Tamilnadu Farmers Protesting in Delhi
हाँ साहब! मैं वही हूँ जिसने धरती का सीना फाड़, अपने पसीने से सींच वो फ़सल उगाई है जो आज आपके थालियों की शोभा बढ़ा रही हैं| मैं वही हूँ जो चिलचिलाती धूप में, बिलबिलाते से खेतों में कीचड़ से सने हुए अपने खून के कतरे को बूंद-बूँद टपका रहा हूँ, इस उम्मीद में कि शायद मेरी बेटी की शादी हो जाए…मेरा बेटा भी किसी कान्वेंट स्कूल में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ ले| मेरे सपने बस ये जानते है कि या तो मेरा बेटा, आईएएस बने…डॉक्टर बने…इंजीनियर बने…| इससे अधिक मेरे सपनों के हौसले नहीं हैं..न ही मेरी उम्मीदों की उड़ान| मेरे सपने मेरे फावड़े की चोटों को और तेज़ कर देते है, मैं और तेज़ खून को रगों में बहाता हूँ ताकि कतरा-कतरा ही सही…पर इस गति में बहे कि जीते जी मेरे सपने सच हो सके|
कल ही सुना था कि वकील साहब का बेटा विदेश गया है..पढ़ने| नेताजी ने भी अपनी बेटी की शादी में क्या इंतजाम किये थे…पूरा जिला-जवार जान गया कि फलाने की बेटी की शादी है| मेरी मुनिया भी गयी थी…शादी देखने नहीं…अपनी आँखों में आंसू लेकर..एक मिठाई की प्लेट की आश में| मेरा बेटा तो दूर से खड़ा ही देखता रहा…अपने फटे-चीथड़े कपड़ो में लिपटा हुआ| मैं हारा क्या न करता…मेरा मन बैठा था..बस रगों में खून और तेज़ी से दौड़ने लगा ताकि मैं कल अपने खेतों में और तेज़ फावड़ा चला सकूं, मेरा बस चले तो मैं फसलों की नन्ही कलियों को खीच कर बड़ा कर दूं पर न तो मैं भगवान हूँ…न तो मैं हैवान…बस एक किसान हूँ!
रोज रेडियो और टीवी पर बस यही देख-सून लेता हूँ कि सरकार किसानों के लिए ये कर रही है…वो कर रही है…| जाने ऐसा क्या कर रही है जो सिर्फ सुनाई देता है…दिखाई नहीं देता| मेरा हक़ है…मैं क़र्ज़ लेता हूँ…अपनी मुनिया के लिए, अपने बेटे के लिए…अपने खेत के लिए| जब मेरी फसल हुई तो आलू 5 रूपये किलों पर आ जायेगा और जब ख़त्म होगा तो २० रूपये| मैं न तो रख सकता हूँ, न बेच सकता हूँ…क्या करूं…आखिर क़र्ज़ में डूबे फावड़े में चलने का सामर्थ्य कहाँ से लाऊं? बैंक में जाता हूँ तो मेनेजर साहब पहले १०००० मांगते है फिर सरकारी योजनाओं से रूबरू कराते है| मेरे पास तो दस आने भी अधिक नहीं है…१०००० कहाँ से लाऊं?…रोता हूँ…बिलखता हूँ…आत्मा को कंपा देता हूँ…पर मायूसी ही लेकर लौटता हूँ…|
ये सरकारे, ये योजनाएं सिर्फ कागज़ पर चलती है| मेरी मुनिया बड़ी हो गयी है…मेरा बेटा खेतों में मेरे साथ हल चलाता हैं…फावड़े की चोट अब धीमी हो चली है…हल थक चुके है…नन्ही कलियाँ बचपन का आनंद ले रही हैं…मेरे आंसुओं में आग भी है…पानी भी…खुद ही धधक कर बुझ जाते है ये आंसू| साहब आप ही बताओ..खाली पेट…सपनों को ढोते-ढोते क्यों न मैं खुद ही बुझ जाऊ?
साहब! किसान हूँ, आत्महत्या मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है!
ठाकुर दीपक सिंह कवि
Advertisements