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स्वतंत्रता और स्वाधीनता प्राणिमात्र का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी से आत्मसम्मान और आत्मउत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भारतीय राष्ट्रीयता को दीर्घावधि विदेशी शासन और सत्ता की कुटिल-उपनिवेशवादी नीतियों के चलते परतंत्रता का दंश झेलने को मजबूर होना पडा था और जब इस क्रूरतम कृत्यों से भरी अपमानजनक स्थिति की चरम सीमा हो गई तब जनमानस उद्वेलित हो उठा था। अपनी राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पराधीनता से मुक्ति के लिए सन् १८५७ से सन् १९४७ तक दीर्घावधि क्रान्ति यज्ञ की बलिवेदी पर अनेक राष्ट्रभक्तों ने तन-मन जीवन अर्पित कर दिया था। यह क्रान्ति करवटें लेती हुयी लोकचेतना की उत्ताल तरंगों से आप्लावित है। यह आजादी हमें यूँ ही नहीं प्राप्त हुई वरन् इसके पीछे शहादत का इतिहास है। लाल-बाल-पाल ने इस संग्राम को एक पहचान दी तो महात्मा गाँधी ने इसे अपूर्व विस्तार दिया। एक तरफ सत्याग्रह की लाठी और दूसरी तरफ भगतसिंह व आजाद जैसे क्रान्तिकारियों द्वारा पराधीनता के खिलाफ दिया गया इन्कलाब का अमोघ अस्त्र अँग्रेजों की हिंसा पर भारी पड़ा और अन्ततः १५ अगस्त १९४७ के सूर्योदय ने अपनी कोमल रश्मियों से एक नये स्वाधीन भारत का स्वागत किया।

इतिहास अपनी गाथा खुद कहता है। सिर्फ पन्नों पर ही नहीं बल्कि लोकमानस के कंठ में, गीतों और किंवदंतियों इत्यादि के माध्यम से यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहता है। वैसे भी इतिहास की वही लिपिबद्धता सार्थक और शाश्वत होती है जो बीते हुये कल को उपलब्ध साक्ष्यों और प्रमाणों के आधार पर यथावत प्रस्तुत करती है। जरूरत है कि इतिहास की उन गाथाओं को भी समेटा जाय जो मौखिक रूप में जन-जीवन में विद्यमान है, तभी ऐतिहासिक घटनाओं का सार्थक विश्लेषण हो सकेगा। लोकलय की आत्मा में मस्ती और उत्साह की सुगन्ध है तो पीड़ा का स्वाभाविक शब्द स्वर भी। कहा जाता है कि पूरे देश में एक ही दिन ३१ मई १८५७ को क्रान्ति आरम्भ करने का निश्चय किया गया था, पर २९ मार्च १८५७ को बैरकपुर छावनी के सिपाही मंगल पाण्डे की शहादत से उठी ज्वाला वक़्त का इन्तज़ार नहीं कर सकी और प्रथम स्वाधीनता संग्राम का आगाज़ हो गया। मंगल पाण्डे के बलिदान की दास्तां को लोक चेतना में यूँ व्यक्त किया गया है- जब सत्तावनि के रारि भइलि/ बीरन के बीर पुकार भइल/बलिया का मंगल पाण्डे के/ बलिवेदी से ललकार भइल/मंगल मस्ती में चूर चलल/ पहिला बागी मसहूर चलल/गोरनि का पलटनि का आगे/ बलिया के बाँका सूर चलल।

