हिन्दी काव्य भाषा का उद्गमकालीन स्वरूप – प्रोफेसर महावीर सरन जैन

EHD-2 Hindi Kavya

हिन्दी अपने भाषा क्षेत्र के राजस्थानी, मैथिली, ब्रज, अवधी, खड़ी आदि उपभाषिक रूपों को एवं इन सबके मेल से बनी सधुक्कड़ी को हिन्दी का अनिवार्य अंग मानकर चली है। इसी प्रसंग में हिन्दी के विद्वानों का ध्यान हिन्दी काव्य भाषा के उद्गम काल के स्वरूप की ओर दिलाना भी अप्रासंगिक न होगा। यह स्वरूप भी हिन्दी की एकाधिक उपभाषाओं के समावेश से बना है। इसका स्वरूप भी समावेशी एवंसंश्लिष्ट अधिक रहा है।

यद्यपि यह अवान्तर होगा तथापि मैं यह कहने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहा हूँ कि हिन्दीकाव्य भाषा के उद्गमकालीन संश्लिष्ट स्वरूपको ओझल करने के कारण हिन्दी के अधिकांश विद्वानों ने हिन्दी के इन कवियों की काव्य-भाषा पर विचार करते समय उसका वैज्ञानिक ढंग से विश्लेषण नहीं किया है। किसी ने उसको ब्रज,किसी ने अवधी,किसी ने भोजपुरी,किसी ने पंजाबी तो किसी ने खड़ी बोली के दायरे में खींचने की कोशिश की है। किसी ने यदि ब्रज की साहित्यिक परम्परा पर लेखनी चलाई है तो उसकी प्रवृत्ति आलोच्य काव्य कृति को ब्रज की सिद्ध करने की रही है।

इसी प्रकार अवधी की साहित्यिक परम्परा का इतिहास लिखने वालों ने विवेच्य काव्य कृति में अवधी ढूँढ़ने का प्राणायाम किया है। कुछ विद्वानों ने अपभ्रंश की रचनाओं को भी विवेच्य साहित्यिक परम्परा का अंग स्वीकार कर लिया है। हम अपने‘अपभ्रंश के विविध भाषिक रूपों से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के विविध रूपों का विकास’शीर्षक आलेख में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि कुछ विद्वानों ने अपभ्रंश एवं आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के संक्रमण काल के रचनाकारों एवं उनकी कृतियों को अपनी अपनी भाषा के साहित्य की सबसे पहली रचना मानने का मत स्थापित किया है। इनकी भाषा को आधुनिक भारतीय आर्य भाषा की सीमा के अन्तर्गत स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह बात हमने समस्त आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के संदर्भ में कही है और यह बात हिन्दी पर तो लागू होती ही है। हिन्दी के विशेष संदर्भ को ध्यान में रखकर उदाहरण प्रस्तुत हैं –

1.हरिप्रसाद शास्त्री द्वारा नेपाल की राजशाही लाइब्रेरी से सन्1907में ताड़पत्रों पर लिखे गए चर्यापद या सिद्धों की रचनाएँ- ‘बौद्ध गान ओ दोहा’(आठवीं से बारहवीं शताब्दी)।श्री राहुल सांकृत्यायन ने इसकी भाषा मगही माना है जो हिन्दी के बिहारी उपवर्ग की उपभाषा है।

2.‘पुष्य’‘पुष्प’ (विक्रम सम्वत1020अर्थात963के आसपास)

हिन्दीकेसंदर्मेंडॉ.हीरालालजैन ने इनका वास्तविक नाम पुष्पदंत’ माना है तथाइनका रचनाकाल विक्रम सम्वत 1020 अर्थात 963 के आसपास माना है। डॉ. हीरा लाल जैन के मतानुसार मान्यकेट राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय (सन् 939 से 968 ईस्वी) के मंत्री भरत तथा उनके पुत्र नन्न का इन्हें आश्रय प्राप्त था। उन्होंने इनकी रचनाओं का रचनाकाल इस प्रकार माना है-

(अ) तिसट्ठि पुरिस गुणालंकार (महापुराण) (रचनाकाल – 965 ईस्वी के आसपास)

(आ) णायकुमार चरिउ (चरित कथा) (रचनाकाल – सन् 971 ईस्वी में रचना पूर्ण हुई)

(इ) जसहर चरिउ (यशोधर कथा) (रचनाकाल सन् 972 ईस्वी में रचना पूर्ण हुई)

