बिहार राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने ‘न्याय के साथ विकास’ की बात कर के जनता का विश्वास तो जरूर जीता; परन्तु शासन में, व्यवहार में या विचार में न न्याय दिखता है और न ही विकास। आखिर क्या हो गया है उस छवि को, जिसके लिए आप जाने जाते थे? आम जनमानस ने सुशासन जैसे न्यायप्रिय शब्द से आपको सम्मानित किया। फिर क्यों…न्याय की तो बात ही मत करिए; अन्याय अपने उच्चतम स्तर को पार कर नए रिकॉर्ड बना रहा है।

पुलिस रक्षक होती है लेकिन भक्षक का काम कर रही है। अमानवीय व्यवहार कर पुलिस प्रशासन जनता से लगातार दूर जा रही है। याद रहे लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था मे सत्ता को जनसेवा का सर्वोत्तम साधन मान गया है।

पूर्व के राजशाही व्यवस्था मे पुण्यप्रतापी राजा अपने आप को प्रजापालक मान कर शासन करते थे। परंतु जब राजा ही क्रूर और भोगी (200 साल अंग्रेज/800 साल मुस्लिम आक्रांता) बन अत्याचार करने लगे तब उनके जनघाती प्रवृत्ति और जनता की वेदना कोख से लोकतंत्र का जन्म हुआ । पुलिस जनता के सहयोग के लिए होनी चाहिए परन्तु पुलिस नित्य दिन जनता पर अमानवीय प्रयोग कर आपके सुसाशन की छवि को पैरों तले रौंदने का काम कर रही है| ऐसे पुलिस अधिकारी और इनके सहयोगियों को तत्काल प्रभाव से निलम्बित करना चाहिए और पीड़ित परिवार को न्याय मिलना चाहिए।

जिस प्रकार से मुजफ्फरनगर में बिहार पुलिस ने पीड़ित लड़की सहित लड़की पक्ष के परिवार की महिलाओं और पुरुषों को बर्बरता पूर्वक मारा गया है यह संवैधानिक तो छोड़िए मानवीय मूल्यों को भी तार-तार करने वाला है।

पीड़ित लड़की के परिवार के लिए न्याय की व्यवस्था की जाए अन्यथा जागरूक ज़िम्मेदार जनता आंदोलन करने को मजबूर हो जाएगी|

अपने विचार जरूर प्रकट करें कि क्या शादी के दिन दुल्हन को उठा कर थाने में ले जाकर पुरुष पुलिस कर्मियों द्वारा रात भर पिटाई करना न्यायसंगत है? क्या यही सुशासन है? क्या यह जंगल राज नहीं है? आख़िर भारत के किस कानून और संविधान के द्वारा पुलिस कर्मियों को यह अधिकार दिया गया?

अभिषेक कुमार सिंह

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