कहा जाता है कि १८५७ की क्रान्ति की जनता को भावी सूचना देने हेतु और उनमें सोयी चेतना को जगाने हेतु ‘कमल’ और ‘चपाती’ जैसे लोकजीवन के प्रतीकों को संदेशवाहक बनाकर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भेजा गया। यह कालिदास के मेघदूत की तरह अतिरंजना नहीं अपितु एक सच्चाई थी। क्रान्ति का प्रतीक रहे ‘कमल’ और ‘चपाती’ का भी अपना रोचक इतिहास है। किंवदन्तियों के अनुसार एक बार नाना साहब पेशवा की भेंट पंजाब के सूफी फकीर दस्सा बाबा से हुई। दस्सा बाबा ने तीन शर्तों के आधार पर सहयोग की बात कही- सब जगह क्रान्ति एक साथ हो, क्रान्ति रात में आरम्भ हो और अँग्रेजों की महिलाओं व बच्चों का कत्लेआम न किया जाय। नाना साहब की हामी पर अलौकिक शक्तियों वाले दस्सा बाबा ने उन्हें अभिमंत्रित कमल के बीज दिये तथा कहा कि इनका चूरा मिली आटे की चपातियाँ जहाँ-जहाँ वितरित की जायेंगी, वह क्षेत्र विजित हो जायेगा। फिर क्या था, गाँव-गाँव तक क्रान्ति का संदेश फैलाने के लिए चपातियाँ भेजी गईं। कमल को तो भारतीय परम्परा में शुभ माना जाता है पर चपातियों को भेजा जाना सदैव से अँग्रेज अफसरों के लिए रहस्य बना रहा। वैसे भी चपातियों का सम्बन्ध मानव के भरण-पोषण से है। विचारक वी० डी० सावरकर ने एक जगह लिखा है कि- “हिन्दुस्तान में जब भी क्रान्ति का मंगल कार्य हुआ, तब ही क्रान्ति-दूतों चपातियों द्वारा देश के एक छोर से दूसरे छोर तक इस पावन संदेश को पहुँचाने के लिये इसी प्रकार का अभियान चलाया गया था क्योंकि वेल्लोर के विद्रोह के समय में भी ऐसी ही चपातियों ने सक्रिय योगदान दिया था।” चपाती (रोटी) की महत्ता मौलवी इस्माईल मेरठी की इन पंक्तियों में देखी जा सकती है- मिले खुश्क रोटी जो आजाद रहकर/तो वह खौफो जिल्लत के हलवे से बेहतर/जो टूटी हुई झोंपड़ी वे जरर हो/भली उस महल से जहाँ कुछ खतर हो।

१८५७ की क्रान्ति वास्तव में जनमानस की क्रान्ति थी,तभी तो इसकी अनुगूँज लोक साहित्य में भी सुनायी पड़ती है। भारतीय स्वाधीनता का संग्राम सिर्फ व्यक्तियों द्वारा नहीं लड़ा गया बल्कि कवियों और लोक    गायकों ने भी लोगों को प्रेरित करने में प्रमुख भूमिका निभायी। लोगों को इस संग्राम में शामिल होने हेतु प्रकट भाव को लोकगीतों में इस प्रकार व्यक्त किया गया- गाँव-गाँव में डुग्गी बाजल, बाबू के फिरल दुहाई/लोहा चबवाई के नेवता बा, सब जन आपन दल बदल/बा जन गंवकई के नेवता, चूड़ी फोरवाई के नेवता/सिंदूर पोंछवाई के नेवता बा, रांड कहवार के नेवता। राजस्थान के राष्ट्रवादी कवि शंकरदान सामोर ने मुखरता के साथ अँग्रेजों की गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ देने का आह्वान किया- आयौ औसर आज, प्रजा परव पूरण पालण/आयौ औसर आज, गरब गोरां रौ गालण/आयौ औसर आज, रीत रारवण हिंदवाणी/आयौ औसर आज,विकट रण खाग बजाणी/फाल हिरण चुक्या फटक, पाछो फाल न पावसी/आजाद हिन्द करवा अवर, औसर इस्यौ न आवसी। १८५७ की लड़ाई आर-पार की लड़ाई थी। हर कोई चाहता था कि वह इस संग्राम में अँग्रेजों के विरुद्ध जमकर लड़े। यहाँ तक कि ऐसे नौजवानों को जो घर में बैठे थे, महिलाओं ने लोकगीत के माध्यम से व्यंग्य कसते हुए प्रेरित किया-लागे सरम लाज घर में बैठ जाहु/मरद से बनिके लुगइया आए हरि/ पहिरि के साड़ी, चूड़ी, मुंहवा छिपाई लेहु/ राखि लेई तोहरी पगरइया आए हरि।

