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अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति

दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी हुई” भाषा। भाषाशास्‍त्र के ज्ञाता जिसे ”विकास” कहते हैं उसे ही और लोग भ्रष्‍ट होना या बिगड़ना कहते हैं। धीरे-धीरे प्राकृत-भाषाएँ, लिखित भाषाएँ हो गईं। सैकड़ों पुस्तकें उनमें बन गईं। उनका व्‍याकरण बन गया। इससे वे बेचारी स्थिर हो गईं। उनकी अनस्थिरता- उनका विकास बंद हो गया। यह लिखित प्राकृत की बात हुई, कथित प्राकृत की नहीं। जो प्राकृत लोग बोलते थे उसका विकास बंद नहीं हुआ। वह बराबर विकसित होती, अथवा यों कहिए कि बिगड़ती गई। लिखित प्राकृत के आचार्यों और पंडितों ने इसी विकास-पूर्ण भाषा का अपभ्रंश नाम से उल्लेख किया है। उनके हिसाब से वह भाषा भ्रष्‍ट हो गई थी। सर्वसाधारण की भाषा होने के कारण अपभ्रंश का प्रचार बढ़ा और साहित्‍य की स्थिरीभूत प्राकृत का कम होता गया। धीरे-धीरे उसके जानने वाले दो ही चार रह गए। फल यह हुआ कि वह मृत भाषाओं की पदवी को पहुँच गई। उसका प्रचार बिल्‍कुल ही बंद हो गया। वह ”मर” गई। अब क्‍या हो? लोग लिखना पढ़ना जानते थे। मूर्ख थे ही नहीं। लिखने के लिए ग्रंथों की रचना के लिए कोई भाषा चाहिए जरूर थी। इससे वही अपभ्रंश काम में आने लगी। उसी में पुस्‍तकें लिखी जाने लगीं। इन पुस्‍तकों में से कुछ अब तक उपलब्‍ध हैं। इनकी भाषा उस समय की कथित भाषा का नमूना है। जिस तरह की भाषा में ये पुस्‍तकें हैं उसी तरह की भाषा उस समय बोली जाती थी। पर किस समय व‍ह बोली जाती थी, इसका ठीक-ठीक पता नहीं चलता। जो प्रमाण मिले हैं उनसे सिर्फ इतना ही मालूम होता है कि छठे शतक में अपभ्रंश भाषा में कविता होती थी। ग्‍यारहवें शतक के आरंभ तक इस तरह की कविता के प्रमाण मिलते हैं। इस पिछले, अर्थात् ग्‍यारहवें, शतक में अपभ्रंश भाषाओं का प्रचार प्रायः बंद हो चुका था। वे भी मरण को प्राप्‍त हो चुकी थीं। तीसरे प्रकार की प्राकृत-भाषाओं के लिखित नमूने बारहवें शतक के अंत और तेरहवें के प्रारंभ से मिलते हैं। और लिखी जाने के पहले इन तीसरी तरह की प्राकृत भाषाओं का रूप जरूर स्थिर हो गया होगा। अतएव कह सकते हैं कि हिंदुस्‍तान की वर्तमान संस्‍कृतोत्‍पन्‍न भाषाओं का जन्‍म कोई 1000 ईसवी के लगभग हुआ।

अपभ्रंश भाषाओं के भेद

इस देश की वर्तमान भाषाओं के विकास की खोज के लिए हमें लिखित प्राकृतों के नहीं, किंतु लिखित अपभ्रंश भाषाओं के आधार पर विचार करना चाहिए। किसी-किसी ने परिमार्जित संस्‍कृत से वर्तमान भाषाओं की उत्‍पत्ति मानी है। यह भूल है। इस समय की बोल-चाल की भाषाएँ न संस्‍कृत से निकली हैं, न प्राकृत से, किंतु अपभ्रंश से। इसमें कोई संदेह नहीं कि संस्‍कृत और प्राकृत की सहायता से वर्तमान भाषाओं से संबंध रखने वाली अनेक बातें मालूम हो सकती हैं, पर ये भाषाएँ उनकी जड़ नहीं। जड़ के लिए तो अपभ्रंश भाषाएँ ढूँढ़नी होंगी।

लिखित साहित्‍य में सिर्फ एक ही अपभ्रंश भाषा का नमूना मिलता है। वह नागर अपभ्रंश है। उसका प्रचार बहुत करके पश्चिमी भारत में था। पर प्राकृत व्‍याकरणों में जो नियम दिए हुए हैं उनसे अन्‍यान्‍य अपभ्रंश भाषाओं के मुख्‍य-मुख्‍य लक्षण मालूम करना कठिन नहीं। यहाँ पर हम अपभ्रंश भाषाओं की सिर्फ नामावली देते हैं और यह बतलाते हैं कि कौन वर्तमान भाषा किस अपभ्रंश से निकली है।

बाहरी शाखा की अपभ्रंश भाषाएँ

सिंध नदी के अधोभाग के आसपास जो देश है उस में ब्राचड़ा नाम की अपभ्रंश भाषा बोली जाती थी। वर्तमान समय की सिंधी और लहँडा उसी से निकली हैं। लहँडा उस प्रांत की भाषा है जिसका पुराना नाम केकय देश है। संभव है केकय देश वालों की भाषा, पुराने जमाने में, कोई और ही रही हो। अथवा उस देश में असंस्‍कृत आर्य-भाषाएँ बोलने वाले कुछ लोग बस गए हों। अर्थात् उसमें संस्‍कृत और असंस्कृत दोनों तरह की आर्य-भाषाओं के शब्‍द मिल गए हों।

कोहिस्‍तानी और काश्‍मीरी भाषाएँ किस अपभ्रंश से निकली हैं, नहीं मालूम। जिस अपभ्रंश भाषा से ये निकली हैं वह ब्राचड़ा से बहुत कुछ समता रखती रही होगी।

नर्मदा के पार्वत्‍य में, अरब समुद्र से ले कर उड़ीसा तक, उत्तर दक्षिण दोनों तरफ, बहुत सी बोलियाँ बोली जाती रही होंगी। वैदर्भी अथवा दाक्षिणात्‍य नाम की अपभ्रंश भाषा से उनका बहुत कुछ संबंध रहा होगा। इस भाषा का प्रधान स्‍थल विदर्भ, अर्थात् वर्तमान बरार था। संस्कृत-साहित्‍य में इस प्रांत का नाम महाराष्‍ट्र है। वैदर्भी और उससे संबंध रखने वाली अन्‍य भाषाओं और बोलियों से वर्तमान मराठी की उत्‍पत्ति हो सकती है। पर मराठी के उस अपभ्रंश से निकलने के अधिक प्रमाण पाए जाते हैं जो महाराष्‍ट्र देश में बोली जाती थी। जिस प्राकृत भाषा का नाम महाराष्‍ट्री है वह साहित्‍य की प्राकृत है। पुस्‍तकें उसी में लिखी जाती थीं, पर वह बोली न जाती थी। बोलने की भाषा जुदा थी।

दाक्षिणात्‍य-भाषा-भाषी प्रदेश के पूर्व से ले कर बंगाल की खाड़ी तक ओडरी या उत्‍कली अपभ्रंश प्रचलित थी। वर्तमान उड़िया भाषा उसी से निकली है।

जिन प्रांतों में ओडरी भाषा बोली जाती थी उनके उत्तर, अधिकतर छोटा नागपुर, बिहार और संयुक्‍त प्रांतों के पूर्वी भाग में मागधी प्राकृत की अपभ्रंश, मागध भाषा, बोली जाती थी। इसका विस्‍तार बहुत बड़ा था। वर्तमान बिहारी भाषा उसी से उत्‍पन्‍न है। इस अपभ्रंश की एक बोली अब तक अपने पुराने नाम से मशहूर है। वह आजकल मगही कहलाती है। मगही शब्‍द मगधी का ही अपभ्रंश है। मागध अपभ्रंश की किसी समय यही प्रधान बोली थी। यह अपभ्रंश भाषा पुरानी पूर्वी प्राकृत की समकक्ष थी। ओडरी, गौड़ी और ढक्‍की भी उसी के विकास प्राप्‍त रूप थे। उनके ये रूप बिगड़ते-बिगड़ते या विकास होते-होते, हो गए थे। मगही गौड़ी, ढक्‍की और ओडरी इन चारों भाषाओं की आदि जननी वही पुरानी पूर्वी प्राकृत समझना चाहिए। उसी से मागधी का जन्‍म हुआ और मागधी से इन सब का।

मागधी के पूर्व गौड़ अथवा प्राच्‍य नाम की अपभ्रंश भाषा बोली जाती थी। उसका प्रधान अड्डा गौड़ देश अर्थात वर्तमान मालदा जिला था। इस अपभ्रंश ने दक्षिण और दक्षिण-पूर्व तक फैल कर वहाँ वर्तमान बँगला भाषा की उत्‍पत्ति की।