  1. आचार्यहेमचन्द्रसूरी(1087-1172)उनके’त्रिषष्ठिशलाकापुरुश चरित'(पुराण काव्य) एवं देशीनाममाला (कोश ग्रंथ) तथा अभिधानचिंतामणि (पर्यायवाची कोश) में तत्कालीन युग की भाषिक सामग्री उपलब्ध है। इस आधार पर कुछ विद्वान इन्हें हिन्दी का आदि कवि मानते हैं। डॉ. शिव प्रसाद सिंह ने अपनी ’सूर पूर्व ब्रजभाषा साहित्य‘ पुस्तक में आचार्य हेमचन्द्र के शौरसेनी अपभ्रंश के उदाहरणों की भाषा को ‘ब्रज भाषा की पूर्व पीठिका’ ठहराया है।

हमने उपर्युक्त तीनों की सामग्री की भाषा का विश्लेषण करते हुए इन्हें अपभ्रंश एवं आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के संक्रमण काल की रचनाएँ माना है।

इधर अधिकांश विश्वविद्यालयों के हिन्दी के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में हिन्दी भाषा वाले कोर्स में निम्न विषय समाहित हैं –

1.‘काव्यभाषा के रूप में ब्रज एवं ऐतिहासिक विकास’

2.कव्यभाषा के रूप में अवधी का ऐतिहासिक विकास’

3.काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली का ऐतिहासिक विकास’

इसकी परिणति यह हुई है कि हिन्दी की साहित्यिक परम्परा का इतिहास समावेशी एवं संश्लिष्ट रूप में नहीं लिखा जा रहा है जैसा1.गार्सा द तासी (इस्तवार द ला लितेरात्यूर ऐंदुई ऐंदुस्तानी),2.शिवसिंह सेंगर (शिव सिंह सरोज),3.जार्ज ग्रियर्सन (द मॉडर्न वर्नेक्यूलर लिट्रैचर आफ हिंदोस्तान),4.मिश्र बंधु (मिश्र बंधु विनोद),5.रामचंद्र शुक्ल ( हिन्दी साहित्य का इतिहास),6हजारी प्रसाद द्विवेदी ( हिन्दी साहित्य की भूमिका;हिन्दी साहित्य का आदिकाल;हिन्दी साहित्य :उद्भव और विकास),7.रामकुमार वर्मा ( हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास) तथा8.डॉ धीरेन्द्र वर्मा (हिन्दी साहित्य) आदि विद्वानों ने अपने अपने ग्रंथों में हिन्दी साहित्य की सभी उपभाषाओं अथवा इनके मेलजोल से निर्मित भाषा में लिखे गए साहित्य का इतिहास काल, धाराओं, प्रवृत्तियों को आधार बनाकर लिखा है;अलग अलग उपभाषाओं को आधार बनाकर नहीं।

हिन्दी के पाठ्यक्रम को समावेशी एवं संश्लिष्ट दृष्टि से न बनाकर ब्रज, अवधी एवं खड़ी की अलग अलग पहचान करने वाली भेद दृष्टि से बनाने के कारण पिछले दो दशकों में बाजार में ‘ब्रज की साहित्यिक परम्परा’,‘अवधी की साहित्यिक परम्परा’,‘खड़ी बोली की साहित्यिक परम्परा’जैसे शीर्षक के ग्रंथों अथवा पुस्तकों की बाढ़ सी आ गई है।

एक ही काव्य कृति की भाषा को एक विद्वान ब्रज बताता है दूसरा उसकी भाषा को अवधी ठहराता है और तीसरा ताल ठोककर उसे खड़ी बोली की सिद्ध करता है। शोध कार्य को तमाशा बना दिया गया है। प्रकाशक को पुस्तक चाहिए। अध्यापक को पुस्तक चाहिए। शिक्षार्थी को पुस्तक चाहिए। रचना को अपनी बोली या उपभाषा की बताने एवं प्रमाणित करने की कमोबेश यही स्थिति राजस्थानी, मैथिली, भोजपुरी आदि उपभाषाओं की साहित्यिक परम्परा का इतिहास लिखने वाले विद्वानों की भी है।

हिन्दी की समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा को ओझल करने के कारण कबीर की भाषा पर विचार करते समय किसी ने उसको ब्रज, किसी ने अवधी, किसी ने भोजपुरी, किसी ने पंजाबी तो किसी ने खड़ी बोली कहा है। कबीर के लिए यह भाषा न ब्रज थी, न अवधि, भोजपुरी, न पंजाबी और न खड़ी बोली। उनके लिए यह ‘भाखा’ थी। उनकी सधुक्कड़ी में विभिन्न उपभाषिक रूप एकाकार हो गए हैं। बहुत जोर लगाकर विश्लेषण करने पर ही हमें विभिन्न उपभाषिक तत्त्व नज़र आते हैं। उदाहरण के लिए अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए मैं कबीर के साहित्य के कुछ अंश का भाषिक विश्लेषण करने के बाद ब्रज, अवधी एवं खड़ी तीनों के रूपों से सम्बंधित कुछ व्याकरणिक व्यवस्थागत सामग्री (शब्द नहीं) प्रस्तुत कर रहा हूँ—

