बेटी की विदाई

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आती है बड़ी किस्मत से ये घड़ियाँ विदाई की
खुशनसीबों को मिलती है ये लड़ियाँ विदाई की

बाबुल के अंगना की बुलबुल जायेगी परदेश
कैसे देख पाएंगी अखियाँ ये रतियाँ विदाई की

किसने बनाई ये रीत रिवायतें ह्रदयविदारक सी
कैसे समेट पायेगी बिटिया ये कलियां विदाई की

खुशियों का मेला लग रहा है हरसू  आँगन में
माँ कैसे संभाले अश्को की बगिया विदाई की

महकती रहे बिटिया बाबुल की दुआ है हर लम्हा
उपहार में फूलों से सजायेंगे गलियाँ विदाई की

छलक उठेंगे सब नैना जब डोली उठेगी तेरी
तू भी रोक नहीं पाएगी खुद को गुड़िया विदाई की

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आजमाइश

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दुआओं में हदों तक ‘मुस्कान’ जा बैठे
खुदा से ऐ खुदगर्ज एहतराम पा बैठे ……

अब भी ना समझा तो बेनूर है ज़माना
तू क्या जाने कैसे-कैसे इल्जाम पा बैठे……

आजमाइशों का दौर था नाम था तेरा
खूँनाब पीकर जाँ , बदनाम नाम पा बैठे …….

आराइश की तूने महफ़िल में जज्बातों की
तुझे क्या खबर क्या अन्जाम पा बैठे……

मिट गई है हस्ती तेरे जश्ने -चिरागों से
वजूदे जाँ से एक नाम नाकाम पा बैठे …..

डूबती ख्वाहिश को एक बार पिला दे मय
के तेरी नजरों से जिंदगी का जाम पा बैठे…..

तिश्नगी है लबों पर तेरी छुअन की अभी
हसीं मुरादों की बरबस ही शाम पा बैठे…..

खूँनाब _खून के आंसू
आराइश _सजावट
एहतराम_सम्मान

रचनाकार का परिचय

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निर्मला बरवड़ “मुस्कान”

सूर्यनगर , सीकर, राजस्थान
(वर्तमान में सीकर जिले के सरकारी स्कूल में अध्यापिका पद पर कार्यरत)

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