प्राच्‍य अपभ्रंश ने कुछ दूर और पूर्व जा कर, ढाका के आस-पास ढक्‍की अपभ्रंश की जड़ डाली। ढाका, सिलहट, कछार और मैमनसिंह जिलों में जो भाषा बोली जाती है वह उसी से उत्‍पन्‍न है।

इस प्राच्‍य या गौड़ अपभ्रंश ने हिंदुस्‍तान के पूर्व, गंगा के उत्तरी हिस्‍सों तक, कदम बढ़ाया। वहाँ उसने उत्तरी बंगाल और आसाम में पहुँच कर आसामी की सृष्टि की। उत्तरी और पूर्वी बंगाल की भाषाएँ या बोलियाँ मुख्‍य बंगाल की किसी भाषा या बोली से नहीं निकलीं। वे पूर्वोक्‍त गौड़ अपभ्रंश से उत्पन्‍न हुई हैं जो पश्चिम की तरफ बोली जाती थीं।

मागध अपभ्रंश उत्तर, दक्षिण और पूर्व तीन तरफ फैली हुई थी। उत्तर में उसकी एक शाखा ने उत्तरी बँगला और आसामी की उत्‍पत्ति की, दक्षिण में उड़िया की, पूर्व में ढक्‍की की और उत्तरी बँगला और उड़िया के बीच में बँगला की। ये भाषाएँ अपनी जनता से एक सा संबंध रखती हैं। यही कारण है जो उत्तरी बँगला सुदूर, दक्षिण में बोली जाने वाली उड़िया से, मुख्‍य बँगला भाषा की अपेक्षा अधिक संबंध रखती है – दोनों में परस्‍पर अधिक समता है।

जैसा कि लिखा जा चुका है पूर्वी और पश्चिमी प्राकृतों की मध्‍यवर्ती भी एक प्राकृत थी। उसका नाम था अर्द्धमागधी। उसी के अपभ्रंश से वर्तमान पूर्वी हिंदी की उत्‍पत्ति है। यह भाषा अवध, बघेलखंड और छत्तीसगढ़ में बोली जाती है।

भीतरी शाखा

यहाँ तक बाहरी शाखा की अपभ्रंश भाषाओं का जिक्र हुआ। अब रहीं भीतरी शाखा की अपभ्रंश भाषाएँ। उनमें से मुख्‍य अपभ्रंश नागर है। बहुत करके यह पश्चिमी भारत की भाषा थी जहाँ नागर ब्राह्मणों का अब तक बाहुल्‍य है। इस अपभ्रंश में कई बोलियाँ शामिल थीं, जो दक्षिणी भारत के उत्तर की तरफ प्रायः समग्र पश्चिमी भारत में, बोली जाती थीं। गंगा-यमुना के बीच के प्रांत का जो मध्‍यवर्ती भाग है उसमें नागर अपभ्रंश का एक रूप, शौरसेन, प्रचलित था। वर्तमान पश्चिमी हिंदी और पंजाबी उसी से निकली है। नागर अपभ्रंश का एक और भी रूपांतर था। उसका नाम था आवंती। यह अपभ्रंश भाषा उज्‍जैन प्रांत में बोली जाती थी। राजस्‍थानी इसी से उत्‍पन्‍न है। गौर्जरी भी इसका एक रूप-विशेष था। वर्तमान गुजराती की जड़ वही है। आवंती और गौर्जरी, मुख्‍य नागर अपभ्रंश से बहुत कुछ मिलती थीं।

पूर्वी पंजाब से नेपाल तक, हिंदुस्‍तान के उत्तर, पहाड़ी प्रांतों में, जो भाषाएँ बोली जाती हैं वे किस अपभ्रंश या प्राकृत से निकली हैं, ठीक-ठीक नहीं मालूम। पर वहाँ की भाषाएँ वर्तमान राजस्‍थानी से बहुत मिलती हैं। और जो लोग पहाड़ी भाषाएँ बोलते हैं उनमें से कितने ही यह दावा रखते हैं कि हमारे पूर्वज राजपूताना से आ कर यहाँ बसे थे। इससे जब तक और कोई प्रमाण न मिले तब तक इन पहाड़ी भाषाओं को भी राजपूताने की पुरानी आवंती से उत्‍पन्‍न मान लेना पड़ेगा।

परिमार्जित संस्‍कृत

जैसा कि लिखा जा चुका है कि प्रारंभिक, किंवा पहली, प्राकृत से संबंध रखने वाली कई एक भाषाएँ या बोलियाँ थीं। उनका धीरे-धीरे विकास होता गया। भारत की वर्तमान भाषाएँ उसी विकास का फल हैं। परिमार्जित संस्‍कृत भी इसी पहली प्राकृत की किसी शाखा से उत्‍पन्‍न हुई है। जिस स्थिर और निश्चित अवस्‍था में उसे हम देखते हैं वह वैयाकरणों की कृपा का फल है। व्‍याकरण बनाने वालों ने नियमों की श्रृंखला से उसे ऐसा जकड़ दिया कि वह जहाँ की तहाँ रह गई। उसका विकास बंद हो गया। संस्‍कृत को नियमित करने के लिए कितने ही व्‍याकरण बने। उनमें से पाणिनि का व्‍याकरण सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इस व्‍याकरण ने संस्‍कृत को नियमित करने की पराकाष्‍ठा कर दी। उसने उसे बे-तरह स्थिर कर दिया। यह बात ईसा के कोई 300 वर्ष पहले हुई। धार्मिक ग्रंथ सब इसी में लिखे जाने लगे। और विषयों के भी विद्वत्तापूर्ण ग्रंथों की रचना इसी परिमार्जित संस्‍कृत में होने लगी। परंतु प्राकृत भाषाओं के वैयाकरणों ने संस्‍कृत के शब्‍दों और मुहावरों की कदर न की। प्राकृत व्‍याकरणों में उनके नियम न बनाए। प्राकृत के जो ग्रंथ उपलब्‍ध हैं उनमें भी संस्‍कृत के शब्‍द और मुहावरे नहीं पाए जाते। प्राकृत वालों ने संस्‍कृत का बहिष्‍कार सा किया और संस्‍कृत वालों ने प्राकृत का। प्राकृत और संस्‍कृत के व्‍याकरणों और ग्रंथों में तो पंडितों ने एक दूसरे के शब्‍दों, मुहावरों और नियमों को न स्‍वीकार किया। पर बोलने वालों ने इस बात की परवा न की। उच्‍च प्राकृत बोलने वाले बातचीत में संस्‍कृत शब्‍दों का प्रयोग करते थे। य‍ह बात अब भी होती है, अर्थात् भारत की संस्‍कृतोत्‍पन्‍न वर्तमान भाषा बोलने वाले पुस्‍तकों ही में नहीं, किंतु बोलचाल में भी, संस्‍कृत-शब्‍दों का व्‍यवहार करते हैं। इन संस्‍कृत-शब्‍दों की, प्राकृत-काल में वही दशा हुई जो पुरानी प्राकृत से आए हुए शब्‍दों की हुई थी। वे बोलने वालों के मुँह में विकृत हो गए। बोलते-बोलते उनका रूप बिगड़ गया। यहाँ तक कि फिर वे एक तर‍ह के प्राकृत हो गए।

परिमार्जित संस्‍कृत का शब्‍द-विभाग

जो शब्द संस्‍कृत से आ कर प्राकृत में मिल गए हैं वे ”तत्‍सम” शब्‍द कहलाते हैं। और मूल प्राकृत शब्‍द जो सीधे प्राकृत से आए हैं ”तद्भव’ कहलाते हैं। पहले प्रकार के शब्‍द बिलकुल संस्‍कृत हैं। दूसरे प्रकार के प्रारंभिक प्राकृत से आए हैं, अथवा यों कहिए कि वे उस प्राकृत या प्राकृत की उस शाखा से आए हैं जिससे खुद संस्‍कृत की उत्‍पत्ति हुई हैं। इन दो तरह के शब्‍दों के सिवा एक तीसरी तरह के शब्‍द भी प्रचलित हो गए हैं। ये वे तत्‍सम शब्‍द हैं जो प्राकृत-भाषा-भाषियों के मुँह में बिगड़ते-बिगड़ते कुछ और ही रूप के हो गए हैं। इनको ‘अर्द्ध-तत्‍सम” कह सकते हैं। ”तत्‍सम” शब्‍दों का स्‍वभाव ‘अर्द्ध-तत्‍सम’ होने का है। फल इसका यह हुआ है कि ‘अर्द्ध-तत्‍सम’ शब्‍द धीरे-धीरे इतने बिगड़ गए हैं कि उनका और ‘तद्भव’ शब्‍दों का भेद पहचानना मुश्किल हो गया है। दोनों प्रायः एक ही तरह के हो गए हैं। इस देश के वैयाकरणों ने कुछ शब्‍दों को, ‘देश्‍य’ संज्ञा भी दी है। परंतु ये शब्‍द भी प्रायः संस्कृत ही से निकले हैं, इससे इनको भी ‘तद्भव’ शब्‍द ही मानना चाहिए। कुछ द्राविड़ भाषा के भी शब्‍द परिमार्जित संस्‍कृत में आ कर मिल गए हैं। उनकी संख्‍या बहुत कम है। अधिक संख्‍या उन्‍हीं शब्‍दों की है जो पुरानी संस्‍कृत से आए हैं। यहाँ पुरानी संस्‍कृत से मतलब संस्‍कृत की उन पुरानी शाखाओं से है जो परिमार्जित संस्‍कृत की जननी नहीं हैं। पुरानी संस्‍कृत की जिस शाखा से परिमार्जित संस्‍कृत निकली है उसे छोड़ कर और शाखाओं से ये शब्‍द आए हैं। इनकी भी गिनती ‘तद्भव’ शब्‍दों में है।

