Chirag Jain Poem - Suraj aya Do Pal Batiyane

दिन भर आग बबूला होकर
अहंकार का बोझा ढोकर
सांझ ढले फिर आया सूरज
दो पल बतियाने
नदिया की कलकल धारा से
शीतलता पाने

मरना देखा, जीना देखा
सबका दामन झीना देखा
दौलत के सिर छाया देखी
श्रम के माथ पसीना देखा
रूप गया किस्मत की देहरी
दो रोटी खाने
सांझ ढले फिर आया सूरज
दो पल बतियाने

भोर भये मैं सबको भाया
सांझ ढले जग ने बिसराया
दोपहरी में कोई मुझको
आँख उठा कर देख न पाया
जिसने इस जग को गरियाया
जग उसको जाने
सांझ ढले फिर आया सूरज
दो पल बतियाने

चंदा डूबा दूर हो गया
मैं अम्बर का नूर हो गया
शाम हुई फिर चाँद उगा तो
मान तड़क कर चूर हो गया
ढलते की सुधि छोड़ चले सब
उगते को माने
सांझ ढले फिर आया सूरज
दो पल बतियाने

 चिराग़ जैन

Advertisements