हिन्दी की उपभाषा का नाम पुरुषवाचक सर्वनाम के सम्बंध कारकीय रूप
ब्रज मेरो, हमारो, तेरो, तुम्हारो
अवधी मोर, मोरा, हमरा, हमार, तोर, तोरा, तुम्हार
खड़ी मेरा, हमारा, तेरा, तुम्हारा
हिन्दी की उपभाषा का नाम निजवाचक सर्वनाम के सम्बंध कारकीय रूप
ब्रज अपनो
अवधी आपन
खड़ी अपना
हिन्दी की उपभाषा का नाम होना क्रिया का भूतकालिक रूप
ब्रज भयौ
अवधी भएउ/भवा
खड़ी हुआ/हूआ/हूवा/भया
हिन्दी की उपभाषा का नाम भूत निश्चयार्थक क्रिया रूप
ब्रज गयो/भयौ/मिलियो/मिलिओ/मिल्यौ/आयौ
अवधी गएउ/भएउ/आवा
खड़ी गया/भया/मिला/मिलिया/मिल्या/आया
भोजपुरी भैला/ भैल/ मिलैला

काव्य कृतियों की मिश्रित भाषा की ओर से मुँह फेर लेने अथवा अपनी बोली के प्रति दुराग्रह की सीमा तक अंध भक्ति होने के कारण कृति की भाषा को अपने पाले में खींचने की जबर्दस्त कोशिश करने के कारण ही सम्भवतः विभिन्न काव्य रचनाओं की भाषा के बारे में भिन्न भिन्न मत नज़र आते हैं। यह आलोचना अथवा समीक्षा पद्धति की वैज्ञानिकता का मज़ाक है। मगर जो है वह है। इस दृष्टि से कुछ काव्य ग्रंथों की भाषा के सम्बंध में संक्षिप्त टिप्पणियाँ प्रस्तुत हैं:

1.प्राकृत पैंगलम् -हिन्दी की उपभाषाओं पर कार्य करने वाले विद्वान इसकी भाषा के सम्बंध में एकमत नहीं हैं। ब्रज भाषा पर कार्य करने वाले विद्वानों ने इसे ब्रज भाषा का ग्रंथ माना है। डॉ. शिव प्रसाद सिंह ने अपनी‘सूर पूर्व ब्रजभाषा साहित्य’पुस्तक में इसे अवहट्ट या पिंगल अपभ्रंश में लिखी गई सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक माना है जिसमें बारहवीं से चौदहवीं सदी तक की बहुत सी ब्रज रचनाएँ संकलित की गई हैं। उनके गुरु एवं शोध प्रबंध के निर्देशक डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक कदम आगे बढ़ाकर प्राकृत पैंगलम् को ब्रजभाषा का ग्रंथ मान लिया है जो उनके द्वारा डॉ. शिव प्रसाद सिंह को दिए गए निम्न प्रमाण पत्र से प्रमाणित होता है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्द हैं –

“डॉ. सिंह ने प्राकृत पैंगलम्, पृथ्वीराज रासो और औक्तिक ग्रंथों में प्रयुक्त होने वाली ब्रजभाषा के विभिन्न स्वरूपों का बहुत अच्छा विवेचन किया है”।

मगर भाषावैज्ञानिक डॉ. उदय नारायण तिवारी के अनुसार इसमें अवधी,भोजपुरी,मैथिली और बंगला के प्राचीनतम रूप भी मिलते हैं।

(देखें- हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास पृष्ठ 152)

डॉ. कैलाश चन्द्र भाटिया ने इसमें खड़ी बोली के तत्व भी ढूढ़ निकाले हैं।

(देखें प्राकृत पैंगलम की शब्दावली और वर्तमान:हिन्दी:सम्मेलन पत्रिका,वर्ष47, अंक3)

वस्तुतः यहकिसी एक काल की रचना नहीं है। यह नवीं से चैदहवीं शताब्दी तक की रचनाओं के उदाहरणों का ग्रंथ है।इस कारण इसको आधार बनाकर हिन्दी के अनेक उपभाषिक रूपों का उद्भव दिखाना वैसे भी असंगत है।