१८५७ की जनक्रान्ति’ का गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ ने भी बड़ा जीवन्त वर्णन किया है। उनकी कविता पढ़कर मानो १८५७, चित्रपट की भाँति आँखों के सामने छा जाता है- सम्राट बहादुरशाह ‘जफर’, फिर आशाओं के केन्द्र बने/सेनानी निकले गाँव-गाँव, सरदार अनेक नरेन्द्र बने/लोहा इस भाँति लिया सबने, रंग फीका हुआ फिरंगी का/हिन्दू-मुस्लिम हो गये एक,रह गया न नाम दुरंगी का/अपमानित सैनिक मेरठ के, फिर स्वाभिमान से भड़क उठे/घनघोर बादलों-से गरजे, बिजली बन-बनकर कड़क उठे/हर तरफ क्रान्ति ज्वाला दहकी, हर ओर शोर था जोरों का/पुतला बचने पाये न कहीं पर, भारत में अब गोरों का।

१८५७ की क्रान्ति की गूँज दिल्ली से दूर पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में भी सुनायी दी थी। वैसे भी उस समय तक अँग्रेजी फौज में ज्यादातर सैनिक इन्हीं क्षेत्रों के थे। स्वतंत्रता की गाथाओं में इतिहास प्रसिद्ध चौरीचौरा की डुमरी रियासत बंधू सिंह का नाम आता है, जो कि १८५७ की क्रान्ति के दौरान अँग्रेजों का सर कलम करके और चौरीचौरा के समीप स्थित कुसुमी के जंगल में अवस्थित माँ तरकुलहा देवी के स्थान पर इसे चढ़ा देते। कहा जाता है कि एक गद्दार के चलते अँग्रेजों की गिरफ्त में आये बंधू सिंह को जब फाँसी दी जा रही थी, तो सात बार फाँसी का फन्दा ही टूटता रहा। यही नहीं जब फाँसी के फन्दे से उन्होंने दम तोड़ दिया तो उस पेड़ से रक्तस्राव होने लगा जहाँ बैठकर वे देवी से अँग्रेजों के खिलाफ लड़ने की शक्ति माँगते थे। पूर्वांचल के अंचलों में अभी भी यह पंक्तियाँ सुनायी जाती हैं- सात बार टूटल जब, फांसी के रसरिया/गोरवन के अकिल गईल चकराय/असमय पड़ल माई गाढ़े में परनवा/अपने ही गोदिया में माई लेतु तू सुलाय/बंद भईल बोली रुकि गइली संसिया/नीर गोदी में बहाते, लेके बेटा के लशिया।

भारत को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था। पर अँग्रेजी राज ने हमारी सभ्यता व संस्कृति पर घोर प्रहार किये और यहाँ की अर्थव्यवस्था को भी दयनीय अवस्था में पहुँचा दिया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने इस दुर्दशा का मार्मिक वर्णन किया है-     रोअहु सब मिलिकै आवहु भारत भाई/हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई/सबके पहिले जेहि ईश्वर धन बल दीनो/सबके पहले जेहि सभ्य विधाता कीनो/सबके पहिले जो रूप-रंग रस-भीनो/सबके पहिले विद्याफल जिन गहि लीनो/अब सबके पीछे सोई परत लखाई/हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई।

