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[ मेरी मंशा है कि शृंखलाबद्ध रूप से मांसभक्षियों के कुतर्कों का एक-एक कर उच्छेदन किया जाए। उसी कड़ी में यह ]

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कुतर्क :

“मनुष्य की हत्या की तुलना पशु की हत्या से नहीं की जा सकती, क्योंकि मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ है।”

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यह मांसभक्षियों का प्रिय तर्क है। आश्चर्य होता है कि इतने अनैतिक, जघन्य, अन्यायपूर्ण और लचर तर्क के आधार पर वे अपने अपराधों पर परदा डालने का प्रयास करते हैं।

अव्वल तो यही कि अगर इस तर्क को ही मान लिया जाए तो दुनिया से न्याय-व्यवस्था का अंत हो जाएगा। जो श्रेष्ठ है, उसे निकृष्ट को मार देना चाहिए। जो बलशाली है, उसे दुर्बल को समाप्त कर देना चाहिए। जो अगड़ा है, उसे पिछड़े को कुचल देना चाहिए। मांसभक्षि‍यों का यह कुतर्क न्याय और विवेक के अंत का जयघोष है। और इस तर्क के बाद, वास्तव में, हत्या, बलात्कार, शोषण, उत्पीड़न, दमन उसी तरह मान्य हो जाते हैं, जैसे भोजन के लिए पशुओं की हत्या।

और यह स्थि‍ति तब है, जब कुतर्क भीषण तर्कदोष से भरा हुआ है।

वह कैसे?

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वह ऐसे, कि जब हम कहते हैं कि मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ है, तो हम उस श्रेष्ठता के स्वरूप का वर्णन नहीं कर रहे होते हैं। यानी तब हम यह सिद्ध नहीं कर रहे होते हैं कि मनुष्य सर्वांगीण रूप से पशुओं से श्रेष्ठ है। वास्तव में मनुष्य केवल बौद्धिक रूप से पशुओं से श्रेष्ठ है। किंतु बुद्धि‍ का उपकरण विमर्श है, हत्या नहीं। अगर मनुष्य बौद्धिक रूप से पशुओं से श्रेष्ठ है तो वह बौद्धि‍क विमर्श में पशुओं को परास्त कर सकता है, किंतु वह इसके आधार पर पशुओं की हत्या नहीं कर सकता।

क्यों?

वह इसलिए, कि बहुत से ऐसे तल हैं, जहां पर मनुष्य और पशु समान हैं। “शौच”, “शयन”, “मैथुन”, “मरण”, “रोग”, “शोक”, “भय”। अवचेतन के अनेक ऐसे आदिम स्तर हैं, जहां मनुष्य पशुवत है, जहां वह ठीक उसी जगह पर है, जहां पशु होते हैं।

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इसे ऐसे समझें :

एक “हॉरिज़ॉन्टल लैंडस्केप” है। उस पर कई इमारतें खड़ी हैं। इनमें से कोई दस फ़ीट ऊंची है, कोई पचास फ़ीट ऊंची है, कोई हज़ार फ़ीट ऊंची है। यानी “वर्टिकल” ऊंचाइयों की जो सतह है, “आल्ट‍िट्यूड” की जो “ट्रैजेक्टरी” है, वह “ज़िग-ज़ैग” है, कोई ऊपर है कोई नीचे है। किंतु जो “तल” है, जो “ग्राउंड फ़्लोर” है, वहां सभी समान हैं। सबसे ऊंची इमारत भी अपने तल पर वहीं होती है, जहां सबसे नीची इमारत होती है। अंबानी का राजमहल भी उसी धरती पर खड़ा है, जिस पर किसी निर्धन की कुटिया।

मनुष्य प्राणियों में श्रेष्ठ है : किंतु बौद्ध‍िक धरातल पर, संवेदना के धरातल पर, नैतिक स्तर पर। लेकिन “शौच”, “शयन”, “मैथुन”, “मरण”, “रोग”, “शोक”, “भय”, इन तलों पर वह पशुओं से श्रेष्ठ नहीं है। वह वहां पर उनके “समकक्ष” है।

एक स्तर की श्रेष्ठता को दूसरे स्तर की श्रेष्ठता पर आरोपित करना, यह कुत्सित मांसभक्षियों का सबसे बड़ा कुतर्क है।

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सनद रहे : मरण के क्षण में मनुष्य ऐन वहीं पर होता है, जहां पशु होता है। मनुष्य की “बुद्धि‍”, “विवेक”, “मेधा”, इन सब श्रेष्ठ गुणों का उस क्षण में लोप हो जाता है। “जीवेषणा” उस पर हावी हो जाती है। हत्या के क्षण में एक मनुष्य उसी तरह से जीवन के लिए छटपटाता है, जैसे कोई पशु। और कोई पशु कभी इसलिए सहर्ष मरण को अंगीकार नहीं करता, कि एक कथित श्रेष्ठ प्राणी द्वारा उसकी बलि चढ़ाई जा रही है।

मैं फिर दोहराता हूं : “जीवेषणा” इस सृष्ट‍ि का सबसे पुराना, सबसे अटल नियम है। और जीवेषणा के स्तर पर सभी प्राणी समान हैं। और सभी को समान रूप से जीवन का अधिकार है।

और इसीलिए, एक पशु की हत्या एक मनुष्य की हत्या जितना ही घृणित, जघन्य और अनैतिक है। भोजन के लिए वैसा करना तो और वीभत्स।

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अगली किस्त में मांसभक्षियों के इस प्रिय कुतर्क का उच्छेदन कि “पेड़-पौधों में भी तो जीवन होता है।”

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सुशोभित सक्तावत

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