Triple Talaq in Supreme Court

सर्वोच्च अदालत का कहना है कि “अगर तीन तलाक़ ना होगा तो मुसलमान तलाक़ के लिए कहां जाएगा?”

जैसे ही ये पंक्त‍ियां मैंने पढ़ीं, मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। और ये ही वे लोग हैं, जिन्हें हम माननीय, महनीय, योर ऑनर वग़ैरा कहते नहीं थकते!

मैं सर्वोच्च अदालत से एक सीधा सवाल पूछना चाहता हूं : “भारत का मुसलमान भारत का नागरिक है या वह इस्लाम का नागरिक है?”

दूसरा सवाल यह कि “अगर वह इस्लाम का नागरिक है तो भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है या इस्लामिक मुल्क़ है?”

मुझे तो इस सवाल का जवाब पता है, लेकिन मैं माननीय अदालत के मुंह से सुनना चाहता हूं।

भारत में तलाक़ की प्रक्रिया “हिंदू विवाह अधिनियम 1955” के तहत संपादित होती है। अदालत कहेगी यह “हिंदू क़ानून है, तो मुसलमान इसका पालन क्यों करेगा? अव्वल तो यह कि एक “समान नागरिक संहिता” इस देश में बनाई नहीं गई। अब आप कह रहे हैं कि मुसलमान हिंदू क़ानून का पालन क्यों करेगा। मेरा सवाल है, अगर हिंदू क़ानून से मुसलमान को न्याय मिल रहा है तो वह ऐसा क्यों नहीं करेगा? दूसरा यह कि न्यायालय का धर्म न्याय दिलाना है या लोगों के तथाकथित धर्मों की रक्षा करना है?

सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है और वह सुनवाई क्या है? वह यह जानने की कोशि‍श कर रही है कि तीन तलाक़ की प्रथा इस्लाम का मूल हिस्सा है या नहीं। और अगर यह प्रथा इस्लाम का मूल हिस्सा पाई गई तो? तब क्या अदालत यह कहेगी कि न्याय से हमें सरोकार नहीं लेकिन इस्लाम की मान्यताओं में हम दख़ल नहीं दे सकते? वास्तव में खंडपीठ पहले ही साफ़ कर चुकी है कि अगर यह इस्लाम के मूल में हुआ तो अदालत कुछ नहीं कर सकती। और आप कहते हैं कि भारत एक “धर्मनिरपेक्ष” देश है!

बहुत संभव है अदालत इस नतीजे पर पहुंचे कि अगर तीन तलाक़ इस्लाम के मूल में होता तो जिन 22 इस्लामिक देशों में इस पर प्रतिबंध है, वहां पर ऐसा नहीं होता। लेकिन यह एक लचर तर्क है। क्या भारत के संविधान का निर्माण उन 22 इस्लामिक देशों के क़ानून को सामने रखकर किया गया था? क्या वह हमारे लिए आदर्श है, मानक है? और क्या अगर उन 22 देशों में तीन तलाक़ की अनुमति होती तो क्या भारत में भी इसकी अनुमति दी जा सकती थी? तो क्या भारत एक इस्लामिक मुल्क़ है? आप कह दीजिए कि हां, उसके बाद फिर हम कुछ नहीं बोलेंगे। लेकिन, योर ऑनर, आप कहिए एक बार कि हां भारत एक इस्लामिक मुल्क़ है!

अख़बार में बड़े अक्षरों में शीर्षक छपा है : “पांच धर्मों के जजों ने तीन तलाक़ पर शुरू की सुनवाई।” जजों का धर्म कब से होने लगा! जज का धर्म केवल न्याय है। पांच धर्मों के जज क्या सर्वधर्म समवाय करेंगे? तलाक़ “सिविल जस्ट‍िस” से जुड़ा मामला है या कोई मज़हबी तक़रीर है?

जिस देश की सर्वोच्च अदालत ही यह कहती हो कि अगर तीन तलाक़ ना होगा तो मुसलमान तलाक़ के लिए कहां जाएगा, क्या आश्चर्य कि उस देश का बंटवारा मज़हब के नाम पर हुआ था। क्या आश्चर्य कि उस देश में कश्मीर जैसी मज़हबी समस्या है, जिसका अलग “विधान”, अलग “निशान” है। भारत के प्रधानमंत्री कश्मीर के मुख्यमंत्री से मिलते हैं तो दोनों “देशों” के झंडे इस तरह से फहराए जाते हैं मानो यह कोई “बायलेटरल समिट” हो।

अलग चूल्हा, अलग चौका! अलग विधान, अलग निशान! अलग पहचान, अलग पाकिस्तान!

जहां पर देश से अलग हो सकता है, वहां देश से अलग। पश्च‍िम में पाकिस्तान, पूर्व में बांग्लोदश। जहां पर अलगाव में रुकावट है वहां पर अलगाववाद। उत्तर में कश्मीर, दक्खन में हैदराबाद। और जहां पर कोई और चारा नहीं, वहां अलग “विधान”, अलग “निशान”! हमारी थाली अलग, हमारा लोटा अलग! और उसके बावजूद आप कहते हैं गंगा-जमुनी तहज़ीब! और उसके बावजूद आप कहते हैं भारत धर्मनिरपेक्ष!

कौन कहता है? जो यह कहता हो, उसे यहां पर प्रस्तुत किया जाए। मैं देखना चाहता हूं कि एक संगीन झूठ बोलते समय किसी मनुष्य का चेहरा कितना विद्रूप दिखाई देता है!

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सुशोभित सक्तावत