गुलामी की निशानी है घूंघट

%e0%a4%97

मेरे समाज में आज भी नई बहुओं को घूंघट निकालने के लिए बाध्य किया जाता है. ना सिर्फ गांव में बल्कि बड़े शहरों में भी आज की पढ़ी लिखी नए विचारों की लड़कियां हाथ भर का घूंघट निकाल रह रही हैं. एक बार मेरे समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने मुझसे कहा कि ‘तुम तो अच्छा लिखती हो, समाज को आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी के लिए कुछ लिखो, अपने समाज की पत्रिका में छपवाएंगे’

तभी उनकी बहू हाथ भर घूंघट निकाले चाय देने आयी, तो मैं तपाक से बोली ‘आज से आपकी बहु का घूंघट हटवा लो, फिर मैं इसी पर कुछ लिखती हूं केवल आप लोगों की झूठी शान के लिए आज की लड़की आखिर ये गुलामी का भार कब तक उठाएगी? तो झुंझला कर बोले ‘घूंघट तो औरत की इज्जत होती है, घूंघट में बड़ों का लिहाज रखती है’. मैंने कहा, तो आपके छोटे भाई की बहू आपसे घूंघट क्यो नही निकालती? बोले ‘वो मेरे रिश्ते में कुछ लगती है’

%e0%a4%97%e0%a5%a8

मैंने कहा ‘अजीब है सिर्फ रिश्ता डिसाइड करता है कि किसको किससे घूंघट निकालना चाहिए. तो फिर इज्जत और लिहाज की बात कहां से आ गई? और अगर इज्जत की इतनी ही ज्यादा फिक्र है तो सिर्फ बहुओं से क्यों बेटियों और बहनों से भी घूंघट निकलवाओ. और दूसरे समाज की मेरी सहेलियां जो अपने ससुराल वालों से घूंघट नहीं निकालतीं, अपनी मर्जी से जिंदगी जीती हैं तो क्या वो उन लोगों का लिहाज नहीं रखतीं? इज़्ज़त नहीं करतीं? अगर घूंघट इज्जत और शर्म का प्रतीक है तो मैंने सुना है कि कुछ दिन पहले आपके चचेरे भाई की पत्नी हाथ भर घूंघट निकाल कर किसी बात पर आपको खरी खोटी सुना गईं? तो मतलब घूंघट में सब अलाउड है ? तो कैसी इज्जत और कैसी शर्म ?

खैर काफी देर तक चली ‘घूंघट’ पर बहस का कोई सही परिणाम नही निकला. आखिर में मैंने बस इतना कहा ‘सिर्फ लिखने और बोलने से समाज नहीं बदलेगा उसके लिए आपको और हमको कई कठिन फैसले और मजबूत कदम उठाने पड़ेंगे और उसके लिए किसी ना किसी को तो पहल करनी ही पड़ेगी’

पर बड़े ही ढीठ इंसान थे, बोले ‘तुम चार किताबें पढ़कर हमारी परंपराओं को नहीं बदल सकतीं.’

%e0%a4%97%e0%a5%af%e0%a5%af

ये तो सिर्फ एक छोटी सी बात है जो उनको इतनी खटक गई अगर और भी सारी बुराइयों के बारे में बताया होता तो पता नहीं क्या करते. बड़े आए समाज में बदलाव की बात करने वाले. पहले खुद को तो बदलो.

हमारे समाज की आज की पढ़ी लिखी लड़कियां जो नए जमाने के साथ कदम मिला कर आगे बढ़ना चाहती हैं, अपने सपनों को जीना चाहती हैं, उन्हें ये रूढ़ीवादी विचारधारा वापस उसी कीचड़ में घसीट रही है, जिससे वो इतने प्रयासों के बाद बाहर निकलने की कोशिश कर रही हैं. जब लड़कियां ये सब बंदिशें झेल नहीं पातीं और घुटती हैं तो उनके मां-बाप उन्हें कुछ ऐसी महिलाओं के उदाहरण देकर हिम्मत बंधाते हैं जो कई सालों से ये सब सहती आ रही हैं और चुप-चाप जी रही हैं. यहां तक ही उनसे सीखने और उनकी तरह बनने की सलाह भी देते हैं. वाह रे मेरे दोगले कायर समाज !

%e0%a4%97%e0%a5%a9

अफसोस की बात तो ये है कि आज के पढ़े-लिखे नए विचारों के लड़के जो खुद को हॉलीवुड की दुनिया के करीबी रिश्तेदार मानते हैं वो भी इसका विरोध नहीं करते जो अच्छे से जानते हैं कि घूंघट एक कुप्रथा है और एक गुलामी की निशानी है. बदलाव के लिए बड़ी बड़ी बातें नही बड़ा जिगर होना चाहिए. लड़कियों को खुद अपनी स्थिति बदलनी होगी बिना किसी के भरोसे रहे.

%e0%a4%97%e0%a5%ac

 

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि लिटरेचर इन इंडिया ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

लेखक

रेखा सुथार @rekha.suthar

(आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप से साभार)

 

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s