में, जहां ऑक्सीजन की इतनी कमी है कि जो लोग अफ़ज़ल गुरु और मकबूल भट्ट के पोस्टर सीने से लगाकर उनकी शहादत का सम्मान कर रहे हैं और राष्ट्रविरोधी नारेबाजी कर रहे हैं, वे इन कठिन परिस्थितियों का एक घंटे के लिए भी मुकाबला नहीं कर सकते.

4. जिस तरह की नारेबाज़ी की गई है उससे शहीदों के वे परिवार हतोत्साहित हो सकते हैं जिनके शव तिरंगे में लिपटे ताबूतों में घर लौटे.

5. याचिकाकर्ता (कन्हैया) अपने राजनीतिक रूझानों को आगे ले जा सकते हैं लेकिन यह संविधान के ढ़ांचे के भीतर ही संभव है. भारत अनेकता में एकता का देश है. संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. विरोध में जिस तरह का विचार था उसके बारे में उस छात्र वर्ग को आत्मनिरीक्षण करने की ज़रूरत है, जिनकी अफ़ज़ल गुरु और मकबूल भट्ट की पोस्टर पकड़े तस्वीरें रिकार्ड में उपलब्ध हैं.

6. मामले पर जांच अभी “शुरुआती स्तर” पर है. कछ जेएनयू छात्रों के द्वारा आयोजित किए गए कार्यक्रम में की गई नारेबाज़ी में जिस तरह की विचारधारा दिखती है, उनकी सुरक्षा के दावे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की सुरक्षा नहीं कहा जा सकता. मुझे लगता है कि यह एक तरह का संक्रमण है जिससे ये छात्र संक्रमित हो गए हैं, और इससे पहले कि यह महामारी का रूप ले, इसे क़ाबू करने या ठीक करने की ज़रूरत है.

7. जब भी किसी तरह का संक्रमण अंग में फैलता है, उसे ठीक करने के लिए खाने के लिए एंटीबायोटिक दिए जाते हैं, लेकिन जब यह काम नहीं करता तो दूसरे चरण का इलाज किया जाता है. कभी-कभी सर्जरी की भी ज़रूरत होती है. लेकिन जब संक्रमण से अंग में सड़न होने का ख़तरा पैदा हो जाता है तो उस अंग को काटकर अलग कर देना ही इलाज होता है.

जस्टिस प्रतिभा रानी ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जितना समय न्यायिक हिरासत में व्यतीत किया, उसमें उन्होंने जो घटनाएं हुई उन पर आत्मचिंतन किया होगा. वे मुख्यधारा में रह सकें इसके लिए फिलहाल मैं उन्हें पुराने तरीक़े का इलाज ही देना चाहती हूं.

(बीबीसी)

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