Allahabad Coaching Students - Vaibhav Yadav.jpg

इलाहाबाद के बारे में कुछ भी लिखना जैसे जलते हुए तवे पर उंगलियों से अपनी ही कहानी लिखना है। दो हज़ार से लेकर चार हज़ार रुपये तक के सिंगल से कमरे में सैकड़ों ख्वाब, हज़ारों किताबें और अनगिनत तमाम हो चुके रजिस्टरों के जोड़-तोड़ में कैसे जिंदगी बीतती है, ये यहाँ रहने वाला ही बता सकता है। यहाँ जब घर से भेजे गए पैसे पर इलाहाबाद भारी पड़ने लगता है तो किसी पार्टनर की तलाश की जाती है। अगर एक वाक्य में इलाहाबाद के बारे में कहना हो तो, हम कह सकते हैं कि जिंदगी जहाँ पार्टनरशिप में गुजरती है उस जगह का नाम है इलाहाबाद। हजारों बर्बाद हो चुकी ख्वाहिशात के बीच भी जो एक छोटी सी उम्मीद बची रहती है कि चलो यूपीपीएससी ना सही एसएससी ही सही इसी को इलाहाबाद कहते हैं। और इस सूत्र वचन को समझाने वाला जीव ही पार्टनर होता है। मतलब हर चीज यहाँ पार्टनरशिप पर ही टिकी हुई है।

दो साथ में रहने वाले लड़के बस रुम पार्टनर या बेड पार्टनर ही नहीं होते बल्कि वो सब्जी के थैले से लेकर छोटके खाली सिलेंडर को भी दोनों ओर से पार्टनरशिप में पकड़े हुए ही चलते हैं। भले ही सामने से आ रही कोई आंटी जी बीच में पड़ कर टकरा जाएँ लेकिन सिलेंडर वाली यह पार्टनरशिप टूटती नहीं।

समय के साथ-साथ इस पार्टनरशिप की गहराई, लड़कों की लंबाई और घर वालों के उम्मीदों का आयतन बढ़ता जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब रोते हुए छपरा के मुकेश को आजमगढ़ का सोनू चुप कराते हुए कहता है कि – भाई चुप हो जाओ, देख लेना वो कभी खुश नहीं रहेगी…। हालांकि है तो यह बद्दुआ ही। लेकिन जो सूकून मुकेश को इस बात का असर होते हुए सोचकर मिलता है, वह सूकून तो कभी प्रतिभवा भी उसे न दे सकी थी। उधर सोनू का कलेजा भी कुछ दिनों तक शंकर पान भंडार वाले के यहाँ बजते हुए गाने – इक ऐसी लड़की थी जिसे मैं प्यार करता था को सुन कर आहें भरने लगता है जैसे प्रतिभवा से मुहब्बत में भी उसकी पार्टनरशिप रही हो। लेकिन कुछ पार्टनरशिप की उम्र यूपीपीएससी की तैयारी कर रहे लड़कों की जवानी जैसी होती है। कम्बख्त कब ख़त्म हो जाए पता ही नहीं चलता। साथ- साथ खाने वाले, साथ-साथ सोने वाले, दो पार्टनर में से एक कब अल्लापुर से निकल कर छोटा बघाड़ा में किसी और का पार्टनर बन जाता है, यह भी पता नहीं चलता। फिर किसी दिन अचानक अल्लापुर के राजू बुक डिपो पर कोई समसामयिकी खरीदने में दोनों टकराते हैं। साथ बिताई हुई रातों की करवटें और साथ-साथ ढोए गए खाली सिलेंडर की बची हुई थोड़ी सी गैस, एक छोटी सी मुस्कान में तब्दील हो कर होठों पर फैल जाती है। जिसका मतलब होता है कि – का हो ससुर मजा आवत हौ न अब अकेले बर्तन मांजते हुए…। दूसरी तरफ का लड़का भी उसी अदा से एक रहस्यमयी मुस्कान उछालता है जिसका मतलब है कि – हाँ ससुर तुम्हारे इहाँ से अच्छे हाल में ही हूँ।

इस तरह दो बिछुड़े हुए पार्टनर जिंदगी के किसी मोड़ पर दुबारा मिल कर नैनन ही सों बात कर लेते हैं। इलाहाबाद की संस्कृति में अकेले इलाहाबाद नहीं, इसमें बलिया बनारस छपरा आजमगढ़ समेत अनेक जिलों और प्रांतों की बोलियाँ, रूप और ख्वाब ठीक वैसे ही मिले रहते हैं जैसे चावल में कंकड़। जो लाख बीन कर निकालने के बाद भी किसी न किसी दाँत के नीचे आकर बता ही देता है कि- बेटा इलाहाबादी चावल और यूपीपीएससी को थोड़ा ध्यान से… बूझे कि नहीं। इलाहाबाद में लडकों की आर्थिक स्थिति के बारे में पूछा नहीं जाता।

बस उनकी रहने वाली जगहों से अपने आप पता चल जाता है और सीनियर्स इसी आधार पर जूनियर को सलाह भी देते हैं। जैसे एक जगह एक लड़के से सवाल हुआ – कहाँ रहते हो? जवाब मिलता है अल्लापुर में। तुरंत धमकी मिलती है – मेहनत करो बेटा ये जो कप में चाय लिए स्टाइल मार रहे हो न, इसकी कीमत घरवाले जानते होंगे तुम नहीं।

दूसरी जगह दूसरे लड़के से वही सवाल – कहाँ रहते हो?
जवाब मिलता है- सलोरी में। धमकी की जगह तुरंत सलाह आ जाती है – चाय के साथ-साथ पढ़ना भी जरूरी है दोस्त। तीसरी जगह तीसरे लड़के से वही सवाल – कहाँ रहते हो? जवाब मिलता है – कटरा में। सलाह तुरंत फीकी हँसी में बदल जाती है और कहा जाता है कि भाई आप अरबपति लोग न भी पढ़ो तो क्या फर्क पड़ता है। है कि नहीं…। इस तरह बिना बताए ही पता चल जाता है कि कौन गरीबी रेखा से नीचे वाला है और कौन मध्यमवर्गीय तथा कौन अमीर परिवार का। रुम कहे जाने वाले बारह बाई चौदह साइज़ के कैदखाने की आठ वाॅट के सीएफएल की दूधिया रोशनी से निकलकर इस कोचिंग से उस कोचिंग तक ही दिन कब बीत जाता है, कुछ पता ही नहीं चलता। हाँ! रात होने से पहले शाम को एक बार मोबाइल के एफ एम पर एक प्यारी सी नज़्म उभरती है, निदा फाज़ली की। जिसे सुनकर अल्लापुर के किसी रुम में बैठे मुकेश-सोनू या प्रयाग में सब्जी काट रहे दीनानाथ शुकुल ही नहीं, एलनगंज के आसपास किसी गर्ल्स हाॅस्टल के कमरे में अधलेटी प्रतिभवा भी और आधा इलाहाबाद भी उदास हो उठता है ।

आज ज़रा फुरसत पायी थी, आज उसे फिर याद किया,
बंद गली के आखिरी घर को खोल के फिर आबाद किया.।
बात बाहुत मामूली सी थी, उलझ गयी तकरारों में,
एक ज़रा सी ज़िद ने आखिर दोनों को बर्बाद किया.।।

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