Major Gogoi Awarded

शाबाश, मेजर गोगोई !

भारतीय सेना के अधिकारी मेजर गोगोई द्वारा कश्मीर में एक पत्थरबाज को मानव ढाल के तौर पर इस्तेमाल के मुद्दे पर देश के कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा मानवाधिकार की जो राजनीति हो रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण और सेना का मनोबल तोड़ने की सुनियोजित साज़िश है। उपरी तौर पर सेना की यह कारवाई अमानवीय ज़रूर लगती है, लेकिन घटना की परिस्थितियों पर गौर किया जाय तो व्यापक हित में सेना का यह बेहद व्यवहारिक और मानवीय क़दम था। घटना के दिन बडगाम जिले के उटलीगाम के एक मतदान केंद्र में सुरक्षाकर्मियों के एक छोटे से समूह को हज़ार से ज्यादा हिंसक पत्थरबाजों ने घेर लिया था। पत्थरबाजों की उग्र भीड़ में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे जो मतदान केंद्र को आग के हवाले करने की धमकी दे रहे थे।

परिस्थितियां ऐसी थी कि फायरिंग कर दस-बीस लोगों की जान लिए बगैर मतदानकर्मियों और सुरक्षाकर्मियों को वहां से सुरक्षित निकाल ले जाना असंभव था। मेजर गोगोई ने दूरदर्शिता का परिचय देते हर पत्थरबाजों की अगली पंक्ति में खड़े एक व्यक्ति फारूक अहमद डार को पकड़ कर जीप के बोनट से बांधा और कवच के तौर पर उसका इस्तेमाल कर न सिर्फ सभी कर्मियों को सुरक्षित निकाल ले गए, बल्कि रक्तपात को भी टालने में सफल हुए। हमारी पुलिस भी अक्सर उग्र और हिंसक भीड़ में से ही कुछ लोगों को पकड़ कर और ढाल के तौर पर उनका इस्तेमाल कर बड़े रक्तपात को टालने की कोशिश करती रही है। व्यापक हितों के लिए कभी-कभी व्यक्तिगत मानवाधिकारों की कुर्बानी भी देनी होती है। घटना की परिस्थितियों को समझे बगैर ज़रा शाबाशी देने के बजाय सेना पर अमानवीयता का आरोप लगाकर उसे लांछित करने का चौतरफ़ा प्रयास निंदनीय है।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हमारी सेना कुछ गलत नहीं कर सकती। सेना में भी हमारी और आपकी तरह के लोग होते हैं। व्यक्तिगत हैसियत से कुछ सैनिकों ने कश्मीर में ज्यादतियां भी की होगी, लेकिन पिछले कुछ सालों में घाटी से सेना को हटाने की मुहिम में असफल होने के बाद पाकिस्तान में बैठे आतंकियों और कश्मीर में बैठे अलगाववादियों की शह पर सेना को कलंकित करने के लिए उस पर आरोपों की जैसी बौछार की जाती रही है, उससे सावधान रहने की ज़रुरत है। दुर्भाग्य से सेना के खिलाफ़ इस सुनियोजित दुष्प्रचार के सबसे मासूम शिकार हमारे देश के मानवाधिकारवादी और कथित बुद्धिजीवी ही हो रहे हैं।

ध्रुव गुप्त
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