आजादी की सौगात भीख में नहीं मिलती बल्कि उसे छीनना पड़ता है। इसके लिये ज़रूरी है कि समाज में कुछ नायक आगे आयें और षेश समाज उनका अनुसरण करे। ऐसे नायकों की चर्चा गाँव-गाँव की चौपालों पर देखी जा सकती थी। गुरिल्ला शैली के कारण फिरंगियों में दहशत और आतंक का पर्याय बन क्रान्ति की ज्वाला भड़काने वाले तात्या टोपे से अँग्रेजी रूह भी काँपती थी फिर उनका गुणगान क्यों न हो। राजस्थानी कवि शंकरदान सामौर तात्या की महिमा‘हिन्द नायक’ के रूप में गाते हैं- जठै गयौ जंग जीतियो, खटकै बिण रण खेत/तकड़ौ लडियाँ तांतियो, हिन्द थान रै हेत/मचायो हिन्द में आखी,तहल कौ तांतियो मोटो/धोम जेम घुमायो लंक में हणूं घोर/रचाओ ऊजली राजपूती रो आखरी रंग/जंग में दिखायो सूवायो अथग जोर। इसी प्रकार शंकरपुर के राना बेनीमाधव सिंह की वीरता को भी लोकगीतों में चित्रित किया गया है- राजा बहादुर सिपाही अवध में/धूम मचाई मोरे राम रे/लिख लिख चिठिया लाट ने भेजा/आब मिलो राना भाई रे/जंगी खिलत लंदन से मंगा दूं/ अवध में सूबा बनाई रे।

१८५७ की क्रान्ति में जिस मनोयोग से पुरुष नायकों ने भाग लिया, महिलायें भी उनसे पीछे न रहीं। लखनऊ में बेगम हज़रत महल तो झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई ने इस क्रान्ति की अगुवाई की। बेगम हज़रत महल ने लखनऊ की हार के बाद अवध के ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर क्रान्ति की चिन्गारी फैलाने का कार्य किया। मजा हज़रत ने नहीं पाई/ केसर बाग लगाई/कलकत्ते से चला फिरंगी/ तंबू कनात लगाई/पार उतरि लखनऊ का/ आयो डेरा दिहिस लगाई/आसपास लखनऊ का घेरा/सड़कन तोप धराई। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी वीरता से अँग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिये। उनकी मौत पर जनरल ह्यूगरोज ने कहा था कि- “यहाँ वह औरत सोयी हुयी है, जो व्रिदोही में एकमात्र मर्द थी।” ‘झाँसी की रानी’ नामक अपनी कविता में सुभद्राकुमारी चौहान  १८५७ की उनकी वीरता का बखान करती हैं- चमक उठी सन् सत्तावन में/वह तलवार पुरानी थी/बुन्देले हरबोलों के मुँह/हमने सुनी कहानी थी/खूब लडी मर्दानी वह तो/झाँसी वाली रानी थी/खूब लड़ी मरदानी/ अरे झाँसी वारी रानी/पुरजन पुरजन तोपें लगा दई/ गोला चलाए असमानी/अरे झाँसी वारी रानी/ खूब लड़ी मरदानी/सबरे सिपाइन को पैरा जलेबी/ अपन चलाई गुरधानी।

१८५७ की क्रान्ति में शाहाबाद के ८० वर्षीय कुँअर सिंह को दानापुर के विद्रोही सैनिकों द्वारा २७ जुलाई को आरा शहर पर कब्जा करने के बाद नेतृत्व की बागडोर सौपी गयी। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम अंचलों में शेर बाबु कुँअर सिंह ने घूम-घूम कर १८५७ की क्रान्ति की अलख जगायी। आज भी इस क्षेत्र में कुँअर सिंह को लेकर तमाम किंवदन्तियाँ मौजूद है। इस क्षेत्र के अधिकतर लोकगीतों में जनाकांक्षाओं को असली रूप देने का श्रेय बाबु कुँअर सिंह को दिया गया है- बक्सर से जो चले कुँअर सिंह पटना आकर    टीक/पटना के मजिस्टर बोले करो कुँअर को ठीक/अतुना बात जब सुने कुँअर सिंह दी बंगला फुंकवाई/गली-गली मजिस्टर रोए लाट गये घबराई।

