प्रश्न किसी एक कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के मध्य उत्पन्न तनाव का नहीं है। प्रश्न इस विराट लोकतंत्र के वैभवशाली इतिहास में सन्निहित विचारवान मस्तिष्कों के सम्मान की परंपरा के खण्डित होने का है। साहित्य और अध्यात्म का यद्यपि शासन-प्रशासन से प्रत्यक्ष संबंध गोचर नहीं होता है किंतु आदियुग से राजदरबारों में ऋषि वशिष्ठ, कृपाचार्य, विष्णुगुप्त चाणक्य, बिनोवा भावे, अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना, ज़ौक़, कालिदास, रामप्रसाद बिस्मिल, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, शिवमंगल सिंह सुमन, गोपालदास नीरज और बालकवि बैरागी जैसे अनेक उदाहरण सक्रिय राजनीति के अंग रहे हैं।
प्रत्येक कुशल शासक ने स्वयं को चाटुकारों और अहंकार से बचाए रखने के लिए इस वर्ग को अपने सलाहकारों में इसलिए रखा ताकि उसके राजवैभव को प्रशंसा के दीमक से अक्षुण्ण रखा जा सके। सृजन और अध्यात्म से जुड़ा व्यक्ति भीतर ऐसी फकीरी जीता है कि निजी लाभ-हानि के गणित को दरकिनार कर राजा को वस्तुस्थिति से अवगत कराने में उसकी जिव्हा न लड़खड़ाए।

कांग्रेस की टिकट पर राज्यसभा सांसद रहे दिनकर ने पदत्याग स्वीकार कर लिया किन्तु “सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है” जैसे उद्घोष को उच्चारते समय स्वर में किसी प्रकार की दुर्बलता उन्हें स्वीकार न थी। राजभवन के वैभव को त्याग कर वनवासी का जीवन जीना स्वीकार कर जब चाणक्य चंद्रगुप्त के दरबार से चल दिये थे तभी यह नियत हो गया था कि सियासत को “वैचारिक” संपदा का उपभोग करना हो तो सत्य के पुष्पहारों में बिंधे शूलों की चुभन सहन करनी ही होगी।

कुमार विश्वास की भाषा और उक्तियों का राजनैतिक अन्वेषण करते समय यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए कि वे मूलतः एक कवि हैं। सृजन का स्वाभिमान राजहठ की अट्टालिकाओं को लांघ न सकेगा तो अपना मार्ग अवश्य बदल लेगा। अश्वमेध का अश्व पकड़ते समय लव-कुश यदि अवध के वैभव से प्रभावित हो गए होते तो उत्तर रामायण के अनेक प्रश्न अनुत्तरित राह जाते।

राजा की शान में कसीदे पढ़ने वाले चाटुकारों ने बड़ी-बड़ी सत्ता को धराशायी कर दिया है और दशरथ के पुत्रमोह को कटु वचनों से लताड़ने वाले ऋषियों ने राम के व्यक्तित्व को निखार दिया है।

माननीय अटल जी और आडवाणी जी सत्ता के शीर्ष पर पहुँच कर भी नानाजी देशमुख जैसे चिंतकों से संसर्ग करते थे। इंदिरा जी अपने समय के साहित्य और कला के प्रति जागरूक रहती थीं। रचनाकार केवल अपने युग के प्रति उत्तरदायी होता है। एक मनुष्य होने के कारण यदि सम्मान और पद आदि का लोभ उसमें कभी जाग भी जाए तो वह लोभ तभी तक अस्तित्व में राह पाता है जब तक उसकी लेखनी की धार भौंथरी न होने लगे।

दिल्ली की सत्ता के सिरमौर राजनीतिज्ञों को कुमार विश्वास के क्रियाकलापों पर कोई भी निर्णय लेने से पूर्व यह निश्चित करना होगा कि फकीरी किसी दरबार में प्रविष्ट होकर भी फ़क़ीरी ही रहती है। सियासत की श्वासों में सत्यवक्ताओं की वायु प्रविष्ट होती रहे तो सत्ता की धमनियों में बहने वाला शोणित निरंकुशता के कर्करोग से अछूता रह पाता है।

© चिराग़ जैन

Advertisements