अवॉर्ड आप रखिए, मैं अपनी इज़्ज़त रखता हूं

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उस्ताद इशरत खां ने पद्मश्री अवार्ड को ठुकराते हुए भारत सरकार को जो पत्र लिखा है, वह एक बड़े कलाकार की पीड़ा का दस्तावेज़ बन गया है। वेदना, व्यंग्य और कलाकार के आत्मस्वाभिमान में डूबा यह पत्र पढ़ने लायक ही नहीं, संजो कर रखने लायक है। भाषा और शैली ऐसी जैसे सआदत हसन मंटो ने ख़ुद, इमरत खां के लिए, जन्नत या दोज़ख जहां भी उनकी हाल रिहाइश है, आकर यह प्रतिरोध-पत्र लिखा हो! – असद ज़ैदी

इमरत खां साहब का वक्तव्य

मेरी ज़िंदगी के अाख़िरी दौर में, जबकि मैं 82 साल का हो चला हूं, भारत सरकार ने मुझे पद्मश्री अवार्ड देना तय किया है। मैं इसके पीछे जो नेक इरादा है उसकी क़द्र करता हूं, लेकिन इस अवार्ड के मक़सद को लेकर बिना किसी दुराग्रह के यह कह सकता हूं कि यह मेरे लिए ख़ुशी की नहीं, उलझन की बात है। यह अवार्ड अगर मिलना था तो कई दशक पहले मिल जाना चाहिए था – जबकि मुझसे जूनियर लोगों को पद्मभूषण दिया जा चुका है।
मैंने भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बहुत योगदान दिया है और उसके व्यापक प्रसार में लगा रहा हूं। ख़ासकर सितारवादन की विकसित शैली और अपने पूर्वजों के सुरबहार वाद्य को दुनिया भर में फैलाने में मैंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। मुझे हिंदुस्तानी कला और संस्कृति के अाधारस्तंभों, अपने समय की महान विभूतियों, के साथ बराबरी की सोहबत में संगीत बजाने का सौभाग्य हासिल हुअा। इनमें उस्ताद विलायत खां साहब, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब, उस्ताद अहमद जान थिरकवा खां साहब, पंडित वीजी जोग और अन्य बड़ी हस्तियां शामिल हैं। इनमें से हरेक निर्विवाद रूप से हिंदुस्तानी संगीत के उच्चतम स्तर तक पहुंची हुई हस्ती हैं, और इन सभी को पद्मभूषण या पद्मविभूषण से नवाज़ा गया था।
मेरा काम और योगदान सबके सामने है और मेरे शिष्य, जिनमें मेरे बेटे भी शामिल हैं, अपने समय की कसौटी पर खरे उतरेंगे और इस बात का सबूत देंगे कि मैं किस हद तक अपने अादर्शों और अपनी जड़ों के प्रति सच्चा रहा हूं। संगीत ही मेरा जीवन है, और मैंने एकनिष्ठता से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के रंग-रूप और रूह की पाकीज़गी को बचाये रखा है, और किसी भी तरह के बिगाड़ से उसकी हिफ़ाज़त की है। मैं और मेरे शिष्य विश्व के सभी अालातरीन मंचों पर सितार और सुरबहार के माध्यम से इस धरोहर को पेश करते रहे हैं। ये संगीतकार इसी रिवायत को अाज की पीढ़ी तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं।
ज़िंदगी के इस मुक़ाम पर मुझे यह ठीक नहीं लगता कि उम्र या शोहरत के पैमाने पर मेरे काम और ख़िदमत को मेरे शागिर्दों और बेटों के स्तर से कम करके आंका जाए।
मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी समझौते नहीं किये। अब जाकर ऐसे अवार्ड को लेना, जो भारतीय संगीत में मेरे योगदान और मेरी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से क़तई मेल नहीं खाता, अपनी और अपनी कला की अवमानना करना होगा। मैं ख़ुदगर्ज़ नहीं हूं, लेकिन भारतीय शास्त्रीय संगीत के सुनहरे दौर के महानतम संगीतज्ञ मुझे जो प्यार, भरोसा और इज़्ज़त बख़्श चुके हैं, मुझे उसका भी ख़याल रखना है। मैं इसी धरोहर की अाबरू रखने के ख़याल से यह क़दम उठा रहा हूं।
विनीत
इमरत खां
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