कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव
कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कुछ जीवन बचा ले जाते हैं ये शांत दृढ़ मुँडेर,
जो आस जगाये रखते जीवित होने का।।

एक छह फीटा दरवाजा जो खुलता है,
उसकी तरफ, आधी ढ़की छत के साथ,
धूप बारिश से बचाने को।।

बाँह फैलाये कुछ मन रोज सैर कर आते हैं,
नाप आते है अनंत को ,सुनाने को रोज नई कहाँनिया।।

कुछ मन आकाश को ताकते हुये,
पतंग की भाँति डोर में बँध उड़ना चाहते है,
खोज में या बेपरवाह,अठखेलियाँ करने को।।

मुँडेर से टकीं कुछ आँखे,
कबूतर के पंखों में बाँध देती हैं, स्वयं के दिवास्वप्न,
सीलन से भरी, खारी कोठरियों के, ढह जाने को।।

कुछ इच्छायें मुँडेर पर चढ़ ऐलान करती है,
विद्रोह का खुली हवा में साँस लेने के अधिकार का।।

कुछ मुँडेर तोड़कर बना दिये जाते हैं,
चेहरे से भी छोटे झरोखे,पर फिर भी टँक जाती हैं,
कुछ आँखे भोर की पहली लालिमा चुनने को।।

कुछ माचिस के डिब्बे आग मुँह पर लपेटे,
खोल देते है, खिड़कियाँ मद्धम बयार आने को,

वो खिड़कियाँ जो हिमालय की ऊचाईं से,
झाँकती हैं गली की तरफ कोहनियाँ निकाले,
गिनती हैं धड़कने पलपल, पकड़कर रखती है नब्ज,
अलसाई सी धूप का अंधेरा होने तक।।

रोज कूद पड़ती हैं धम्म से, दो जोड़ी आँखों से मिलकर,
अकड़े घुटने के कटोरी फूटने से बेखबर।।

ये मुँडेर,ये झरोखा,ये खिड़की,
जीवन का विश्वास हैं,जो आस जगाये रखते जीवित होने का।

कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव
कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

कवियत्री रूपाली श्रीवास्तव

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