हिंदी का शब्‍द-विभाग

हिंदी से मतलब यहाँ पर, पूर्वी और पश्चिमी दोनों तरह की हिंदी से है। शब्‍द-विभाग के संबंध में हिंदी का भी ठीक वही हाल है जो संस्‍कृत का है। अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी और द्राविड़ भाषाओं के शब्‍दों को छोड़ कर शेष सारा शब्‍द-समूह, संस्‍कृत ही की तरह, तत्‍सम, अर्द्ध-तत्‍सम और तद्भव शब्‍दों में बँटा हुआ है। हिंदी में जितने तद्भव शब्‍द हैं या तो वे प्रारंभ की प्राकृ‍तों से आए हैं, या दूसरी शाखा की प्राकृतों से होते हुए संस्‍कृत से आए हैं। परंतु ठीक-ठीक कहाँ ये आए हैं, इसके विचार की इस समय जरूरत नहीं। दूसरे दरजे की प्राकृत भाषाओं के जमाने में चाहे वहे तद्भव रहे हों, चाहे तत्‍सम, आधुनिक भाषाओं में वे विशुद्ध तद्भव हैं। क्‍योंकि आधुनिक भाषाएँ तीसरे दर्जें की प्राकृत हैं, और ये सब शब्‍द दूसरे दरजे की प्राकृतों से आए हैं। परंतु आज कल के तत्‍सम और अर्द्धतत्‍सम शब्‍द प्रायः परिमार्जित संस्‍कृत से लिए गए हैं। उदाहरण के लिए ”आज्ञा” शब्‍द को देखिए। वह विशुद्ध संस्‍कृत शब्‍द है। पर हिंदी में आता है। इससे तत्‍सम हुआ। इसका अर्द्धतत्‍सम रूप है ”अग्‍याँ”। इसे बहुधा अपढ़ और अच्‍छी हिंदी न जानने वाले लोग बोलते हैं। इसी का तद्भव शब्‍द ”आन” है। यह संस्‍कृत से नहीं, किंतु दूसरी शाखा की प्राकृत के ”आणा’ शब्‍द का अपभ्रंश है। इसी तरह ‘राजा’ शब्‍द तत्‍सम है, ”राय” तद्भव। प्रत्‍येक शब्‍द के तत्‍सम, अर्द्धतत्‍सम और तद्भव रूप नहीं पाए जाते। किसी के तीनों रूप पाए जाते हैं। किसी के सिर्फ दो, किसी का सिर्फ एक ही। किसी-किसी शब्‍द के तत्‍सम और तद्भव दोनों रूप हिंदी में मिलते हैं। पर अर्थ उनके जुदा-जुदा हैं। संस्‍कृत ‘वंश’ शब्‍द को देखिए। उसका अर्थ ‘कुटुंब’ भी है और ‘बाँस’ भी। उसके अर्द्ध-तत्‍सम ‘बंस’ शब्‍द का अर्थ तो कुटुंब है, पर उस से दूसरा अर्थ नहीं निकलता। वह अर्थ उसके तद्भव शब्‍द ‘बाँस’ से निकलता है।

हिंदी पर संस्‍कृत का प्रभाव

हिंदी ही पर नहीं, किंतु हिंदुस्‍तान की प्रायः सभी वर्तमान भाषाओं पर, आज सैकड़ों वर्ष से संस्‍कृत का प्रभाव पड़ रहा है। संस्‍कृत के अनंत शब्‍द आधुनिक भाषाओं में मिल गए हैं। परंतु उसका प्रभाव सिर्फ वर्तमान भाषाओं के शब्‍द-समूह पर ही पड़ा है, व्‍याकरण पर नहीं। हिंदी-व्‍याकरण पर आप चाहे जितना ध्‍यान दीजिए, उसका चाहे विचार कीजिए, संस्‍कृत का प्रभाव आपको उसमें बहुत कम ढूँढ़े मिलेगा। संस्‍कृत शब्‍दों का प्रयोग तो हिंदी में बढ़ता जाता है, पर संस्‍कृत व्‍याकरण के नियमों के अनुसार हिंदी-व्‍याकरण में बहुत ही कम फेर-फार होते हैं। बहुत ही कम क्‍यों, यदि कोई कहे कि बिलकुल नहीं होते, तो भी अत्‍युक्ति न होगी। आचार, आहार, विचार, विहार, जल, फल, फल, कला, विद्या आदि सब तत्‍सम शब्‍द हैं। ये तद्वत हिंदी में लिख दिए जाते हैं। बहुत कम फेर फार होता है। और होता भी है तो विशेष कर के बहुवचन में जैसे आहारों, विचारों, कलाओं, विद्याओं आदि। यदि इन में विभक्तियाँ लगाई जाती हैं तो संस्‍कृत की तरह इनका रूपांतरण नहीं हो जाता। हिंदी में पुरुष और वचन के अनुसार क्रियाओं का रूप तो बदल जाता है, पर विभक्तियाँ लगने से संज्ञाओं के रूपों में बहुत कम अदल-बदल होता है। इसी के तत्‍सम शब्‍दों से क्रिया का काम नहीं निकलता। यदि ऐसे शब्‍दों को क्रिया का रूप देना होता है तो एक तद्भव शब्‍द और जोड़ना पड़ता है। ‘दर्शन’ शब्‍द तत्‍सम है। अब इससे यदि क्रिया का काम लेना हो तो ‘करना’ और जोड़ना पड़ेगा। अतएव सर्वसाधारण लक्षण यह है कि हिंदी में जितने नाम या संज्ञाएँ हैं सब या तो तत्‍सम हैं, या अर्द्धतत्‍सम हैं, या तद्भव हैं, पर क्रियाएँ जितनी हैं सब तद्भव हैं। यह स्‍थूल लक्षण है। इसमें कुछ अपवाद भी हैं, पर उनके कारण इस व्‍यापक लक्षण में बाधा नहीं आ सकती है।