१८५७ की क्रान्ति के दौरान ज्यों-ज्यों लोगो को अँग्रेजों की पराजय का समाचार मिलता वे खुशी से झूम उठते। अजेय समझे जाने वाले अँग्रेजों का यह हश्र, उस क्रान्ति के साक्षी कवि सखवत राय ने यूँ पेश किया है- गिद्ध मेडराई स्वान स्यार आनंद छाये/कहिं गिरे गोरा कहीं हाथी बिना सूंड के। १८५७ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने अँग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया। बौखलाकर अँग्रेजी हुकूमत ने लोगों को फाँसी दी, पेड़ों पर समूहों में लटका कर मृत्यु दण्ड दिया और तोपों से बाँधकर दागा- झूलि गइलें अमिली के डरियाँ/बजरिया गोपीगंज कई रहलि। वहीं जिन जीवित लोगों से अँग्रेजी हुकूमत को ज्यादा खतरा महसूस हुआ, उन्हें कालापानी की सजा दे दी। तभी तो अपने पति को कालापानी भेजे जाने पर एक महिला‘कजरी’ के बोलो में कहती है- अरे रामा नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी/सबकर नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा/नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी/घरवा में रोवै नागर, माई और बहिनियां रामा/से जिया पैरोवे बारी धनिया रे हरी।

बंगाल विभाजन के दौरान स्वदेशी- बहिष्कार- प्रतिरोध का नारा खूब चला। अँग्रेजी कपड़ों की होली जलाना और उनका बहिष्कार करना देश भक्ति का शगल बन गया था, फिर चाहे अँग्रेजी कपड़ों में ब्याह रचाने आये बाराती ही हों- फिर जाहु-फिरि जाहु घर का समधिया हो/मोर धिया रहिहैं कुंआरि/ बसन उतारि सब फेंकहु विदेशिया हो/ मोर पूत रहिहैं उघार/ बसन सुदेसिया मंगाई पहिरबा हो/ तब होइहै धिया के बियाह।

जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड अँग्रेजी हुकूमत की बर्बरता व नृशंसता का नमूना था। इस हत्याकाण्ड ने भारतीयों विशेषकर नौजवानों की आत्मा को हिलाकर रख दिया। गुलामी का इससे वीभत्स रूप हो भी नहीं सकता। सुभद्राकुमारी चौहान ने ‘जलियावाले बाग में वसंत’ नामक कविता के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की है- कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खाकर/कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर/आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं/अपने प्रिय-परिवार देश से भिन्न हुए हैं/कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना/करके उनकी याद अश्रु की ओस बहाना/तड़प-तड़पकर वृद्ध मरे हैं गोली खाकर/शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जाकर/यह सब करना, किन्तु बहुत धीरे-से आना/यह है शोक-स्थान, यहाँ मत शोर मचाना।