(2)उक्तिव्यक्तिप्रकरबारहवीं  शताब्दी में बोलने वालों को संस्कृत सिखाने के लिए यह ग्रंथ लिखा है। इसमें पुरानी कोसली के समानान्तर संस्कृत के रूपों के उदाहरण दिए गए हैं। अवधी पर कार्य करने वाले विद्वानों ने इसे प्राचीन अवधी का ग्रंथ माना है मगर ब्रज पर कार्य करने वाले विद्वानों ने इसमें ‘चले’  एवं ‘करे’ जैसे क्रिया रूप ढूढ़ निकाले हैं

तथा  पर कार्य करने वाले को इसमें ‘जा’ क्रिया का रूप मिलगया है।

(3)गोरखनाथ की काव्य-भाषा इनकी भाषा के सम्बंध में भी मतभेदहैं। ‘गगन मंडल मैंऊँधा कूबा, वहाँ अमृत काबासा‘जैसी काव्य पंक्तियों में खड़ी बोली के दर्शन होते हैं तो‘चीटीं केरा नेत्र में गज्येन्द्रसमाइला’

जैसी काव्य पंक्तियों में भोजपुरी झाँकती नजर आतीहै।

डॉ. कमल सिंह ने ‘गोरखनाथ और उनका हिन्दी साहित्य’ शीर्षक ग्रंथ लिखा है और उनकादावा है कि गोरखनाथ खड़ीबोली की पूर्व परम्परा के कवि हैं।

जिस प्रकार उक्ति व्यक्तिप्रकरण में अवधी अधिक है मगर एवं खड़ी बोली केतत्व भी मिल जाते हैं

वैसेहीगोरखनाथ की भाषा का झुकाव खड़ी बोलीकी ओर अधिक है मगर इसमें राजस्थानी,

हरियाणवी, भोजपुरी के अलावा पूर्वी पंजाबी के तत्व भी मिल जाते हैं। एक उदाहरण देखें –

मेरा गुर तीन छंद गावै।

ना जाणों गुर कहाँ गैला,मुझ नींदड़ी न आवै।।

इन दो पंक्तियों में‘गैला’भोजपुरी है, ‘जाणों’हरियाणवीं’ है, ‘नींदड़ी’राजस्थानी है। शेष भाषिक तत्व ब्रज एवं खड़ी बोली के हैं।

वास्तव में गोरखनाथ की भाषा भी कबीर की तरह है।

(4) चंदबरदाई कृत ‘पृथ्वीराजरासो’अपने ग्रंथ की भाषा के सम्बंध में कवि ने ग्रंथ में कहा है –

उक्ति धर्म विशालस्य राजनीति नवं रसं।

षड् भाषा पुराणं च कुरानं कथितं मया।।39।।

(विशाल धर्म की उक्ति, राजनीति, नव रसोंको षड्भाषा में पुराण तथा कुरान स्वरूप मैंनेकहा।)

कवि का लक्ष्यार्थ यह प्रतीत होता है कि पुराण तथा कुरान तो क्रमशः थक पृथक संस्कृतएवं  अरबी में लिखे गए हैं अर्थात्पुराण की भाषा संस्कृत है और कुरान की भाषा अरबीहैमगर इस ग्रंथ में षड् भाषाओं का समाहार है। पृथ्वीराजरासो की भाषा के अध्ययन से यहस्पष्ट है कि इसका मूल ढाँचा अपभ्रंश काल सम्पर्कभाषासाहित्यिक शौरसेनी अपभ्रंश सेउद्भूत तत्कालीन जन प्रचलित ब्रज का है मगर इसमें संस्कृत,

प्राकृत,अपभ्रंश तथा मागधी,शौरसेनी एवं पैशाची से प्रसूत तत्कालीन जन प्रचलितभाषिक रूपों की  शब्दावली का भीप्रयोग हुआहै। इसकी भाषा को समझने की दृष्टि से कुछ उदाहरण प्रस्तुतहैं –

(1) तिन कहों नाम (2) जिन सुनत सुद्ध भव होत (3)जिहि पढ़त सुनत

भाषा के व्याकरण की दृष्टि से सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इसकी भाषा में एक ओर अपभ्रंश काल की संश्लिष्ट विभक्तियों का प्रयोग मिलता है वहीं दूसरी ओर परसर्गों का भी धड़ल्ले से प्रयोग मिलता है। इसकी भाषा में जिन परसर्गों का जिन कारकीय अर्थों को व्यक्त करने के लिए अधिक प्रयोग हुआ है उन्हे तालिका में प्रस्तुत किया जा रहा है –

कारक का नाम कारकीय अर्थ द्योतक परसर्ग
करण कारक सम/सों/ते/त/सैं
सम्प्रदान कारक सम/सों/प्रति
अपादान कारक पास/कहँ/कों
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