जब से इस देश में छापेखाने खुले और शिक्षा की वृद्धि हुई तब से हिंदी में संस्‍कृत के तत्‍सम शब्‍दों का प्रयोग बहुत अधिकता से होने लगा। संस्‍कृत के कठिन-कठिन शब्‍दों को हिंदी में लिखने की चाल सी पड़ गई। किसी-किसी पुस्‍तक के शब्‍द यदि गिने जायँ तो फीसदी 50 से भी अधिक संस्‍कृत के तत्‍सम शब्‍द निकलेंगे। बँगला में तो इस तरह के शब्‍दों की और भी भरमार है। किसी-किसी बँगला पुस्‍तक में फीसदी 88 शब्‍द विशुद्ध संस्‍कृत के देखे गए हैं। ये शब्‍द ऐसे नहीं कि इनकी जगह अपनी भाषा के सीधे-सादे बोलचाल के शब्‍द लिखे ही न जा सकते हों। नहीं, जो अर्थ इन संस्‍कृत शब्‍दों से निकलता है उसी अर्थ के देने वाले अपनी निज की भाषा के शब्‍द आसानी से मिल सकते हैं। पर कुछ चाल ही ऐसी पड़ गई है कि बोलचाल के शब्‍द लोगों को पसंद नहीं आते। वे यथा-संभव संस्‍कृत के मुश्किल-मुश्किल शब्‍द लिखना ही जरूरी समझते हैं। फल इसका यह हुआ है कि हिंदी दो तरह की हो गई है। एक तो वह जो सर्वसाधारण में बोली जाती है, दूसरी वह जो पुस्‍तकों, अखबारों और सामायिक पुस्‍तकों में लिखी जाती है। कुछ अखबारों के संपादक इस दोष को समझते हैं, इससे वे बहुधा बोलचाल ही की हिंदी लिखते हैं। उपन्‍यास की कुछ पुस्‍तकें भी सीधी-सादी भाषा में लिखी गई हैं। जिन अखबारों और पुस्‍तकों की भाषा सरल होती है उनका प्रचार भी औरों से अधिक होता है उनका प्रचार भी औरों से अधिक होता है। इस बात को जान कर भी लोग क्लिष्‍ट भाषा लिख कर भाषा-भेद बढ़ाना नहीं छोड़ते। इसका अफसोस है। कोई कारण नहीं कि जब तक बोलचाल की भाषा के शब्‍द मिलें, संस्‍कृत के कठिन तत्‍सम शब्‍द क्‍यों लिखे जायँ? घर शब्‍द क्‍या बुरा है जो ‘गृह’ लिखा जाय? कलम क्‍या बुरा है जो लेखनी लिखा जाय? ऊँचा क्‍या बुरा है जो ‘उच्‍च’ लिखा जाय? संस्‍कृत जानना हम लोगों का जरूर कर्तव्‍य है। पर उसके मेल से अपनी बोलचाल की हिंदी को दुर्बोध करना मुनासिब नहीं। पुस्‍तकें लिखने का सिर्फ इतना ही मतलब होता है कि जो कुछ उनमें लिखा गया है वह पढ़ने वालों की समझ में आ जाय। जितने ही अधिक लोग इन्‍हें पढ़ेंगे उतना ही अधिक लिखने का मतलब सिद्ध होगा। तब क्‍या जरूरत है कि भाषा क्लिष्‍ट करके पढ़ने वालों की संख्‍या कम की जाय? जो संस्‍कृत-भाषा हजारों वर्ष पहले बोली जाती थी उसे मिलाने की कोशिश कर के अपनी भाषा के स्‍वाभाविक विकास को रोकना बुद्धिमानी का काम नहीं। स्‍वतंत्रता सब के लिए एक सी लाभदायक है। कौन ऐसा आदमी है जिसे स्‍वतंत्रता प्‍यारी न हो? फिर क्‍यों हिंदी से संस्‍कृत की पराधीनता भोग कराई जाय? क्‍यों न वह स्‍वतंत्र कर दी जाय? संस्‍कृत, फारसी, अंगरेजी आदि भाषाओं के जो शब्‍द प्रचलित हो गए हैं उनका प्रयोग हिंदी में होना ही चाहिए। वे सब अब हिंदी के शब्‍द बन गए हैं। उनसे घृणा करना उचित नहीं।

डाक्‍टर ग्रियर्सन की राय है कि काशी के कुछ लोग हिंदी की क्लिष्‍टता को बहुत बढ़ा रहे हैं। वहाँ संस्‍कृत की चर्चा अधिक है। इस कारण संस्‍कृत का प्रभाव हिंदी पर पड़ता है। काशी में तो किसी-किसी को उच्‍च भाषा लिखने का अभिमान है। यह उनकी नादानी है। यदि हिंदी का कोई शब्‍द न मिले तो संस्‍कृत का शब्‍द लिखने में हानि नहीं, जान-बूझ कर भाषा को उच्‍च बनाना किसी के पैरों में कुल्‍हाड़ी मारना है। जिन भाषाओं से हिंदी की उत्‍पत्ति हुई है उनमें मन के सारे भावों के प्रकाशित करने की शक्ति थी। वह शक्ति हिंदी में बनी हुई है। उस का शब्‍द-समूह बहुत बड़ा है। पुरानी हिंदी में उत्तमोत्तम काव्‍य, अलंकार और वेदांत के ग्रंथ भरे पड़े हैं। कोई बात ऐसी नहीं, कोई भाव ऐसी नहीं, कोई विषय ऐसा नहीं जो विशुद्ध हिंदी शब्‍दों में न लिखा जा सकता हो। तिस पर भी बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ता है, कि कुछ लोग, कुछ वर्षों से, एक बनावटी क्लिष्‍ट भाषा लिखने लगे हैं। पढ़ने वालों की समझ में उनकी भाषा आवेगी या नहीं, इसकी उन्‍हें परवा नहीं रहती। सिर्फ अपनी विद्वत्ता दिखाने की उन्‍हें परवा रहती है। बस। कला-कौशल और विज्ञान आदि के पारिभाषिक शब्‍दों का भाव आदि संस्‍कृत-शब्‍दों में दिया जाय तो हर्ज नहीं। इस बात की शिकायत नहीं। शिकायत साधारण तौर पर सभी तरह की पुस्‍तकों में संस्‍कृत शब्‍द भर देने की है। इन्‍हीं बातों के ख्‍याल से गवर्नमेंट ने मदरसों की प्रारंभिक पुस्‍तकों की भाषा बोलचाल की कर दी है। अतएव हिंदी के प्रतिष्ठित लेखकों को भी चाहिए कि संस्‍कृत के क्लिष्‍ट शब्‍दों का प्रयोग यथासंभव कम किया करें।

द्राविड़ भाषाओं का प्रभाव

प्राचीन आर्य जब भारतवर्ष में पहले पहल पधारे तब भारतवर्ष उजाड़ न था। आबाद था। जो लोग यहाँ रहते वे आर्यों की तरह सभ्‍य न थे। आर्यों ने धीरे-धीरे उनको आगे हटाया और उनके देश पर कब्‍जा कर लिया। प्राचीन आर्यों के ये प्रतिपक्षी वर्तमान द्राविड़ और मुंडा जाति के पूर्वज थे। उनमें और आर्यों में वैर-भाव रहने पर भी कुछ दिनों बाद सब पास-पास रहने लगे। परस्‍पर का भेद-भाव बहुत कम हो गया। आपस में शादी ब्‍याह तक होने लगे। परस्‍पर के रीति-रस्‍म बहुत-कुछ एक हो गए। इस निकट संपर्क के कारण द्राविड़ भाषा के बहुत से शब्‍द संस्‍कृतोत्‍पन्‍न आर्य-भाषाओं में आ गए। वे प्राकृत और अपभ्रंश से होते हुए वर्तमान हिंदी में भी आ पहुँचे हैं। यद्यपि उनका वह पूर्वरूप नहीं रहा, तथापि ढूँढ़ने से अब भी उनका पता चलता है। आदिम आर्य एशिया के जिस प्रांत से भारत में आए थे उस प्रांत में भारत की बहुत सी चीजें न होती थीं। इससे भारत में आ कर आर्यों ने उन चीजों के नाम द्राविड़ और मुंडा जाति के पूर्वजों से सीखे और उन्‍हें अपनी भाषा में मिला लिया। इसके सिवा कोई-कोई बातें ऐसी भी हैं जिन्‍हें आर्य लोग कई तरह से कह सकते थे। इस दशा में उनके कहने का जो तरीका द्राविड़ लोगों के कहने के तरीके से अधिक मिलता था उसी को वे अधिक पसंद करते थे। पुरानी संस्‍कृत का एक शब्द है ‘कृते’, जिसका अर्थ है ‘लिए’। होते-होते इसका रूपांतर ‘कहुँ’ हुआ। वर्तमान ‘को’ इसी का अपभ्रंश है। इसका कारण यह है कि द्राविड़ भाषा में एक विभक्ति थी ‘कु’। वह संप्रदान कारक के लिए थी और अब तक है। उसे देख कर पुराने आर्यों ने संप्रदान कारक के और चिह्नों को छोड़ कर ‘कृते’ के ही अपभ्रंश को पसंद किया। जिन लोगों का संपर्क द्राविड़ों के पूर्वजों से अधिक था उन्‍हीं पर उनकी भाषा का अधिक असर हुआ, औरों पर कम या बिल्‍कुल ही नहीं। यही कारण है कि आर्य-भाषाओं की कितनी ही शाखाओं में द्राविड़ भाषा के प्रभाव का बहुत ही कम असर देखा जाता है। किसी-किसी भाषा में तो बिल्‍कुल ही नहीं है।

भाषा-विकास के नियमों के वशीभूत हो कर कठोर वर्ण कोमल हो जाया करते हैं और बाद में बिल्‍कुल ही लोप हो जाते हैं। प्राचीन संस्‍कृत के ‘चलति’ (जाता है, चलता है) शब्‍द को देखिए। वह पहले तो ‘चलति’ हुआ, फिर ‘चलई’। ‘त’ बिल्‍कुल ही जाता रहा। भाषा शास्‍त्र के एक व्‍यापक नियमानुसार यह परिवर्तन हुआ। पर कहीं-कहीं इस नियम के अपवाद पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए संस्‍कृत ‘शोक’ शब्‍द को लीजिए। उसे ‘सोअ’ होना चाहिए था। पर ‘सोअ’ न हो कर ‘सोग’ हो गया। अर्थात् ‘क’ व्‍यंजन का रूपांतर ‘ग’ बना रहा। यह इसीलिए हुआ, क्‍योंकि द्राविड़ भाषा में इस तरह के व्‍यंजनों का बहुत प्राचुर्य है। अतएव सिद्ध है कि संस्‍कृतोत्‍पन्‍न आर्य-भाषाओं पर द्राविड़ भाषाओं का असर जरूर पड़ा। और उस असर के चिह्न हिंदी में भी पाए जाते हैं।