कोई भी क्रान्ति बिना खून के पूरी नहीं होती, चाहे कितने ही बड़े दावे किये जायें। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में एक ऐसा भी दौर आया जब कुछ नौजवानों ने अँग्रेजी हुकूमत की चूल हिला दी, नतीजन अँग्रेजी सरकार उन्हें जेल में डालने के लिये तड़प उठी। ११ अगस्त १९०८ को जब १५ वर्षीय क्रान्तिकारी खुदीराम बोस को अँग्रेज सरकार ने निर्ममता से फाँसी पर लटका दिया तो मशहूर उपन्यासकार प्रेमचन्द के अन्दर का देशप्रेम भी हिलोरें मारने लगा और वे खुदीराम बोस की एक तस्वीर बाजार से खरीदकर अपने घर लाये तथा कमरे की दीवार पर टाँग दिया। खुदीराम बोस को फाँसी दिये जाने से एक वर्ष पूर्व ही उन्होंने ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ नामक अपनी प्रथम कहानी लिखी थी, जिसके अनुसार- ‘खून    की वह आखिरी बूँद जो देश की आजादी के लिये गिरे, वही दुनिया का सबसे अनमोल रतन है।’ उस समय अँग्रेजी सैनिकों की पदचाप सुनते ही बहनें चौकन्नी हो जाती थीं। तभी तो सुभद्राकुमारी चौहान ने    ‘बिदा’ में लिखा कि- गिरफ्तार होने वाले हैं/आता है वारंट अभी/धक-सा हुआ हृदय, मैं सहमी/हुए विकल आशंक सभी/मैं पुलकित हो उठी! यहाँ भी/आज गिरफ्तारी होगी/फिर जी धड़का, क्या भैया की /सचमुच तैयारी होगी। आजादी के दीवाने सभी थे। हर पत्नी की दिली तमन्ना होती थी कि उसका भी पति इस दीवानगी में शामिल हो। तभी तो पत्नी पति के लिए गाती है- जागा बलम गाँधी टोपी वाले आई गइलैं…./राजगुरू सुखदेव भगत सिंह हो/तहरे जगावे बदे फाँसी पर चढ़ाय गइलै।

सरदार भगत सिंह क्रान्तिकारी आन्दोलन के अगुवा थे,      जिन्होंने हँसते-हँसते फासी के फन्दों को चूम लिया था। एक लोकगायक भगत सिंह के इस तरह जाने को बर्दाश्त नहीं कर पाता और गाता है- एक-एक क्षण बिलम्ब का मुझे यातना दे रहा है – तुम्हारा फंदा मेरे गरदन में छोटा क्यों पड़ रहा है/मैं एक नायक की तरह सीधा स्वर्ग में जाऊँगा/अपनी-अपनी फरियाद धर्मराज को सुनाऊँगा/मैं उनसे अपना वीर भगत सिंह माँग लाऊँगा। इसी प्रकार चन्द्रशेखर आजाद की शहादत पर उन्हें याद करते हुए एक अंगिका लोकगीत में कहा गया- हौ आजाद त्वौं अपनौ प्राणे कऽ /आहुति दै के मातृभूमि कै आजाद करैलहों/तोरो कुर्बानी हम्मै जिनगी भर नैऽ भुलैबे/देश तोरो रिनी रहेते। सुभाष चन्द्र बोस ने नारा दिया कि- “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा,फिर क्या था पुरूषों के साथ-साथ महिलाएँ भी उनकी फौज में शामिल होने के लिए बेकरार हो उठ- हरे रामा सुभाष चन्द्र ने फौज सजायी रे हारी/कड़ा-छड़ा पैंजनिया छोड़बै, छोड़बै हाथ कंगनवा रामा/ हरे रामा, हाथ में झण्डा लै के जुलूस निकलबैं रे हारी।

महात्मा गाँधी आजादी के दौर के सबसे बड़े नेता थे। चरखा कातने द्वारा उन्हने स्वावलम्बन और स्वदेशी का रूझान जगाया। नौजवान अपनी-अपनी धुन में गाँधी जी को प्रेरणास्त्रोत मानते और एक स्वर में गाते- अपने हाथे चरखा चलउबै/हमार कोऊ का करिहैं/गाँधी बाबा से लगन लगउबै/हमार कोई का करिहैं।    १९४२ में जब गाँधी जी ने ‘अँग्रेजों भारत छोड़ो’ का आह्वान किया तो ऐसा लगा कि १८५७ की क्रान्ति फिर से जिन्दा हो गयी हो। क्या बूढ़े, क्या नवयुवक, क्या पुरुष, क्या महिला, क्या किसान, क्या जवान…… सभी एक स्वर में गाँधी जी के पीछे हो लिये। ऐसा लगा कि अब तो अँग्रेजों को भारत छोड़कर जाना ही होगा। गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ ने इस ज्वार को महसूस किया और इस जन क्रान्ति को शब्दों से यूँ सँवारा-बीसवीं सदी के आते ही, फिर उमड़ा जोश जवानों में/हड़कम्प मच गया नए सिरे से, फिर शोषक शैतानों में/सौ बरस भी नहीं बीते थे सन् बयालीस पावन आया/लोगों ने समझा नया जन्म लेकर सन् सत्तावन आया/आजादी की मच गई धूम फिर शोर हुआ आजादी का/फिर जाग उठा यह सुप्त देश चालीस कोटि आबादी का।

