कबहू उझकि कबहू उलटि !

कबहू उझकि कबहू उलटि !
(मधुगीति १६०३०६ ब)
balb
कबहू उझकि कबहू उलटि, ग्रीवा घुमा जग कूँ निरखि;
रोकर विहँसि तुतला कभी, जिह्वा कछुक बोलन चही !
पहचानना आया अभी, है द्रष्टि अब जमने लगी;
हर चित्र वह देखा किया, ग्रह घूम कर जाना किया !
लोरी सुने बतियाँ सुने, गुनगुनाने उर में लगे;
कीर्तन भजन मन भावने, लागा है शिशु सिख बूझने !
नानी कहानी समझता, वह बीच कुछ कह डालता;
हाथों परश पग डोलता, कर उठा कर कुछ बोलता !
दिन चवालीस भव को परख, चुटकी व ताली शब्द सुन;
‘मधु’ वत्स बोधा सा लगा, प्रभु की प्रभा का उत्स लखि !

चहकित चकित चेतन चलत !

(मधुगीति १६०३१० ब)

चहकित चकित चेतन चलत, चैतन्य की चितवन चुरा;
जग चमक पर हो कर फ़िदा, उन्मना हो हर्षित घना !
शिशु तपस्वी गति प्रस्फुरा, विहँसित बदन हो चुलबुला;
हुलसित चला हो कर जुदा, गुरु मात पित संगति भुला !
बाधा विपद ना लख रही, थी द्रष्टि ओझल हो रही;
झलमल लखे रुनझुन चले, धुनि मनोहारा वे रमे !
अनुभव अमित अनुभूति चित, उर्वर हुए भास्वर प्रमित;
थरथर चलाचल भव निरख, धावत फिरत त्रिभुवन तकत !
उल्लास हर पग लड़खड़ा, आनन्द की लड़ियाँ दिखा;
उर माधुरी ‘मधु’ को चखा, माया से महका कर मना !
रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा
(अध्यक्ष – अखिल विश्व हिंदी समिति
कनाडियन प्रेसिडेंट – अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, नई दिल्ली
सेक्रेटरी – हिंदी साहित्य सभा, कनाडा
सदस्य – हिंदी राइटर्स गिल्ड, कनाडा)

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