और भाषाओं का प्रभाव

मुसलमानों के संपर्क से फारसी के अनेक शब्‍द हिंदी में मिल गए हैं। साथ ही इसमें कितने ही शब्‍द अरबी के और थोड़े से तुर्की के भी आ मिले हैं पर ये अरबी और तुर्की के शब्‍द फारसी से हो कर आए हैं। अर्थात् फारसी बोलने वालों ने जिन अरबी और तुर्की शब्‍दों को अपनी भाषा में ले लिया था वही शब्‍द मुसलमानों के संयोग से हिंदुस्‍तान में प्रचलित हुए हैं। खास अरबी और तुर्की बोलने वालों के संयोग से हिंदी में नहीं आए। यद्यपि अरबी, तुर्की और फारसी के बहुत से शब्‍द हिंदी में मिल गए हैं, तथापि उनके कारण हिंदी के व्‍याकरण में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इन विदेशी भाषाओं के शब्‍दों ने हिंदी की शब्‍द-संख्‍या जरूर बढ़ा दी है, पर व्‍याकरण पर उनका कुछ भी असर नहीं पड़ता। हाँ, इन शब्दों के कारण एक बात लिखने लायक जो हुई है वह यह है कि मुसलमान और फारसीदाँ हिंदू जब ऐसी हिंदी लिखते हैं, जिसमें फारसी, अरबी और तुर्की के शब्‍द अधिक होते हैं, तब उनके वाक्‍य-विन्‍यास का क्रम साधारण हिंदी से कुछ जुदा तरह का जरूर हो जाता है।

फारसी, अरबी और तुर्की के सिवा पोर्चुगीज, डच और अंगरेजी भाषा के भी कुछ शब्‍द हिंदी में आ मिले हैं। उनमें अंग्रेजी शब्‍दों की संख्‍या अधिक है। इसका कारण अंगरेजों का अधिक संपर्क है। यह संपर्क जैसे-जैसे बढ़ता जायगा तैसे-तैसे और भी अधिक अंगरेजी शब्‍दों के आ मिलने की संभावना है।

सारांश

यहाँ तक जो कुछ लिख गया उससे मालूम हुआ कि हमारे आदिम आर्यों की भाषा पुरानी संस्‍कृत थी। उसके कुछ नमूने ऋग्‍वेद में वर्तमान हैं। उसका विकास होते-होते कई प्रकार की प्राकृतें पैदा हो गईं। हमारी विशुद्ध संस्‍कृत किसी पुरानी प्राकृत से ही परिमार्जित हुई है। प्राकृतों के बाद अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति हुई और उनसे वर्तमान संस्‍कृतोत्‍पन्‍न भाषाओं की। हमारी वर्तमान हिंदी, अर्धमागधी और शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है। अतएव जो लोग यह समझते हैं कि हिंदी की उत्‍पत्ति प्रत्‍यक्ष संस्‍कृत से है वे डाक्‍टर ग्रियर्सन की सम्मति के अनुसार भूलते हैं। डाक्‍टर साहब की राय सयुक्तिक जान पड़ती है। वे आज कई वर्षों से भाषाओं की खोज का काम कर रहे हैं। इस खोज में जो प्रमाण उनको मिले हैं उन्‍हीं के आधार पर उन्‍होंने अपनी राय कायम की है। एक बात तो बिल्‍कुल साफ है कि हिंदी में संस्‍कृत शब्‍दों की भरमार अभी कल से शुरू हुई है। परिमार्जित संस्‍कृत चाहे सर्वसाधारण की बोली कभी रही भी हो, पर उसके बाद हजारों वर्ष तक जो भाषाएँ इस देश में बोली गई होंगी उन्‍हीं से आज कल की भाषाओं और बोलियों की उत्‍पत्ति मानना अधिक संभवनीय जान पड़ता है। जिस परिमार्जित संस्‍कृत को कुछ ही लोग जानते थे उससे सर्वसाधारण की बोलियों और भाषाओं का उत्‍पन्‍न होना बहुत कम संभव मालूम होता है।

यह निबंध यद्यपि हिंदी ही की उत्‍पत्ति का दिग्‍दर्शन करने के लिए है तथापि प्रसंगवश और-और भाषाओं की उत्‍पत्ति और उनके बोलने वालों की संख्‍या आदि का भी उल्‍लेख कर दिया गया है। आशा है पाठकों को यह बात नागवार न होगी।

आज तक‍ कुछ लोगों का ख्‍याल था कि हिंदी की जननी संस्‍कृत है। यह बात भारत की भाषाओं की खोज से गलत साबित हो गई। जो उद्गम-स्‍थान परिमार्जित संस्‍कृत का है, हिंदी जिन भाषाओं से निकली है उनका भी वही है। इस बात को सुन कर बहुतों को आश्‍चर्य होगा। संभव है उन्‍हें यह बात ठीक न जँचे, पर जब तक इसके खिलाफ कोई सबूत न दिए जायँ, तब तक इस सिद्धांत को मानना ही पड़ेगा।

बिहारी भाषा

भाषाओं की जाँच से एक और भी नई बात मालूम हुई है। वह यह है कि बिहारी भाषा यद्यपि हिंदी से बहुत कुछ मिलती-जुलती है तथापि वह उसकी शाखा नहीं। वह बँगला से अधिक संबंध रखती है, हिंदी से कम। इसी से बिहारियों की गिनती हिंदी बोलने वालों में नहीं की गई। उसे एक निराली भाषा मानना पड़ा है। वह पूर्वी उपशाखा के अंतर्गत है और बँगला, उड़िया और आसामी की बहन है। पूर्वी हिंदी बिहारी की डाँड़ामेंड़ी है, पर पूर्वी हिंदी की तरह वह अर्द्धमागध अपभ्रंश से नहीं निकली। वह पुराने मागध अपभ्रंश से उत्‍पन्‍न हुई। बँगला देश के वासी ‘स’ को ‘श’ उच्‍चारण करते हैं। बिहारियों को भी ऐसा ही उच्‍चारण करना चाहिए था, क्‍योंकि उनकी भाषा का उत्‍पत्ति-स्‍थान वही है जो बंगालियों की भाषा का है। पर बिहारी ऐसा नहीं करते। इससे उनकी भाषा की उत्‍पत्ति के विषय में संदेह नहीं करना चाहिए। पूर्वी हिंदी बोलने वालों से बिहारियों का अधिक संपर्क रहा है और अब भी है। बिहारियों की भाषा यद्यपि बँगला की बहन है तथापि बंगाल की अपेक्षा संयुक्‍त प्रांत से ही उनका हेल-मेल अधिक रहा है। इसी से उच्‍चारण बंगालियों की ‘श’ वाली विशेषता बिहारियों की बोली से धीरे-धीरे जाती रही है। यद्यपि बिहारी ‘स’ को ‘श’ नहीं उच्‍चारण करते, तथापि ‘स’ को ‘श’ वे लिखते अब तक हैं। अब तक उनकी यह आदत नहीं छूटी।

बिहारी भाषा के अंतर्गत पाँच बोलियाँ हैं। उनके नाम और बोलने वालों की संख्‍या नीचे दी जाती है –

मैथिली 10, 387, 898

मगही 6,584,497

भुजपुरी 17, 367, 078

पूर्वी 236, 259

अज्ञात नाम 4,112

कुल 34, 579, 844

इस भाषा में विद्यापति ठाकुर बहुत प्रसिद्ध कवि हुए। और भी कितने ही कवि हुए हैं जिन्‍होंने नाटक और काव्‍य-ग्रंथों की रचना की है।

बिहारियों की प्रधान लिपि कैथी है।

पूर्वी हिंदी

अर्द्धमागधी प्राकृत के अपभ्रंश से पूर्वी हिंदी निकली है। जैन लोगों के प्रसिद्ध तीर्थंकर महावीर ने इसी अर्द्धमागधी में अपने अनुगामियों को उपदेश दिया था। इसी से जैन लोग इस भाषा को बहुत पवित्र मानते हैं। उनके बहुत से ग्रंथ इसी भाषा में हैं। तुलसीदास ने अपनी रामायण इसी पूर्वी हिंदी में लिखा है। इसके तीन भेद हैं। अथवा यों कहिए कि पूर्वी हिंदी में तीन बोलियाँ शामिल हैं। अवधी, बघेली, और छत्तीसगढ़ी। इनमें से अवधी भाषा में बहुत कुछ लिखा गया है। मलिक मुहम्‍मद जायसी और तुलसीदास इस भाषा के सबसे अधिक प्रसिद्ध कवि हुए। जिसे ब्रज-भाषा कहते हैं। उसका मुकाबला, कविता की अगर और किसी भाषा ने किया है तो अवधी ही ने किया है। रीवाँ दरबार के कुछ कवियों ने बघेली भाषा में भी पुस्‍तकें लिखी हैं, पर अवधी भाषा के पुस्‍तक-समूह के सामने वे दाल में नमक के बराबर भी नहीं हैं। छत्तीसगढी में तो साहित्‍य का प्रायः अभाव ही समझना चाहिए।