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भारत माता की गुलामी की बेड़ियाँ काटने में असंख्य लोग शहीद हो गये, बस इस आस के साथ कि आने वाली पीढ़ियाँ स्वाधीनता की बेला में साँस ले सकें। इन    शहीदों की तो अब बस यादें बची हैं और इनके चलते पीढ़ियाँ मुक्त जीवन के सपने देख रही हैं। कविवर जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ इन कुर्बानियों को व्यर्थ नहीं जाने देते- शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले/वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा/कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे/जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमाँ होगा।

देश आजाद हुआ। १५ अगस्त १९४७ के सूर्योदय की बेला में विजय का आभास हो रहा था। फिर कवि लोकमन को कैसे समझाता। आखिर उसके मन की तरंगें भी तो लोक से ही संचालित होती हैं। कवि सुमित्रानन्दन पंत इस सुखद अनुभूति को यूँ सँजोते हैं-चिर प्रणम्य यह पुण्य अहन्, जय गाओ सुरगण/आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन/नव भारत,फिर चीर युगों का तमस आवरण/तरुण-अरुण-सा उदित हुआ परिदीप्त कर भुवन/सभ्य हुआ अब विश्व, सभ्य धरणी का जीवन/ज खुले भारत के संग भू के जड़ बंधन/शांत हुआ अब युग-युग का भौतिक संघर्षण/मुक्त चेतना भारत की यह करती घोषण!

देश आजाद हो गया, पर अँग्रेज इस देश की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर गये। एक तरफ आजादी की उमंग, दूसरी तरफ गुलामी की छायाओं का डर……  गिरिजाकुमार माथुर ‘पन्द्रह अगस्त’ की बेला पर उल्लास भी व्यक्त करते हैं और सचेत भी करते हैं-  आज जीत की रात,         पहरुए, सावधान रहना/ खुले देश के द्वार, अचल दीपक समान रहना/ऊँची हुई मशाल हमारी, आगे कठिन डगर है/शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है/शोषण से मृत है समाज,कमजोर हमारा घर है/किन्तु आ रही नई जिंदगी,यह विश्वास अमर है।

 १८५७ से १९४७ तक की कहानी सिर्फ एक गाथा भर नहीं है बल्कि एक दास्तान है कि क्यों हम बेड़ियों में जकड़े, किस प्रकार की यातनायें हमने सहीं और शहीदों की किन कुर्बानियों के साथ हम आजाद हुये। यह ऐतिहासिक घटनाक्रम की मात्र एक शोभा यात्रा नहीं अपितु भारतीय स्वाभिमान का संघर्ष, राजनैतिक दमन व आर्थिक शोषण के विरुद्ध लोक चेतना का प्रबुद्ध अभियान एवं सांस्कृतिक नवोन्मेष की दास्तान है। आजादी का अर्थ सिर्फ राजनैतिक आजादी नहीं अपितु यह एक विस्तृत अवधारणा है, जिसमें व्यक्ति से लेकर राष्ट्र का हित व उसकी परम्परायें छुपी हुई हैं। जरूरत है हम अपनी कमजोरियों का विश्लेषण करें,तद्‌नुसार उनसे लड़ने की चुनौतियाँ स्वीकारें और नए परिवेश में नए जोश के साथ आजादी के नये अर्थों के साथ एक सुखी व समृद्ध भारत का निर्माण करें।

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