पश्चिमी हिंदी

पूर्वी हिंदी तो मध्‍यवर्ती शाखा से निकली है अर्थात् बाहरी और भीतरी दोनों शाखाओं की भाषाओं के मेल से बनी है, पश्चिमी हिंदी की बात जुदा है। वह भीतरी शाखा से संबंध रखती है और राजस्‍थानी, गुजराती और पंजाबी की बहन है। इस भाषा के कई भेद हैं। उनमें से हिंदुस्‍तानी, ब्रज-भाषा, कन्‍नौजी, बुंदेली, बाँगरू और दक्षिणी मुख्‍य हैं। इनके बोलने वालों की संख्‍या इस प्रकार है।

हिंदुस्‍तानी (खास) 7,072,745

और तरह की हिंदुस्‍तानी जिसमें

फुटकर भाषाएँ शामिल हैं 5,921,384

ब्रजभाषा 8,380,724

कन्‍नौजी 5,082,006

बुंदेली 5,460,280

बाँगरू 2,505,158

दक्षिणी 6,292,628

कुल 40,714,925

याद रखिए यह वर्गीकरण डाक्‍टर ग्रियर्सन का किया हुआ है। इसमें कहीं उर्दू का नाम नहीं आया। हिंदी के जो दो बड़े-बड़े विभाग किए गए हैं उनमें से एक में भी उर्दू अलग भाषा या बोली नहीं मानी गई। जिसको लोग उर्दू कहते हैं उसके बोलने वालों की संख्‍या हिंदुस्‍तानी बोलने वालों में शामिल है। इस भाषा के विषय में कुछ विशेष बातें लिखनी हैं। इससे उसे आगे के लिए रख छोड़ते हैं।

ब्रज-भाषा

गंगा-यमुना के बीच के मध्‍यवर्ती प्रांत में, और उसके दक्षिण, देहली से इटावे तक, ब्रज-भाषा बोली जाती है। गुड़गाँवा और भरतपुर, करोली और ग्‍वालियर की रियासतों में भी ब्रजभाषा के बोलने वाले हैं। पुराने जमाने में शूरसेन देश के एक भाग का नाम था ब्रज। उसी के नामानुसार ब्रजभाषा का नाम हुआ है। इस भाषा के कवियों में सूरदास और बिहारी सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए। अंगरेजी-विद्वानों की, विशेष कर के ग्रियर्सन साहब की, राय में सूरदास और तुलसीदास का परस्‍पर मुकाबला ही नहीं हो सकता, क्‍योंकि उनकी राय में तुलसीदास केवल कवि ही न थे, समाज-संशोधक भी थे। मनुष्‍य के मानसिक विकारों का जैसा अच्‍छा चित्र तुलसीदास ने अपनी कविता में खींचा है वैसा और किसी से नहीं खींचा गया।

कन्‍नौजी

कन्‍नौजी, ब्रजभाषा से बहुत कुछ मिलती जुलती है। इटावा से इलाहाबाद के पास तक, अंतर्वेद में इसका प्रचार है। अवध के हरदोई और उन्‍नाव जिलों में भी यही भाषा बोली जाती है। हरदोई में ज्‍यादा उन्‍नाव में कम। इस भाषा में कुछ भी साहित्‍य नहीं है। कोई 100 वर्ष हुए श्रीरामपुर के पादरियों ने बाइबल का एक अनुवाद इस प्रांतिक भाषा में प्रकाशित किया था। उसे देखने से मालूम होता है कि तब की और अब की भाषा में फर्क हो गया है। कितने ही शब्‍द जो पहले बोले जाते थे अब नहीं बोले जाते।

बुंदेली

बुंदेली बुंदेलखंड की बोली है। झाँसी, जालौन, हमीरपुर और ग्‍वालियर राज्‍य के पूर्वी प्रांत में यह बोली जाती है। मध्‍यप्रदेश के दमोह, सागर, सिउनी, नरसिंहपुर जिलों की भी बोली बुंदेली ही है। छिंदवाड़ा और हुशंगाबाद तक के कुछ हिस्‍सों में यह बोली जाती है। बाइबल के एक आध अनुवाद के सिवा इसमें भी कोई साहित्‍य नहीं है। ब्रजभाषा, कन्‍नौजी और बुंदेली आपस में एक दूसरे से बहुत कुछ मिलती जुलती हैं।

बाँगरू

हिसार, झींद, रोहतक, करनाल आदि जिलों की भाषा बाँगरू है। इन प्रांतों की बोलियों के हरियानी और जादू आदि भी नाम हैं, पर बाँगरू नाम अधिक सयुक्तिक और अधिक व्‍यापक है, क्‍योंकि बाँगरू में, अर्थात पंजाब के दक्षिण-पूर्व में जो ऊँचा और खुश्‍क देश है उसमें, यह बोली जाती है। देहली के आस-पास की भी यही भाषा है। पर करनाल के आगे यह नहीं बोली जाती। वहाँ से पंजाबी शुरू होती है।

दक्षिणी

दक्षिण के मुसलमान जो हिंदी बोलते हैं उसका नाम दक्षिणी हिंदी रक्‍खा गया है। इस हिंदी के बोलने वाले बंबई, बरोदा, बरार, मध्‍यप्रदेश, कोचीन, कुग, हैदराबाद, मदरास, माइसोर और ट्रावनकोर तक में पाए जाते हैं। ये लोग अपनी भाषा लिखते यद्यपि फारसी अक्षरों में हैं, तथापि फारसी शब्‍दों की भरमार नहीं करते। ये लोग मुझे या मुझ को की जगह ‘मेरे को’ बोलते हैं और कभी-कभी ‘मैं खाना खाया’ की तरह के ‘ने’ विहीन वाक्‍य प्रयोग करते हैं। दक्षिणी हिंदी बोलने वालों की संख्‍या थोड़ी नहीं है। कोई 63 लाख है। सुदूरवर्ती माइसोर, कुर्ग, मदरास और ट्रावनकोर तक में इस हिंदी को बोलने वाले हैं, और लाखों हैं।

हिंदुस्‍तानी

हिंदुस्‍तानी के दो भेद हैं। एक तो वह जो पश्चिमी हिंदी की शाखा है, दूसरी वह जो साहित्‍य में काम आती है। पहली गंगा-यमुना के बीच का जो देश है उसके उत्तर में, रुहेलखंड में, और अंबाला जिला के पूर्व में, बोली जाती है। यह पश्चिमी हिंदी की शाखा है। यही धीरे-धीरे पंजाबी में परिणत हो गई है। मेरठ के आस-पास और उसके कुछ उत्तर में यह भाषा अपने विशुद्ध रूप में बोली जाती है। वहाँ उसका वही रूप है जिसके अनुसार हिंदी (हिंदुस्‍तानी) का व्‍याकरण बना है। रुहेलखंड में यह धीरे-धीरे कन्‍नौजी में और अंबाले में पंजाबी में परिणत हो गई है। दूसरी वह है जिसे पढ़े लिखे आदमी बोलते हैं और जिसमें अखबार और किताबें लिखी जाती हैं। हिंदुस्‍तानी की उत्‍पत्ति और उसके प्रकारादि के विषय में आज तक भाषाशास्‍त्र के विद्वानों की जो राय थी वह भ्रांत साबित हुई है। मीर अम्‍मन ने अपने ‘बागोबहार’ की भूमिका में हिंदुस्‍तानी भाषा की उत्‍पत्ति के विषय में लिखा है कि यह अनेक भाषाओं के मेल से उत्‍पन्‍न हुई है। कई जातियों और कई देशों के आदमी जो देहली के बाजार में परस्‍पर मिलते-जुलते और बातचीत करते थे वही इस भाषा के उत्‍पादक हैं। यह बात अब तक ठीक मानी गई थी और डाक्‍टर ग्रियर्सन आदि सभी विद्वानों ने इस मत को कबूल कर लिया था। पर भाषाओं की जाँच पड़ताल से यह मत भ्रामक निकला। हिंदुस्‍तानी और कुछ नहीं, सिर्फ ऊपरी दोआब की स्‍वदेशी भाषा है। वह देहली की बाजारू बोली हरगिज नहीं। हाँ उसके स्‍वाभाविक रूप पर साहित्‍य-परिमार्जन का जिलो जरूर चढ़ाया गया है और कुछ गँवार मुहावरे उससे जरूर निकाल डाले गए हैं। बस उसके स्‍वाभाविक रूप में इतनी ही अस्‍वाभाविकता आई है। इस भाषा का ‘हिंदुस्‍तानी’ नाम उन लोगों का रखा हुआ नहीं है, यह साहब लोगों की कृपा का फल है। हम लोग तो इसे हिंदी ही कहते हैं। देहली के बाजार में तुर्क, अफगान और फारस वालों का हिंदुओं से संपर्क होने के पहले भी यह भाषा प्रचलित थी। पर उसका नाम उसी समय से हुआ। देहली में मुसलमानों के संयोग से हिंदी-भाषा का विकास जरूर बढ़ा। विकास ही नहीं, इसके प्रचार में भी वृद्धि हुई। इस देश में जहाँ-जहाँ मुगल बादशाहों के अधिकारी गए, वहाँ-वहाँ अपने साथ वे इस भाषा को भी लेते गए। अब इस समय इस भाषा का प्रचार इतना बढ़ गया है कि कोई प्रांत, कोई सूबा, कोई शहर ऐसा नहीं जहाँ इसके बोलने वाले न हों। बंगाली, मदरासी, गुजराती, महाराष्‍ट्र, नेपाली आदि लोगों की बोलियाँ जुदा-जुदा हैं। पर वे यदि हिंदी बोल नहीं सकते तो प्रायः समझ जरूर सकते हैं। उनमें से अधिकांश तो ऐसे हैं जो बोल भी सकते हैं। भिन्‍न-भिन्‍न भाषाएँ बोलने वाले जब एक दूसरे से मिलते हैं तब वे अपने विचार हिंदी ही में प्रकट करते हैं। उस समय और कोई भाषा काम नहीं देती। उससे इसी को हिंदुस्‍तान की प्रधान भाषा मानना चाहिए। और यदि देश भर में कभी एक भाषा होगी तो यही होगी।

‘हिंदुस्‍तानी’ नाम यद्यपि अंगरेजों का दिया हुआ है तथापि है बहुत सार्थक। इससे हिंदुस्‍तान भर में बोली जाने वाली भाषा का बोध होता है। यह बहुत अच्‍छी बात है। इस नाम के अंतर्गत साहित्‍य की हिंदी, सर्वसाधारण हिंदी, दक्षिणी हिंदी और उर्दू सबका समावेश हो सकता है। अतएव हमारी समझ में इस नाम को स्‍वीकार कर लेना चाहिए।

उर्दू

उर्दू कोई जुदा भाषा नहीं। वह हिंदी ही का एक भेद है, अथवा यों कहिए कि हिंदुस्‍तानी की एक शाखा है। हिंदी और उर्दू में अंतर इतना ही है कि हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और संस्‍कृत के शब्‍दों की उसमें अधिकता रहती है। उर्दू, फारसी लिपि में लिखी जाती है और उसमें फारसी, अरबी के शब्‍दों की अधिकता रहती है। ‘उर्दू’ शब्‍द ‘उर्दू-ए-मुअल्‍ला’ से निकला है जिसका अर्थ है ‘शाही फौज का बाजार’। इसी से किसी-किसी का खयाल था कि यह भाषा देहली के बाजार ही की बदौलत बनी है। पर यह खयाल ठीक नहीं। भाषा पहले ही से विद्यमान थी और उसका विशुद्ध रूप अब भी मेरठ-प्रांत में बोला जाता है। बात सिर्फ यह हुई कि मुसलमान जब यह बोली बोलने लगे तब उन्‍होंने उसमें अरबी, फारसी के शब्‍द मिलाने शुरू कर दिए, जैसे कि आजकल संस्‍कृत जानने वाले हिंदी बोलने में आवश्‍यकता से जियादह, संस्‍कृत-शब्‍द काम में लाते हैं। उर्दू पश्चिमी हिंदुस्‍तानी के शहरों की बोली है। जिन मुसलमानों या हिंदुओं पर फारसी भाषा और सभ्‍यता की छाया पड़ गई है वे, अन्‍यत्र भी, उर्दू ही बोलते हैं। बस, और कोई यह भाषा नहीं बोलता। इसमें कोई संदेह नहीं कि बहुत से फारसी, अरबी के शब्‍द हिंदुस्‍तानी भाषा की सभी शाखाओं में आ गए हैं। अपढ़ देहातियों ही की बोली में नहीं, किंतु हिंदी के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध लेखकों की परिमार्जित भाषा में भी अरबी फारसी के शब्‍द आते हैं। पर ऐसे शब्‍दों को अब विदेशी भाषा के शब्‍द न समझना चाहिए। वे अब हिंदुस्‍तानी हो गए हैं और छोटे-छोटे बच्‍चे और स्त्रियाँ तक उन्‍हें बोलती हैं। उनसे घृणा करना या उन्‍हें निकालने की कोशिश करना वैसी ही उपहासास्‍पद बात है जैसी कि हिंदी से संस्‍कृत के धन, वन, हार और संसार आदि शब्‍दों को निकालने की कोशिश करना है। अंगरेजी में हजारों शब्‍द ऐसे हैं जो लैटिन से आए हैं। यदि कोई उन्‍हें निकाल डालने की कोशिश करे तो कैसे हो सकता है?

उर्दू में यदि अरबी, फारसी के शब्‍दों की भरमार न की जाय तो उसमें और हिंदी में कुछ भी भेद न रहे। पर उर्दू वालों को फारसी, अरबी के शब्‍द लिखने और बोलने की जिद सी है। कोई-कोई लेखक इन वैदेशिक शब्‍दों के लिखने में सीमा के बाहर चले जाते हें। इनकी भाषा सर्वसाधारण को प्रायः वैसी ही मालूम होती है जैसी कि दक्षिणी अफरीका के जंगली आदिमियों को जानसन की अंगरेजी यदि सुनाई जाय तो मालूम हो। बड़े-बड़े वाक्‍य आप देखिए – में, ने, से, का, की, के, चला, मिला, हिला आदि के सिवा आप को एक भी हिंदुस्‍तानी शब्‍द उनमें न मिलेगा। व्‍याकरण भर हिंदुस्‍तानी, बाकी सब फारसी, अरबी शब्‍द। हमारी भाषा को शुरू-शुरू में हिंदुओं ने भी खूब बिगाड़ा है। फारसी पढ़-पढ़ कर वे मुसलमानी राज्य में मुलाजिम हुए और, फारसी, अरबी के शब्‍दों की भरमार करके अपनी भाषा का रूप बदला। मुसलमान तो बहुत समय पहले अपना सारा काम फारसी में ही करते थे। पर हिंदुओं ने शुरू ही से ऐसी भाषा का प्रचार किया। अब तो मुसलमान और फारसीदाँ हिंदू, दोनों ऊँचे दरजे की उर्दू लिख-लिख कर इन प्रांतों की भाषा पर एक अत्‍याचार कर रहे हैं।

हिंदी

‘हिंदी’ शब्‍द कई अर्थों का बोधक है। अंगरेज लोग इसके दो अर्थ लगाते हैं। कभी-कभी तो वे इसे उस भाषा का बोधक समझते हैं जिसे हम, हिंदी लिखने वाले, इन प्रांतों के लोग, हिंदी कहते हैं – अर्थात् वह भाषा जो ‘हिंदुस्‍तानी’ की शाखा है और जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। कभी-कभी वे इसे उस भाषा या बोली के अर्थ में प्रयोग करते हैं जो बंगाल और पंजाब के बीच के देहात में बोली जाती है। पर कोई-कोई मुसलमान इसे फारसी का शब्‍द मानते हैं और ‘हिंद के निवासी’ के अर्थ में बोलते हैं। हिंद (हिंदुस्‍तान) के रहने वालों को वे हिंदी कहते हैं। ‘हिंदी’ मुसलमान भी हो सकते हैं और हिंदू भी। अमीर खुसरो ने ‘हिंदी’ को इसी अर्थ में लिखा है। इस हिसाब से जितनी भाषाएँ इस देश में बोली जाती हैं सब हिंदी कही जा सकती हैं।

जिसे हम हिंदी या उच्‍च हिंदी कहते हैं वह देवनागराक्षर में लिखी जाती है। इसका प्रचार कोई सौ सवा सौ वर्ष के पहले न था। उसके पहले यदि किसी को देवनागरी में गद्य लिखना होता था तो वह अपने प्रांत की भाषा – अवधी, बघेली, बुंदेली या ब्रजभाषा आदि – में लिखता था। लल्‍लूलाल ने प्रेमसागर में पहले-पहले यह भाषा देवनागरी अक्षरों में लिखी, और उर्दू लिखने वाले जहाँ अरबी-फारसी के शब्‍द प्रयोग करते वहाँ उन्‍होंने अपने देश के शब्‍द प्रयोग किए। याद रहे, लल्‍लूलाल ने कोई भाषा नहीं ईजाद की। उनके प्रेमसागर की भाषा दोआब में पहले ही से बोली जाती थी। पर उसी का उन्‍होंने प्रेमसागर में प्रयोग किया और आवश्‍यकतानुसार संस्‍कृत के शब्‍द भी उसमें मिलाए। तभी से गद्य की वर्तमान हिंदी का प्रचार हुआ। गद्य पहले भी था। कितनी ही पुस्‍तकों की टीकाएँ आदि गद्य में लिखी गई थीं। पर वे सब प्रांतिक भाषाओं में थीं। लल्‍लूलाल ने वर्तमान हिंदी की नींव डाली और उसमें उन्‍हें कामयाबी हुई। यहाँ तक कि अब स्‍वप्‍न में भी किसी को गद्य लिखते समय अपने प्रांत की अवधी, बघेली या ब्रजभाषा याद नहीं आती। पद्य लिखने में वे चाहे उनका भले ही अब तक पिंड न छोड़ें।

हिंदी में एक बड़ा भारी दोष इस समय यह घुस रहा है कि उसमें अनावश्‍यक संस्‍कृत शब्‍दों की भरमार की जाती है। इसका उल्‍लेख हम एक जगह पहले भी कर आए हैं। इससे हिंदी और उर्दू का अंतर बढ़ता जाता है। यह न हो तो अच्‍छा। इन प्रांतों की गवर्नमेंट ने बड़ा अच्‍छा काम किया जो प्रा‍रंभिक शिक्षा की पाठ्य पुस्‍तकों की भाषा एक कर दी। उर्दू और हिंदी दोनों में उसने कुछ फर्क नहीं रक्‍खा। फर्क सिर्फ लिपि का रक्‍खा है। अर्थात् कुछ पुस्‍तकें फारसी लिपि में छापी जाती हैं, कुछ नागरी में। यदि हम लोग हिंदी में संस्‍कृत के और मुसलमान उर्दू में अरबी फारसी के शब्‍द कम लिखें तो दोनों भाषाओं में बहुत थोड़ा भेद रह जाय और संभव है, किसी दिन दोनों समुदायों की लिपि और भाषा एक हो जायँ। इससे यह मतलब नहीं कि संस्‍कृत कोई न पढ़े। नहीं, हिंदू और मुसलमान जो चाहे शौक से संस्‍कृत, अरबी और फारसी पढ़ सकते हैं। पर समाचार-पत्रों, मासिक पुस्‍तकों और सर्वसाधारण के लिए उपयोगी पुस्‍तकों में जहाँ तक संस्‍कृत और अरबी-फारसी के शब्‍दों का कम प्रयोग हो अच्‍छा है। इससे पढ़ने और समझने वालों की संख्‍या बढ़ जायगी। जिससे बहुत लाभ होगा।

पद्य

‘हिंदुस्‍तानी’, अर्थात् वर्तमान बोलचाल की भाषा, के सबसे पुराने नमूने उर्दू की कविता में पाए जाते हैं। उर्दू क्‍यों उसे रेख्‍ता कहना चाहिए। सोलहवीं सदी के अंत में इस भाषा में कविता होने लगी। दक्षिण में इस कविता का आरंभ हुआ। कोई 100 वर्ष बाद औरंगाबाद के वली नामक शायर ने उसकी बड़ी उन्‍नति की। वह ‘रेख्‍ता का पिता’ कहलाया। धीरे-धीरे देहली में भी इस कविता का प्रचार हुआ। अठारहवीं सदी के अंत में सौदा और मीर तकी ने इस कविता में बड़ा नाम पाया। इसके बाद लखनऊ में भी इस भाषा के कितने ही नामी-नामी कवि हुए और कितने ही काव्‍य बने। और अब तक बराबर इस में कविता होती जाती हैं। खेद है, हिंदी में अभी कुछ ही दिन से बोलचाल की भाषा में कविता शुरू हुई है।

डाक्‍टर ग्रियर्सन की राय है कि गद्य की हिंदी, अर्थात् बोलचाल की भाषा, में अच्‍छी कविता नहीं हो सकती। दो एक आदमियों ने गद्य की भाषा में कविता लिखने की को‍शिश भी की, पर उन्‍हें बे-तरह नाकामयाबी हुई और उपहास के सिवा उन्‍हें कुछ भी न मिला। इस पर हमारी प्रार्थना है कि डाक्‍टर साहब की राय सरासर गलत है। यदि दो एक आदमी गद्य की हिंदी में अच्‍छी कविता न लिख सके तो इससे यह कहाँ साबित हुआ कि कोई नहीं लिख सकता। डाक्‍टर साहब जब से विलायत गए हैं तब से इस देश के हिंदी-साहित्‍य से आपका संपर्क छूट सा गया है। अब उनको चाहिए कि अपनी पुरानी राय बदल दें। बोलचाल की भाषा में कितनी ही अच्‍छी-अच्‍छी कविताएँ निकल चुकी हैं और बराबर निकलती जाती हैं। जितने प्रसिद्ध-प्रसिद्ध समाचार पत्र और सामयिक पुस्‍तकें हिंदी की हैं उनमें अब बोलचाल की भाषा की अच्‍छी-अच्‍छी कविताएँ हमेशा ही प्रकाशित हुआ करती हैं। अब उर्दू और हिंदी प्रायः एक ही भाषा है और उर्दू में अच्‍छी कविता होती है तब कोई कारण नहीं कि हिंदी में न हो सके –

बात अनोखी चाहिए भाषा कोई हो।

गद्य

बोलचाल की भाषा की कविता में उर्दू – उर्दू क्‍यों हिंदुस्‍तानी – यद्यपि हिंदी से जेठी है, तथापि गद्य दोनों का साथ ही साथ उत्‍पन्‍न हुआ है। कलकत्ते के फोर्ट विलियम कालेज के लिए उर्दू और हिंदी की पुस्‍तकें एक ही साथ तैयार हुईं। लल्‍लूलाल का प्रेमसागर और मीर अम्‍मन का बागेबहार एक ही समय की रचना है। तथापि उर्दू भाषा और फारसी अक्षरों का प्रचार सरकारी कचहरियों और दफ्तरों में हो जाने से उर्दू ने हिंदी की अपेक्षा अधिक उन्‍नति की। कुछ दिनों से समय ने पलटा खाया है। वह हिंदी की भी थोड़ी बहुत अनुकूलता करने लगा है। हिंदी की उन्‍नति हो चली है। कितने ही अच्‍छे-अच्‍छे समाचार पत्र और मासिक पुस्‍तकें निकल रही हैं। पुस्‍तकें भी अच्‍छी-अच्‍छी प्रकाशित हो रही हैं। आशा है बहुत शीघ्र उसकी दशा सुधर जाय। हिंदी भाषा और नागरी लिपि में गुण इतने हैं कि बहुत ही थोड़े साहाय्य और उत्‍साह से वह अच्‍छी उन्‍नति कर सकती है।

लिपि

जिसे हिंदुस्‍तानी कहते हैं, अर्थात् जिस में फारसी, अरबी के क्लिष्‍ट शब्‍दों का जमघटा नहीं रहता, वह तो देवनागरी लिपि में लिखी जा सकती ही है। उसकी तो कुछ बात ही नहीं है जिसे उर्दू कहते हैं – जिसमें आज कल मुसलमान और उर्दूदाँ हिंदू अखबार और साधारण विषयों की पुस्‍तकें लिखते हैं – वह भी देवनागरी लिपि में लिखी जा सकती है। पर डाक्‍टर ग्रियर्सन की राय है कि वह नहीं लिखी जा सकती। खेद है, हमारी राय आप की राय से नहीं मिलती। कुछ दिन हुए इस विषय पर हम ने एक लेख सरस्‍वती में प्रकाशित किया है और यथाशक्ति इस बात को सप्रमाण साबित भी कर दिया है कि उर्दू के अखबारों और रिसालों की भाषा अच्‍छी तरह देवनागरी में लिखी जा सकती है, और लेख का मतलब समझने में किसी तरह की बाधा नहीं आती। मुसलमान लोग अपने अरबी फारसी के धार्मिक तथा अन्‍यान्‍य ग्रंथ आनंद से फारसी, अरबी लिपि में लिखें। उनके विषय किसी को कुछ नहीं कहना। कहना साधारण साहित्‍य के विषय में है जो देवनागरी लिपि में आसानी से लिखा जा सकता है। देवनागरी लिपि के जानने वालों की संख्‍या फारसी लिपि के जानने वालों की संख्‍या से कई गुना अधिक है। इस दशा में सारे भारत में फारसी लिपि का प्रचार होना सर्वथा असंभव और नागरी का सर्वथा संभव है। यदि मुसलमान सज्‍जन हिंदुस्‍तान को अपना देश मानते हों, यदि स्‍वदेश-प्रीति को भी कोई चीज समझते हों, यदि एक लिपि के प्रचार से देश को लाभ पहुँचना संभव जानते हों तो हठ, दुराग्रह और कुतर्क छोड़ कर उन्‍हें देवनागरी लिपि सीखनी चाहिए।

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